Monthly Archives: November 2015

Why does this happen? (‘ऐसा क्यों होता है?’)…

Power is worshiper of Beauty and Beauty is inter-dedicated at the Power.

-26 June 1999

The person may be much worse, there is goodness hidden in a corner in his personality. But the conditions to inspire evil push him more on evil side. If circumstances inspiring him to goodness arise in front of him and would be effective on him then even the most evil person becomes a good and great man.

-12 July 1999

 

Why does this happen…

Why does this happen that I do not get the fruits of my labor, as a farmer waters his farm with sweat painstakingly and diligently and at harvest the barn catches fire and all his labor becomes redundant. Why does this happen that every time a storm comes and makes all my efforts fail? Is this a limitation in my efforts or a game of luck… Conditions want to try me…

-21 July 1999

 

I think… think… and just go to think that why the world is not as we want to make it, as we want to feel it? Why such a difference in dreams and reality? Why such a difference in fantasy and reality? Why does positive ground of dreams and fantasies turn to the negativity when they face the reality?

The answers to all these questions I’m searching for childhood… in myself, in my surroundings, as far my sight can go but the face of the world appears from bad to worse. Such a messy, ugly face of the world I have seen that I don’t want anyone to see it, who is treasured dream of making his future. Every moment I felt myself alone in the crowd the world.  My dreams, my desires brought me so far away from this world that Even if I want to come back in this world I cannot. People say, why so much hatred from the world. I say, what this world has given me besides loneliness and stumbles. How I see it with eyes full of respect or love. I am a stranger being in the crowd in this world, someone like an alien, which has no match in the world but still I am living with this world, perhaps there is any old accounts remains to pay.

My dear friends explain me facing these things, has anyone ever fulfill the dreams? Ever anyone’s ideal and principles have stood the test of truth, and I reply, if not, if not before, it will be now. I am a dreamer. I always lived in dreams and my dreams have to prove true. I want to show people the truth, to which people are not able to see while seeing because there is a veil of selfishness on their eyes.

-5 Mar 2000

शक्ति सौंदर्य की उपासक होती है और सौंदर्य शक्ति पर अन्तः-समर्पित होता है…
-२६ जून १९९९
व्यक्ति कितना भी बुरा क्यों न हो उसके भीतर किसी कोने में अच्छाई भी छिपी होती है परन्तु बुराई को प्रेरित करने वाली परिस्थितियां उसे और अधिक बुराई की ओर धकेल देती है। यदि उसके समक्ष अच्छाई को प्रेरित करने वाली परिस्थितियां उत्पन्न हो जाएं और उस पर प्रभावी हो जाएं तो बुरे से बुरा व्यक्ति भी एक अच्छा और महान व्यक्ति बन जाता है…
-१२ जुलाई १९९९
‘ऐसा क्यों होता है?’
ऐसा क्यों होता है कि मुझे अपने परिश्रम का फल नहीं मिलता, जैसे कोई किसान बड़ी मेहनत और लगन से अपने खेत को पसीने से सींचता है और फसल पकने पर खलिहान में आग लग जाती है और उसका सारा परिश्रम निरर्थक हो जाता है।
ऐसा क्यों होता है कि हर बार एक तूफ़ान आकर मेरे सारे प्रयासों को असफल कर देता है। यह मेरे प्रयासों में कोई कमी है या फिर भाग्य का कोई खेल… कि परिस्थितियां मुझे आजमाना चाहती हैं…
-२१ जुलाई १९९९
मैं सोचता हूँ… सोचता हूँ और बस सोचता चला जाता हूँ कि ये दुनिया वैसी क्यों नहीं है, जैसा हम इसे बनाना चाहते हैं, जैसा हम इसे महसूस करना चाहते हैं? सपनों, और हकीकत में इतना अंतर क्यों? कल्पना और वास्तविकता में इतना अंतर क्यों? सपनों और कल्पनाओं का सकारात्मक धरातल वास्तविकता में आते ही नकारात्मकता में क्यों बदल जाता है?
इन सब सवालों का जवाब मैं बचपन से ढूंढता आ रहा हूँ, खुद में, अपने आसपास, जहाँ तक नजरें जाती हैं पर दुनिया की बाद से बदतर शक्ल नजर आती है। दुनिया का इतना गन्दा, घिनौना चेहरा देख चुका हूँ कि नहीं चाहता की इसे कोई और भी देखे, जो अपने भविष्य को बनाने का सपना संजोए है। मैंने खुद को दुनिया की भीड़ में हर पल अकेला महसूस किया है। मेरे सपनों ने, मेरी इच्छाओं ने, मेरी अभिलाषाओं ने मुझे इस दुनिया से इतनी दूर कर दिया है कि अब मैं इस दुनिया में चाहूँ तो भी लौटकर नहीं आ सकता। लोग कहते हैं कि इस दुनिया से इतनी नफरत क्यों? मुझे इस दुनिया ने अकेलेपन और ठोकरों के अलावा दिया ही क्या है, जो मैं इसे सम्मान या प्रेम भरी नजरों से देखूं। मैं इस दुनिया की भीड़ में रहते हुए भी एक अजनबी हूँ, किसी दूसरे ग्रह के प्राणी की तरह, जिसका इस दुनिया से कहीं कोई मेल नहीं, पर जी रहा हूँ इस दुनिया के साथ, शायद इसका कोई हिसाब-किताब चुकाना बाकी है, इसलिए…
मेरे अज़ीज़ दोस्त मेरी इन बातों से रू-ब-रू होकर समझते हैं कि क्या कभी किसी के सपने पूरे हुए हैं? क्या कभी किसी के आदर्श और सिद्धांत सच की कसौटी पर खरे उतरे हैं और मैं हमेशा यही जवाब देता हूँ कि न सही, पहले न सही, पर आगे तो ऐसा होना ही होगा। मैं एक स्वप्नदर्शी हूँ, हमेशा सपनों में ही जिया हूँ क्योंकि वास्तविकता का घिनौना रूप कभी मुझे रास नहीं आया। मुझे अपने उद्देश्यों के लिए प्रयास करते हुए मर जाना भी स्वीकार है पर समझौता स्वीकार नहीं…
मेरा एकमात्र लक्ष्य है, अपने अस्तित्व को जानना और इसे सार्थक करना। मैं दुनिया को वो सच दिखाना चाहता हूँ जो लोग देखते हुए भी नहीं देख पा रहे हैं क्योंकि उनकी आँखों पर स्वार्थ का पर्दा पड़ा हुआ है और वे जान-बूझकर अनजान बने रहना चाहते हैं। मैं लोगों की चेतना को अपने प्रयासों से जाग्रत करना चाहता हूँ..
-५ मार्च २०००

Deeds and character (कर्म तथा चरित्र)…

Deeds and character are complementary to each other. The Deeds in the past have formed character and the character determines to the subsequent actions.

