My Resolution… (मेरा संकल्प… )

Protest done by a person is the language of his bitter experiences through which he has undergone..
-28 Sep 2000

We fail because invest ourselves in small joys received and forget our important goal.
-5 Aug 2000

My Resolution…

Today I am very happy, on my failure, on my success, on my circumstances, on every moments of pleasure and sorrow of my life… Every event in the world has significance. Every event in the world has its cause. It is the cause which changes in the act and again act becomes a cause for another act. After our effort we get results. The results only are the operator of our circumstances. I am pleased on my failure also because my present is according to me. Despite those setbacks the conditions are exactly as I wanted.
Sometimes we shudder on minor injuries; we exasperate on ourselves or start to seek a chance to remove our exasperation on others. If someone says that these injuries also give something then perhaps you wonder but I have felt this truth. I have got much more with these injuries but for that you must have a vision, you must have awareness, and you must have a conscience.
There are two principles of my life –
(1) Live in Celibacy and should achieve my objectives.
(2) Dedicate the life to death as I experience fulfillment of purpose.

There were some questions emerging frequently from childhood in my mind which are still stood in the same way on my psyche. Equally deep, equally clear…
(1) What is life? What is our existence? Is it also a dream-like state or its reality? When we dream, we not know that it is a dream. The dream also gives us illusion of reality. Appearance of dream only occurs when we break our sleep and come into waking state. How do we then know that we are not sleeping with respect to another unknown state? We come to know only when we should go beyond the second stage and the second stage is the stage after the death and that is my second question.
(2) What is death? How does it experience? To get the experience is my intense longing of my childhood. If it would possible, I would experience it in living state.
(3) Some people’s dreams and hopes requires sacrifice for my purposes, I have to do it. I have to extend my circle; I have to break my social circle. For my objectives it is essential that I would not live a normal family life and would try to attain them living in celibacy. There are many reasons behind my this decision-
(1) I want freedom for my actions and do not want any obstacles.
(2) I am not satisfied myself then how could I satisfy anyone else? I do not want to ruin someone else’s life by adding it with me.
(3) I do not want to live in a world as a crowd. Eat, drink and go to sleep and increase congestion by generating child unreasonably may not be my aim. 95 percent people of the world just follow the society’s rules blindly without using their discretion and live normal life. I’m not one of them.
(4) In the contemporary age it is impossible to carry the principles and marital life together. If you want to bring up your family in this black age (kalyug) than you have to live according to the kalyug. You cannot fulfill your family’s needs unless you do not admit a little wrong, immoral or against the rules. To date, I have not seen a family go and stand in the way of the full truth and honesty. You can muster the ability to withstand the risks in the path of truth but you cannot force your dependents to walk on it. I can leave anything for my principals but can’t leave my principals at any cost.
(5) The future is now ruined because of population growth so what will happen tomorrow, it is harder to predict. Of course, there is no problem even today for those, who do not think, just go to do. And can follow any path for self accomplishment. And can ruin someone else’s work to make their work.
(6) I am the ultimate selfish. Self satisfaction is always foremost to me. And Self satisfaction is only possible when I stay unmarried. Either you can satisfy yourself or your family.

Flame of inspiration is burning inside me forever which says, my life does not have to spend my own, I have to preserve it for others. For me life is a challenge, so I have pledge not to marry lifetime. Because my life is just answers to those two questions, nothing else…
-7 Sep 2000

It’s so easy to blame others; it’s so hard to lay beyond our own personality from flaws. If you want to impress others with your personality, first you have to depurate your own personality.
-8 Oct 2000

All life is a place of desires. All the heart has lust. But some of us tend to bury those understanding blank concepts and some go crazy for them. Who go crazy for them they are the achievers.
-14 Oct 2000