-16 Aug. 1998

 

The past makes the present and the present makes the future. On the past, we would not have the right but we can shape the present definitely.

-17 Aug. 1998

 

I would like to accept the death after failure in attempting my high ideals, ambitions and dreams and imaginations but I won’t accept to compromise my ideals to live with worldly threadbare experiences.

-3 Sep 1998

 

In the past there were brothel as a market of beauties and body expose. Now days, there is electronic media and cheap literature have brought them home to home.

-26 May 1999

 

There are some unresolved questions, it is better to leave them unsolved; otherwise sometimes in solving them solver gets entangled him.

The meaning of conjugal life is to share all the happiness-sorrows-dreams-aspirations-emo in each other. Conjugality means consisting of two to be one, whether one of them might be a small or low-level mentality. If either one is not having understanding well enough that one can understand the other then two lives become vain. Conjugality means walk together at every step and walk together by compromising with situations and with each other at every step. One who cannot afford to compromise or who are over-ambitious they should not enter into married life, Otherwise not one but two lives would be ruined.

I have seen many poor petty-minded great prominent persons. May God never give me such greatness.

-7 June 1999

कर्म तथा चरित्र…
कर्म तथा चरित्र एक दूसरे के पूरक हैं। पूर्व में किये गए कर्म चरित्र का गठन करते हैं तथा चरित्र बाद में किये जाने वाले कर्मों को निर्धारित करता है।
-१६ अगस्त १९९८
अतीत वर्तमान को बनाता है और वर्तमान भविष्य को। अतीत पर तो हमारा अधिकार नहीं होता अतः हमें वर्तमान को संवारना चाहिए।
-१७ अगस्त १९९८
मुझे अपने उच्च आदर्शों, महत्वाकांक्षाओं और स्वप्नों को लेकर प्रयास करते हुए असफल होकर मर जाना भी स्वीकार है लेकिन इनसे समझौता करके, संसार के कड़वे अनुभवों को अपनाकर घिसी-पिटी लीक पर घिस-घिस कर जीना स्वीकार नहीं…
-३ सितम्बर १९९८
पहले के ज़माने में हुस्न और जिस्म की नुमाइश के बाज़ार कोठे और वेश्यालय हुआ करते थे पर आजकल इलेक्ट्रॉनिक मीडिया और घिया साहित्य के जरिये ये घर-घर तक आ पहुंचे हैं।
-२६ मई १९९९
कुछ अनसुलझे सवाल ऐसे होते हैं, जिन्हे अनसुलझा छोड़ देना ही उचित होता है अन्यथा कभी-कभी अनसुलझे सवालों को सुलझाते-सुलझाते सुलझाने वाला खुद ही उलझ जाता है।
-७ जून १९९९
दाम्पत्य जीवन का अर्थ है, अपने सरे सुख-दुःख-सपने-महत्वाकांक्षाएं एक-दूसरे के बीच बाँट लेना। दांपत्य का अर्थ ही है दो का मिलकर एक होना फिर चाहे उन में से कोई एक निम्न-स्तर की मानसिकता वाला क्यों न हो। यदि दोनों में से किसी एक में भी इतनी समझ नहीं है कि वह दूसरे को समझ सके तो दो जीवन व्यर्थ हो जाते हैं। दाम्पत्य का अर्थ है- हर कदम पर साथ मिलकर चलना और हर कदम पर परिस्थिति और एक-दूसरे से समझौता करके चलना। जिसमे समझौता करने का सामर्थ्य न हो या जो अति-महत्वकांक्षी हों उसे दाम्पत्य जीवन में प्रवेश नहीं करना चाहिए वर्ना एक नहीं दो जीवन बर्बाद हो जायेंगे…
-७ जून १९९९
मैंने कई घटिया व ओछी मानसिकता वाले बड़े-बड़े लोग देखे हैं। ईश्वर मुझे ऐसा बड़प्पन कभी न दे।
-७ जून १९९९

 

My Dilemma (मेरी दुविधा)…

My goal is to motivate ordinary people’s perceptions, thoughts and feelings through art and expression of thoughts from low level to high level

-7 June 1998

Pride on self but do not envy others.

-27 July 1998

Only quiescent can beneficence many people including self. We lose a large part of our creative strength in useless chatter. Practicing silence self control can be extended. Often the only people they seem to chatter which have shallow knowledge. Deeply knowledgeable people are mystic persons of serious nature.

-9 Aug 1998

 

Problem…

Today, I’m again in a quandary like always. There is a weigher, on one side of which my goal and my own principles are there and on other side wealth and world. If I take my principle’s side then my mundane side becomes lighter. And if I go on the other side, my principles prove false. The problem is not new. Many people have experienced it before me and maybe some people experience after me. Today my goal requires money. But if I go to look at its fulfillment then I have to come in worldly delusion, I have to trample my own created principles. If I do not do it, the goal remains unattainable. And if so, I’ll put a stain of disgrace on my existence.

If I come to the worldliness, I would be misguided. The world has become a barrier between my existence and goals. Sitting like mandarin, the mind begins bashing and cursing. And being a subject the there is a fear of going astray. What I do, do not understand…

-8 July 1998

 

Solution…

Be forthright, with fearlessness and courage go forward with the truth.

-8 July 1998

मेरा ध्येय आम लोगों की धारणाओं, विचारों और भावनाओं को कला और विचारों की अभिव्यक्ति के माध्यम से निम्न स्तर से उच्च स्तर की ओर प्रेरित करना है।
-७ जून १९९८
स्वयं पर गर्व करो पर दूसरों से ईर्ष्या नहीं …
-२७ जुलाई १९९८
एकमात्र मौन से अपने साथ कई लोगों पर उपकार किया जा सकता है। हम अपनी सृजनात्मक शक्ति का एक बड़ा हिस्सा व्यर्थ बकवास में गँवा देते हैं। मौन रहकर आत्मसंयम को बढ़ाया जा सकता है। प्रायः बकवास करते वे ही लोग नजर आते हैं जो उथला ज्ञान रखते हैं। गहन ज्ञान रखने वाले लोग रहस्यवादी व गंभीर प्रवृत्ति के होते हैं।
-९ अगस्त १९९८

मेरी दुविधा…
समस्या…
हर बार की तरह आज भी मैं दुविधा में फंस गया हूँ। एक तराजू है, जिसके एक पलड़े में मेरे अपने सिद्धांत और मेरा लक्ष्य हैं और दूसरे पलड़े में संसार और धन-दौलत है। यदि मैं सिद्धांत के पलड़े में जाता हूँ तो मेरा सांसारिक पक्ष हल्का हो जाता है और यदि दूसरे पक्ष में जाता हूँ तो मेरे सिद्धांत झूठे पड़ जाते हैं। यह समस्या नई नहीं हैं। मुझसे पहले भी कई लोगों ने इसे झेला है और शायद मेरे बाद भी कुछ लोग इसे झेलेंगे। आज मेरे लक्ष्य के लिए धन की आवश्यकता है लेकिन यदि मैं इसकी पूर्ति में लग जाता हूँ तो मुझे सांसारिक प्रपंचों में आना पड़ेगा, अपने ही बनाए सिद्धांतों को पैरों तले रौंदना होगा। यदि मैं ऐसा नहीं करता हूँ तो लक्ष्य जहाँ का वहीँ रह जाता है और यदि ऐसा करता हूँ तो अपने अस्तित्व पर कलंक का धब्बा लगाता हूँ। सांसारिकता में आने पर पथभ्रष्ट होना पड़ेगा। यह संसार मेरे अस्तित्व और लक्ष्य के बीच बढ़ा बन गया है। अकर्मण्य की भांति बैठने पर मन कोसने लगता है, धिक्कारने लगता है और कर्ता बनने पर पथभ्रष्ट हो जाने का भय है। क्या करूँ क्या नहीं, समझ नहीं आता?
समाधान…
स्पष्टवादी बनो, निडरता व साहस के साथ सत्य को साथ लेकर आगे बढ़ो।
-८ जुलाई ९८

My Goal (मेरा लक्ष्य)…

While walking on the path of life, it seems that ways are getting easy automatically; targets are being achieved but as usual human nature, he consider every success as a milestone so do I…

 

Nights pass one by one. And adds one more dream in the episodes of dreams. And mind starts to play with these dreams and starts weaving warp-weft…

 

Quite few things happen new in life but never seem new, everything seems normal. Many things happen beyond the normal life but the changes do not seem weird. It seems that it all is for me only; God has given reins of some special functions in my hand, something different is going to happen by me; my present is going to make history for the future. Yet I do not feel myself greatness. I feel everything normal. Like others I laugh, sing, become sad yet I feel myself apart from the crowd. As someone else is living in my background and inspiring me to do something other than routine of this world. Time and circumstances are supporting me now. All successes and failures have begun to pay their results after so long, as everything is pre-determined. Failure is the ladder to success, now it is clear to me. The circumstances make and ruin much. Still my determination is always with me. I want to live for others.

 

Well, behind every act of this world there is a selfishness of doer. But if the Selfishness of the doer benefits others more than him then it is no longer selfishness it becomes philanthropy.

 

I began to understand my purpose which is exactly as the guide, who himself goes on the road full of thorns and wants others to save from the thorns, who wants to show them the right direction.

 

‘Earn, eat and go to sleep’ is the buzzword of the world but falling into it, I do not want to lose my existence and I cannot change my target by falling down in the mess of the world.

Naturally, the ideals that have done such a thing they are dependent on others for their personal life. I also accept to depend on others for my purposes. I am indebted to the people and always will be, on which my background is based on.

Many things in life are happening like Gulliver’s wonder. Others may not understand the amazement. Well, I do not want to disturb others, sharing the amazement in them because no one else can live my life and I cannot live someone else’s life. I know, my goal is too big, too hard on myself and I still believe on that power. As my most favorite the holy book Gita says-

Your right is to work only and never to the fruit thereof. Do not consider yourself to be the cause of the fruit of action, nor let your attachment be to in action.

-28 Nov.1997
मेरा लक्ष्य…

ज़िंदगी की राह पर चलते-चलते लगता है कि अपने-आप ही राहें आसान होती जा रही हैं लेकिन जैसा कि मानव स्वभाव है कि हर मंज़िल को वह केवल एक पड़ाव ही समझता है, उसी तरह मैं भी अपनी ज़िंदगी की छोटी-बड़ी सफलताओं को पड़ाव ही समझता हूँ…
एक-एक करके हर रात गुजरती जाती है और सपनों की कड़ियों में एक और सपने को जोड़ जाती है और मन इन कड़ियों से खेलते-खेलते ताना-बाना बुनने लगता है।
बहुत कुछ इस ज़िंदगी में नया सा होता है लेकिन नया कुछ नहीं लगता बल्कि सब कुछ सामान्य सा लगता है। बहुत कुछ सामान्य जीवन से हटकर घटित होता है लेकिन ये परिवर्तन अजीब नहीं लगते, लगता है कि यह सब मेरे लिए ही है, भगवान ने कुछ विशेष कार्यों की बागडोर मेरे हाथों में दी है, मेरे द्वारा कुछ अलग घटित होने वाला है, मेरा वर्तमान भविष्य के लिए इतिहास बनाने वाला है, फिर भी मैं अपने-आप में बड़ा महसूस नहीं करता बल्कि सब कुछ सामान्य सा महसूस करता हूँ, औरों की तरह हँसता हूँ, गाता हूँ, उदास होता हूँ, खुश होता हूँ लेकिन फिर भी अपने आप को भीड़ से अलग महसूस करता हूँ, जैसे मेरे भीतर मेरी पृष्ठभूमि में कोई और जी रहा हो, जो मुझे दुनिया से कुछ हटकर करने के लिए प्रेरित कर रहा हो। समय और परिस्थितियां अब मेरा साथ देने लगे हैं। सारी सफलताएं और असफलताएँ इतने अर्से बाद अपने फल देने लगी हैं, जैसे सब कुछ पूर्व-निश्चित सा हो। असफलताएँ भी सफलताओं की सीढ़ियां होती हैं, ये अब समझ आ रहा है। परिस्थितियां बहुत कुछ बनाती बिगाड़ती हैं लेकिन फिर भी मेरा दृढ़-संकल्प हमेशा मेरे साथ है। मैं दूसरों के लिए जीना चाहता हूँ।
वैसे तो इस दुनिया के हर कार्य के पीछे सम्पादित करने वाले का स्वार्थ होता है, लेकिन वह स्वार्थ अगर स्वयं से अधिक दूसरों को लाभ पहुंचाए तो वह स्वार्थ नहीं रह जाता, परोपकार हो जाता है।
मुझे मेरा उद्देश्य समझ आने लगा है, जो ठीक वैसा ही है, जैसा की उस मार्गदर्शक का होता है जो खुद काँटों भरी राह पर चलकर अपने अनुभवों द्वारा दूसरों को उन काँटों से बचाना चाहता है, उन्हें सही दिशा और सही राह दिखाना चाहता है।
कमाना, खाना और खाकर सो जाना, दुनिया का मूलमंत्र है लेकिन इसमें पड़कर मैं अपना अस्तित्व नहीं खोना चाहता। दुनिया के झमेलों में पड़कर अपनी मंज़िल नहीं बदल सकता, रास्तों को नहीं मोड़ सकता।
स्वाभाविक है कि आज तक ऐसा जिन आदर्श व्यक्तियों ने किया है वे अपनी व्यक्तिगत ज़िन्दगी के लिए दूसरों पर निर्भर रहे। मुझे भी अपने उद्देश्यों के लिए दूसरों पर निर्भर रहना स्वीकार है। मेरी पृष्ठभूमि जिन लोगों पर आधारित है, उनका मैं ऋणी हूँ और हमेशा रहूंगा।
ज़िंदगी में बहुत कुछ गुलिवर के विस्मय जैसा घटित हो रहा है। दूसरे इस विस्मय को नहीं समझ सकते। खैर, मैं इस विस्मय को दूसरों में बांटकर उन्हें परेशान नहीं करना चाहता क्योंकि मेरी ज़िंदगी कोई और नहीं जी सकता और मैं किसी और की ज़िंदगी नहीं जी सकता।
मैं जानता हूँ मेरा लक्ष्य बहुत बड़ा है, बहुत कठिन है फिर भी मुझे स्वयं पर और उस शक्ति पर विश्वास है और जैसा कि मेरे पसंदीदा पवित्र ग्रन्थ श्रीमद्भागवतगीता ने कहा है-
कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन।
मा कर्मफल हेतुर्भुर्मा ते संगोस्तवकर्मणि।।
-२८ नवम्बर १९९७

Instinct (अंतर्प्रेरणा)…

How deep the ocean of thoughts is, don’t know… Why, after a long interval, the same conditions appear those I tried to remove some time ago.

-1 Sep 1997.

Instinct…

Completeness is a word for a criterion but in real a state of completeness can never get. Completeness for one criterion proves incomplete for other criteria. Just as when a glass full of water is poured in a jar, the jar will be incomplete. So water is not ever complete or incomplete It is measure which may complete or incomplete. In similar manner Knowledge can never be complete or incomplete. One who says that he has full knowledge of the subject they fool do not know that the criterion of brain is too voluminous so nobody can be full of knowledge in any subject. Knowledge is immeasurable. Only it may be more or less than others criteria…

-13 Sep. 1997

अंतर्प्रेरणा…
पूर्णता एक शब्द है, एक मापदंड के लिए, लेकिन वास्तव में पूर्णता की स्थिति कभी प्राप्त नहीं की जा सकती। जिसे हम एक मापदंड के लिए पूर्णता कहते हैं, दूसरे बड़े मापदंड पर वह अपूर्ण सिद्ध होती है। जिस प्रकार एक गिलास में पानी पूरा भरा हुआ है और उस पानी को किसी बड़े जार में डाल दिया जाए तो जार अपूर्ण सिद्ध होगा अतः पानी कभी पूर्ण या अपूर्ण नहीं नहीं होता, केवल मापदंड पूर्ण-अपूर्ण हो सकते हैं। ठीक इसी प्रकार ज्ञान कभी पूर्ण नहीं हो सकता। जो यह कहते हैं कि मुझे इस विषय में पूर्ण ज्ञान है वे मूर्ख ये नहीं जानते कि मस्तिष्क का मापदंड बहुत स्थूल है इसलिए कोई भी किसी भी विषय में पूर्ण ज्ञानी नहीं हो सकता, ज्ञान तो अथाह है। केवल वह दूसरों के मापदंड से काम या ज्यादा हो सकता है…

-१३ सितम्बर १९९७

Talk to loneliness (तन्हाई से बातें)…

Golden opportunity comes in disguise in every person’s life, people who become conscious and identify the opportunity and hold and use it, shine like a diamond. People who lose it they spend their life as burden.

-23 Feb. 1997

 

On the ground of Sacraments, on the background of Thoughts and feelings Ideals and conduct are built.

-3 Apr. 1997

 

From the beginning wisdom has the power to rule on the power of force and always force relies on intelligence. So to make yourself the most powerful make your mind strong.

-4 Apr. 1997

 

Truth provides us boldness and courage.

-12 Apr. 1997

 

Truth gives us strength, the strength that increases confidence and confidence gives self-saturation, so we should not do such a deed to hide the truth which drop us in our eyes.

-13 Apr. 1997

 

The streams of rivers which flow stragglingly without direction to make their independent existence and divert from the actual river, they make their existence only in pits, ponds or as drains filled with filth and the water streams flow in the same direction as the river, they finally fall into the sea and ensure their existence as the sea. Ditto, if we become devoid of purpose and start spending our life in momentary pleasures then the end of our existence will like a dirty drain. If we are not affected by the momentary pleasure and only forward in achieving our objective then it will be merged into the existence of ultimate life.

-21 May 1997

 

Wise, intelligent and masters do not deviate from their path for the sensation of momentary pleasures.  They want to be lost in the climax heights which are beyond the pleasure and pain. Where there is no difference between pleasure and pain. And that is the limitless enjoy.

-21 may 1997

 

I had read somewhere that one day hunger and thirst erases the difference between a rich and a poor but when I think, I find, hunger and thirst leads to a rich man’s wrath and a poor man’s habit. When Problems often arise then man gets its habitual and becomes indifferent.

-1 July 1997

तन्हाई से बातें…
हरेक व्यक्ति के जीवन में सुनहरा अवसर भेष बदल कर जरूर आता है लेकिन वे जो समय रहते सचेत हो जाते हैं और अवसर को पहचान कर उसे पकड़ लेते हैं, उसका उपयोग कर लेते हैं, चमक जाते हैं। जो इसे खो देते हैं वे अपना जीवन बोझ की तरह बिताते हैं…
-२३ फरवरी १९९७
संस्कारों के धरातल पर, विचारों और भावनाओं की पृष्ठभूमि पर ही आदर्शों और आचरणों का निर्माण होता है।
-३ अप्रैल १९९७
आरम्भ से ही बुद्धि की सत्ता बल की सत्ता पर शासन करती आई है और सदैव ही बल बुद्धि पर निर्भर रहा है इसलिए यदि अपने आपको सबसे अधिक बलवान बनाना हो तो अपनी बुद्धि को बलवान बनाओ।
-४ अप्रैल १९९७
सत्य हमें निडरता व साहस प्रदान करता है।
-१२ अप्रैल १९९७
सत्य से हमें बल मिलता है, वह बल जो आत्मविश्वास को बढ़ता है और आत्मविश्वास से आत्म-संतृप्ति प्राप्त होती है, इसलिए सत्य को छिपाने के लिए कोई भी कार्य ऐसा नहीं करना चाहिए जो हमें अपनी ही नजरों से गिरा दे…
-१३ अप्रैल १९९७
नदियों की वे धाराएं, जो अपना स्वतंत्र अस्तित्व बनाने के लिए दिशा-विहीन होकर अलग बहने लगती हैं तथा वास्तविक नदी से कट जाती है, वे अपना अस्तित्व सिर्फ गड्ढों, पोखरों या बजबजाती नालियों के रूप में ही बना पाती हैं और जो जल धाराएं नदी की ही दिशा में प्रवाहित होती हैं वे अंत में समुद्र से मिल जाती हैं और अपना अस्तित्व भी समुद्र के ही रूप में बनाती हैं। ठीक इसी प्रकार यदि हम उद्देश्य विहीन होकर क्षणिक आनन्दों में अपना जीवन बिताने लगें तो अंत में हमारा अस्तित्व भी गन्दी नाली की तरह होगा और यदि उनसे प्रभावित न होकर केवल अपने उद्देश्य-पूर्ति में अग्रसर हों तो यह जीवन समुद्र के अस्तित्व में विलीन हो जाएगा।
-२१ मई १९९७
बुद्धिमान, विवेकशील तथा योगी पुरुष क्षणिक आनन्दों की अनुभूति के लिए अपने मार्ग से विचलित नहीं होते, वे चरमोत्कर्ष की उन ऊंचाइयों में विलीन हो जाना चाहते हैं, जो सुख और दुःख के परे हो, जहाँ सुख और दुःख में कोई अंतर न हो और यही असीम आनंद है…
-२१ मई १९९७
कहीं मैंने पढ़ा था कि एक दिन की भूख और प्यास एक अमीर और एक गरीब के बीच का भेद मिटा देती है लेकिन मैं विचार करता हूँ तो पाता हूँ कि भूख और प्यास एक अमीर आदमी के क्रोध का कारण बनती है और एक गरीब आदमी के लिए एक आदत। जब समस्याएं बार-बार आती हैं तो आदमी उनका अभ्यस्त हो जाता है और उनसे उदासीन हो जाता है…
-१ जुलाई १९९७
विचारों का सागर न जाने कितना गहरा है? क्यों एक लम्बे अंतराल के बाद फिर वही परिस्थितियां आकर सामने खड़ी हो जाती हैं जिन्हें मैंने कुछ समय पहले दूर करने की कोशिश की थी…
-१ सितम्बर १९९७

What is life (ज़िंदगी क्या है)…

 

Life…

A compromise of a few breaths…

Life is the horizon, which makes one the land and the sky far…

But what is the life in real… an illusion, in which all of us are confused…

Life is a mirage in the hot desert sun which wanders the wanderer mind thirsty in the desert of sorrow…

Life is an unsolved puzzle, Life is one such magic that we open a door and consider that we had success, but after opening the door, what we find? We find one more door and then go ahead to open it… And then we find the same situation when it opens… we find one more door again to open, just as the other mirror in front of a mirror forms innumerable image… Mirror inside the mirror… Mirror inside the mirror… Mirror inside the mirror… And we cannot find the end of the image. Life is a bolide which never happened to anyone and ended up dissolving in the universe. Lives are the dew drops which flicker on the base of soft grass due to the kindness of velvet sunshine and trap the beauty of the nature for a few moments and then disappear in a while seeing the horrible sun with its impetuosity.

Life is a fun which appears in kiss of buds, in the hum of bumblebees, in the twitter of birds but for how long… until the buds do not become flower and until the flower do not dry and dissolve in the same soil with which it existed.

Life is a fun… It is an opiate. It is a slow poison which slowly takes us in its arms and makes us plastered. And finally leaves a deep silence…  deserted wild…  and some tears of repentance…  The tears of repentance, which he gains by doing sin, injustice and deceit done in the whole life and he goes on and on to live his life. And the life, like a disloyal beloved goes away leaving everything and until man understands it is too late by then. And there is the deep abyss of death in front, seeing which he remains thrash about and then looks for the footprints of the life. But by going there everything is over… everything…

Based on my direct experience I ever not able to get more life. And as much as I solved this puzzle It went more complicated… In this small life if the mystery guidance of a sort found then I would consider myself his debtor.

-15 Feb 1997

ज़िंदगी क्या है…

ज़िंदगी,
एक समझौता है चंद सांसों का…
ज़िंदगी वह क्षितिज है, जो दूर से ज़मीन और आसमान को एक करती है,
पर वास्तव में क्या है?
एक भ्रम जिसमे सभी भ्रमित हैं…
ज़िंदगी रेगिस्तान की तपती धूप में वह मारीचिका है, जो मन के पथिक को दुःख के मरुस्थल में प्यासा भटकाती है। ज़िंदगी एक अनसुलझी पहेली है, ज़िंदगी एक ऐसा तिलिस्म है कि इसके एक दरवाजे को खोल कर हम समझते हैं कि हमने सफलता हासिल कर ली, लेकिन दरवाजा खोलने पर हम क्या पाते हैं ? हम पाते हैं एक और दरवाजा, और फिर उसे खोलने के लिए जुट जाते हैं। उसे खोल कर हम फिर वही स्थिति पाते हैं कि सामने एक और बंद दरवाजा मौजूद है खोलने के लिए, ठीक वैसे ही, जैसे एक आईने के सामने दूसरे आईने को रखने पर उसके असंख्य प्रतिबिम्ब बनते जाते हैं, आईने के अंदर आईना.. आईने के अंदर आइना… आईने के अंदर आइना, और इस तरह प्रतिबिम्ब के छोर को ढूंढ नहीं पाते। ज़िंदगी एक टूटता हुआ तारा है जो कभी किसी का नहीं हुआ और ब्रह्माण्ड में ही विलीन होकर रह गया। ज़िंदगी ओस की वे बूँदें हैं जो कोमल घांस के आधार पर सूरज की मेहरबानी पर टिमटिमाती हैं, कुछ पलों के लिए प्रकृति की छटा अपने भीतर कैद कर लेती हैं और फिर सूरज का विकराल रूप देखकर उसकी प्रचंडता से थोड़ी देर में लुप्त हो जाती हैं…
ज़िंदगी एक मस्ती है, जो नज़र आती है- कलियों के चुम्बन में, भंवरों के गुंजन में और पंछियों के कलरव में, पर कब तक? केवल तब तक, जब तक कि कली खिलकर फूल न हो जाए, और फूल सूखकर, झड़कर उसी मिटटी में न मिल जाए, जिससे कि उसका अस्तित्व है, ज़िंदगी एक मस्ती है, एक नशा है, एक धीमा ज़हर है, जो धीमे-धीमे अपने आगोश में लेती है, मदहोश करती जाती है और अंत में अपनी जगह छोड़ जाती है एक गहरी ख़ामोशी, सन्नाटा, सुनसान वीराना और पश्चाताप के चंद अश्क़, उन पाप, अन्याय और फरेब के बदले में, जो आदमी ज़िंदगी के विश्वास पर किये जाता है, जिए जाता है और जिए जाता है… और यह बेवफा महबूबा की तरह सब कुछ छोड़कर, अपना दामन झाड़कर चली जाती है, और जब तक आदमी समझ पाता है तब तक बहुत देर हो चुकी होती है और सामने होती है मौत की गहरी खाई, जिसे देखकर वह छटपटाता रह जाता है और फिर ढूंढता है ज़िंदगी के क़दमों के निशान लेकिन वहां जाकर सब कुछ ख़त्म हो जाता है, सब कुछ…
मैं आज तक अपने अनुभवों और प्रत्यक्षों के आधार पर ज़िंदगी को इससे ज्यादा नहीं समझ पाया हूँ और इस पहेली को जितना सुलझाया उतना ही इसमें उलझता गया। अपनी इस छोटी सी ज़िंदगी में यदि इस रहस्य को किसी के मार्गदर्शन में सुलझा पाया तो अपने आप को उसका ऋणी समझूंगा…
-१५ फरवरी १९९७

Loneliness says (तन्हाई बोलती है)…

Before we put our unshakable faith on a person we should examine that he is worthy for that or not…

Trust and reverence are two different phases. Trust in excess of requirement culminated in reverence and sometimes excess of reverence is also deceived…

Self-respect purifies the personality but the ego drops the person…

I do not trust anyone except my will power and the God…

The conditions and circumstances of a man makes and deteriorates him but the man who passes through a period of adversity and difficult circumstances, there is greatness in his achievements…

Often we think about the other person that why he is not like this, why he is like that, but we don’t think that what are the circumstances behind ‘why he is not like this, why he is like that’…

-30 April 1996

The extra economic growth causes downgrade…

-24 May 1996

The extra wealth corrupts the intelligence…

-25 May 1996

When I consider my imagination power, I Find that even ordinary events and things have a profound impact on me. I turn very emotional. I do not know what power is within me, in form of gland or organ which pulls me in a different world. Many times such thoughts ferment in mind which has no logic behind them and then these remains suppressed in the mind…

-8 Sep 1996
तन्हाई बोलती है…
किसी व्यक्ति पर अटूट श्रद्धा रखने से पहले यह परख लेना चाहिए कि वह इसका पात्र है भी या नहीं…
विश्वास और श्रद्धा दो अलग-अलग अवस्थाएं हैं। आवश्यकता से अधिक विश्वास की परिणति श्रद्धा में होती है और कभी-कभी आवश्यकता से अधिक श्रद्धा धोखा भी खा जाती है…
स्वाभिमान व्यक्तित्व को निखारता है लेकिन अहंकार व्यक्ति को गिराता है…
मैं कभी किसी पर भरोसा नहीं करता सिवाय ईश्वर और अपने आत्मबल के…
परिस्थितियां और हालात आदमी को बनाते या बिगाड़ते हैं लेकिन जो आदमी विपरीत परिस्थितियों और कठिन हालातों के दौर से गुजरता है, उसकी उपलब्धियों में महानता होती है…
अक्सर हम दूसरे व्यक्ति के बारे में सोचते हैं कि वह ऐसा क्यों नहीं है, वैसा क्यों है लेकिन ये नहीं सोचते कि उसके ऐसा होने या वैसा न होने के पीछे क्या परिस्थितियां हैं…
-३० अप्रैल १९९६

आवश्यकता से अधिक आर्थिक उन्नति अवनति का कारण बनती है…
-२४ मई १९९६
आवश्यकता से अधिक धन संपत्ति बुद्धि को भ्रष्ट कर देती है…
-२५ मई १९९६
जब मैं अपनी कल्पना शक्ति पर विचार करता हूँ तो पाता हूँ कि साधारण से साधारण घटनाओं और बातों का भी मुझ पर बहुत गहरा प्रभाव पड़ता है। मैं बहुत ज्यादा भावुक और जज़्बाती हो जाता हूँ। मालूम नहीं मेरे अंदर ऐसी कौन सी शक्ति ग्रंथि या इन्द्रिय के रूप में है, जो मुझे इस ओर खींचती है। कई बार ज़हन में ऐसे विचार उफनते हैं जिनके पीछे कोई तर्क नहीं मिलते और फिर वो ज़हन में ही दबे रह जाते हैं…
-८ सितम्बर १९९६

Days gone by (बीते हुए दिन)…

(Hi friends …

Now you will read the events of my life chronologically.

For the convenience I am mentioning the date and time as required…

Let’s enjoy the truth…)

 

What is a Person, It is not more important rather important is that why he is so…

-10 April 1996

Days gone by

‘Childhood’, how beautiful is this word…

And even more beautiful are memories associated with it. There is no one who has not lived the experience. There is no one who has not tasted its sweet and sour experiences in his life.

Well…  I can’t say about others but when I remember those moments, the heart becomes tempted to get back those moments. Childhood is the name of Innocence and naivety. There is neither truth nor lie, neither good nor bad in this stage. There is simply own persistence and a little wayward mind which flies in the open sky spreading the wings of thoughts and its false and non-logical fantasies are so beautiful that putting everything in its own color and way to its imagination is not less than a supernatural feelings.

By seeing every geographic-natural and material things of the world mind frames which stories, I wish to feel them again but alas! It is not possible to include these feelings in any book or any media…

-28 April 1996

(प्रिय मित्रों,
अब आप मेरे जीवन की घटनाओं को सिलसिलेवार पढ़ेंगे। सुविधा के लिए मैं आवश्यकतानुसार घटनाक्रम का दिनांक तथा समय के साथ उल्लेख कर रहा हूँ। आशा है मेरे इस प्रयास से आप लाभान्वित होंगे। तो आइये, सत्य के मार्ग की इस अद्भुत अद्वितीय यात्रा का आनंद लेते हैं… )
व्यक्ति क्या है यह अधिक महत्वपूर्ण नहीं है, बल्कि महत्वपूर्ण यह है कि वह वैसा क्यों है…
-३१ अप्रैल १९९६

बीते हुए दिन…
‘बचपन’, कितना खूबसूरत है यह शब्द…
और इतनी ही खूबसूरत है इससे जुडी यादें। ऐसा कोई नहीं जिसने इस अनुभव को प्राप्त न किया हो। ऐसा कोई नहीं जिसने अपनी जिंदगी में इसकी खट्टी-मीठी यादें न चखीं हों। खैर, दूसरों के अनुभव के बारे में तो मैं नहीं कह सकता लेकिन अपने अनुभवों को याद करके आज भी मन लालायित हो उठता है उन क्षणों को पुनः पाने के लिए…
बचपन नाम ही अनजानेपन और भोलेपन का है। निश्छलता और निर्दोषता की इस अवस्था में सच-झूठ, बुरा-भला, पाप-पुण्य कुछ नहीं होता, बस अपनी एक हठ होती है और अपना एक छोटा सा स्वच्छंद मन, जो कल्पनाओं के पंख लगाकर खुले आकाश में उड़ता रहता है और इसकी झूठी और गैर-तार्किक कल्पनाएं भी इतनी खूबसूरत होती हैं कि हर चीज को अपने रंग-ढंग में ढालकर उसकी कल्पना करना किसी अलौकिक दिव्य भावों की अनुभूति से कम नहीं होता।
संसार की हर भौगोलिक-प्राकृतिक और भौतिक वस्तुओं को देखकर मन जो कहानियां गढ़ता है, उन्हें मैं फिर से महसूस करना चाहता हूँ, लेकिन अफ़सोस कि इन अनुभवों का किसी किताब या आधुनिक साधनों में समावेशित होना संभव नहीं है…
-२८ अप्रैल १९९६

What is reverence in the present context (वर्तमान परिप्रेक्ष्य में श्रद्धा का महत्त्व)…

The modern era is the era of miracles of science. Current perspective we find surrounded by materialism. But in fact we all tend to engage in more current perspective, our ethical standards equally drops…

If we want the world to know the original significance, we find materialism is behind the cover of Nature. First nature occurred then materialism evolved gradually. In the modern era, everything is weighed in the scales of logic but there are some situations that have to accept as concept, which do not get a reasonable answer. Appeasement of such conditions is not by arguments but by faith. Such as when a child goes to school to gain knowledge of primary education, he tends to know the alphabets, he can’t find logic here. He has to accept all and everything as it is. If the first word from the mouth of the baby is ‘mom’ there is no logic behind it. There is an inner strength rooted in reverence. Faith does not have any form or shape nor any measure, as it is seen by adjusting and focusing the power of the mind it is seen the same. In fact, reverence is a refined form of belief. Reverence has higher level than trust. It is a state of mind which is derived from the ripening of trust.

A passer-by kicks a stone on his way and other can install it on a platform as a statue of God but the God is not in the stone, it is in our assumption. The above interpretation can be understood by an incident.

Swami Vivekananda (the famous Indian monk) once invited to dinner by a king. King was an atheist and was not a believer in Divine Power. Swamiji arrived at the time appointed with him. The king asked after the formal hospitality whether he believes in the existence of God. The king asked that he can’t see the God but why people recite God’s name very often. Swamiji was silent after hearing the questions. He cast his eyes on the walls of the castle then his vision stayed on a picture. When he asked about the picture the king bowed head with great reverence and told that he is his late father . Swami ji expressed his desire to see the picture by near. The king ordered to bring the picture and gave the picture to swamiji. Swamiji put the picture on the floor and asked the king to spit on the picture. So had to be the king became furious and replied that he can’t do such a foolish thing with the picture as it was his most respected father’s picture. After hearing  the king’s answer swamiji smiled and told him that this photo is nothing more than a glass and a piece of paper but it has a great value for you. Quite similar what is stone for you, is God for others. What you see It depends on vision not on the subject. So reverence is above arguments always.

*(written – 31 Jan 1996, It was my first article I think in some essay competition.)

वर्तमान परिप्रेक्ष्य में श्रद्धा का महत्त्व…
आधुनिक युग विज्ञान के चमत्कारों का युग है। वर्तमान परिप्रेक्ष्य को हम भौतिकवाद से घिरा पाते हैं किन्तु वास्तव में हम जितने अधिक वर्तमान परिप्रेक्ष्य में जुड़ते जाते हैं, यथार्थ के धरातल से परे उड़ते जाते हैं। आधुनिक युग में बाह्य आडम्बर, दिखावटीपन और खोखलेपन का समावेश है। हम जितना अधिक इससे जुड़ते जाते हैं उतना ही हमारा नैतिक स्तर गिरता जाता है।
यदि हम संसार के मूल में छिपे महत्त्व को जानना चाहें तो भौतिकवाद के पीछे निसर्ग का आवरण मिलता है। पहले प्रकृति उत्पन्न हुई और उसके बाद भौतिकता की धीरे-धीरे उत्पत्ति हुई। आधुनिक युग में हर बात को तर्क की तराजू में तौल जाता है लेकिन कुछ स्थितियां ऐसी होती हैं जिन्हें अवधारणा के रूप में स्वीकारना पड़ता है, जिनके कोई तर्कसंगत उत्तर नहीं मिलते। इस प्रकार की स्थितियों का सन्तुष्टिकरण तर्कों से नहीं वरन श्रद्धा से होता है। जैसे कोई बच्चा जब प्राथमिक शिक्षा का ज्ञान पाने पाठशाला जाता है। तो उसे वर्णमाला तथा अक्षर ज्ञान दिया जाता है। इनके पीछे कोई तर्क नहीं होता। इन्हें यथावत स्वीकार करना पड़ता है। शिशु के मुख से यदि पहला शब्द ‘माँ’ निकलता है तो उसके पीछे कोई तर्क नहीं होता। उसमें आतंरिक शक्ति श्रद्धा के रूप में निहित होती है। श्रद्धा का कोई रूप-आकार नहीं होता इसे तो मनः-शक्ति को केंद्रित और समायोजित करके जिस रूप में देखा जाता है उसी रूप में यह दिखाई देती है। श्रद्धा वास्तव में विश्वास का एक परिष्कृत रूप है जो विश्वास से ऊंचे स्तर पर होती है। यह एक मनः-स्थिति है जो विश्वास के पकने पर प्राप्त होती है। किसी भी वस्तु को हम जिस रूप में मान्य करते हैं, उसी में श्रद्धा उत्पन्न हो जाती है। एक पत्थर को राहगीर ठोकर मरकर चल देता है लेकिन उसे ही यदि किसी चबूतरे पर रखकर उस पर जल चढ़कर पुष्प, सिन्दूर अर्पण करने लगें तो वह भगवान का रूप ले लेता है किन्तु भगवान उस पत्थर में नहीं वरन हमारी मान्यता में होता है और यही मान्यता श्रद्धा होती है।
उपरोक्त व्याख्या को एक घटना द्वारा समझा जा सकता है –
एक बार स्वामी विवेकानंद को एक राजा ने अपने घर भोज पर आमंत्रित किया। राजा नास्तिक था और ईश्वरीय शक्ति में आस्था नहीं रखता था। स्वामी जी उसके यहाँ नियत समय पर पहुंचे, औपचारिक आवभगत के बाद राजा ने एक प्रश्न किया कि क्या आप भी भगवान के अस्तित्व में विश्वास करते हैं? सभी भगवान-भगवान करते हैं लेकिन भगवान है कहाँ? मुझे तो कहीं दिखाई नहीं देता? स्वामी जी उसका प्रश्न सुनकर कुछ क्षण मौन रहे फिर उन्होंने अपनी दृष्टि भवन की दीवारों पर डाली और एक तस्वीर पर केंद्रित कर दी और राजा से उस तस्वीर के बारे में पूछा। राजा ने बड़ी श्रद्धा के साथ नत-मस्तक होते हुए बतलाया कि ये मेरे पूज्य पिताजी की तस्वीर है जिनका स्वर्गवास हो चुका है। स्वामी जी ने उस तस्वीर को करीब से देखने की इच्छा व्यक्त की तो राजा ने वह तस्वीर सहर्ष उन्हें मंगवाकर दी। स्वामी जी ने अगले ही क्षण वह कीमती फ्रेमजड़ित तस्वीर उस राजा के पैरों के पास पटक दी और इससे पहले कि राजा कुछ समझ पाता या गुस्से से लाल-पीला हो पाता, स्वामी जी ने उसे उस तस्वीर पर थूकने को कहा और राजा बिना कुछ सोचे-विचारे बौखला गया और क्रोध में आकर उसने अपशब्द तक कह डाले। बाद में क्रोध की स्थिति से बाहर आने पर वह शर्मिंदा हुआ और शांत होते हुए उसने कहा कि ये मेरे पूज्य पिताजी हैं, मैं इन पर थूकने जैसा घृणित कार्य कैसे कर सकता हूँ? यह सुनते ही स्वामी जी मुस्कुराये और बोले कि तुम्हें इस तस्वीर पर थूकना स्वीकार नहीं है और यदि मेरी जगह किसी और ने यह बात कही होती तो शायद तुम उसे नुकसान पहुँचाने से भी नहीं चूकते क्योंकि तुम्हारी दॄष्टि में इनके लिए असीम श्रद्धा है पर दूसरे के लिए तो यह मात्र एक कागज का टुकड़ा है, ठीक उसी प्रकार जिस प्रकार दूसरे के लिए जो ईश्वर है वह तुम्हारे लिए पत्थर है, मेरी नजर में यही आस्था श्रद्धा है और श्रद्धा को किसी तर्क की आवश्यकता नहीं, श्रद्धा तर्कों से ऊपर है। यह सुनते ही राजा की आँखों से अश्रुधारा गिर पड़ी और अपनी गलती का एहसास कर वह स्वामी जी के चरणों में गिर पड़ा।
अतः वर्तमान परिप्रेक्ष्य में गिरते हुए नैतिक स्तर को बढ़ने के लिए आध्यात्मिक श्रद्धा (आस्था) का होना अत्यंत अनिवार्य है।
-३१ जनवरी १९९६