किसी व्यक्ति द्वारा किया गया विरोध उसके कटु अनुभवों की भाषा होती है, जिनसे वह गुज़र चुका होता है।
-२८ सितम्बर २०००
हम असफल होते हैं,क्योंकि प्राप्त होने वाली छोटी-छोटी खुशियों में अपने महत्वपूर्ण लक्ष्य को भुला बैठते हैं।
-५ अगस्त २०००
मेरा संकल्प…
आज मैं बहुत खुश हूँ, अपनी असफलताओं पर, अपनी सफलताओं पर, अपनी परिस्थितियों से, अपनी ज़िंदगी के हर सुख दुःख भरे लम्हों से… दुनिया में हरेक घटना का एक महत्त्व होता है, एक कारण होता है। ये कारण ही कार्य में परिवर्तित होता है और कार्य फिर से कारण बन जाता है। कोई भी बात निरर्थक नहीं होती। हमें अपने प्रयासों के बाद जो परिणाम प्राप्त होते हैं, वही हमारी परिस्थितियों के संचालक होते हैं। हमें पता भी नहीं चलता और हम धीरे-धीरे उन परिस्थितियों में ढलते चले जाते हैं। मैं अपनी असफलताओं पर भी खुश हूँ क्योंकि मेरा आज मेरे अनुसार है। उन असफलताओं के बावजूद परिस्थितियां ठीक वैसी ही हैं, जैसी मैं चाहता था। कभी-कभी हम छोटी-छोटी चोटों पर तिलमिला उठते हैं, अपने आप पर खीझ उठते हैं या दूसरों पर खीझ निकालने के मौके तलाशने लगते हैं पर यदि आपसे कोई कहे कि ये चोटें भी कुछ देकर जाती हैं तो शायद आश्चर्य ही हो पर मैंने इस सच को महसूस किया है, मुझे इन चोटों से बहुत कुछ मिला है। मुझे ही नहीं बल्कि मुझसे पहले कई लोगों को इनसे बहुत कुछ मिला है। इन्हे समझने के लिए एक अलग दृष्टिकोण चाहिए, एक अलग जागरूकता चाहिए, एक होश चाहिए, एक चैतन्यता चाहिए।
मेरी ज़िंदगी के दो मुख्य सिद्धांत हैं –
(१) अविवाहित जीवन जीकर अपने उद्देश्यों को प्राप्त करूँ।
(२) उद्देश्य पूर्ति का आभास होते ही अपना जीवन मौत को समर्पित कर दूँ।
बचपन से मेरे विचारों में कुछ प्रश्न उभरते थे। जो आज भी मेरे मनस-पटल पर उसी तरह उभरे हैं। उतने ही गहरे, उतने ही स्पष्ट, उतने ही साफ़। ये प्रश्न हैं –
(१) जीवन क्या है? हमारा अस्तित्व क्या है? क्या यह भी सपने जैसी ही कोई अवस्था है या फिर वास्तविकता क्योंकि जब हम सपना देखते हैं तब यह नहीं जान पाते कि हम सपना देख रहे हैं। वह सपना ही हमारे वास्तविक जीवन का आभास देता है। सपने का आभास तब होता है जब हम एक अवस्था (सुप्त-अवस्था) को तोड़कर जाग्रत अवस्था में आते हैं, फिर ये कैसे पता चले कि हम किसी दूसरी अवस्था के सापेक्ष वर्तमान में सो नहीं रहे हैं। यह सिर्फ तभी पता चल सकता है जब अवस्था परिवर्तन हो, जब हम दूसरी स्थिति के पार चले जाएं और दूसरी स्थिति है मौत के बाद की स्थिति, जो की मेरा दूसरा प्रश्न है।
(२) मौत क्या है? इसका अनुभव कैसा होता है? इस अनुभव को पाने की मेरी बचपन से तीव्र लालसा रही है। यदि संभव होता तो मैं इसे जीवित अवस्था में ही अनुभव कर लेता। मेरे उद्देश्यों के लिए कुछ लोगों के सपनों और आशाओं के बलिदान की आवश्यकता है, जो कि मुझे देना होगा। मुझे अपना दायरा बढ़ाना है, इसके लिए मुझे अपने सामाजिक दायरे को तोड़ना होगा। मेरे उद्देश्यों के लिए यह आवश्यक है कि मैं सामान्य पारिवारिक जीवन का निर्वाह न करते हुए अविवाहित जीवन जीते हुए इनकी प्राप्ति का प्रयास करूँ। मेरे इस निश्चय के पीछे भी कई कारण हैं –
(१) मैं अपने कार्यों में स्वतंत्रता चाहता हूँ और किसी भी प्रकार की बाधाएं नहीं चाहता।
(२) मैं स्वयं ही अपने-आप से संतुष्ट नहीं हूँ तो किसी और को क्या संतुष्ट कर पाऊंगा? इसलिए मैं अपने साथ किसी और को जोड़कर उसका जीवन बर्बाद नहीं करना चाहता।
(३) मैं दुनिया की भीड़ में जीना नहीं चाहता। खा-पीकर सो जाना और बच्चे पैदा करके अकारण ही भीड़ बढ़ाना और अपने साथ उनका भी जीवन बर्बाद करना मेरा ध्येय नहीं हो सकता। दुनिया के ९५ प्रतिशत लोग अपने विवेक का उपयोग किये बिना समाज के नियमों का अंधानुकरण करते हैं। आवश्यकता और सार्थकता को समझे बिना लोग अपने से पहले वाली पीढ़ी का अनुसरण करते हैं और सामान्य जीवन व्यतीत करते हैं। मैं उनमे से एक नहीं हूँ।
(४) आज के युग में सिद्धांतों और वैवाहिक जीवन को एक साथ लेकर चलना असंभव है। यदि आप अपने परिवार को पालना चाहते हैं तो इस कलयुग में कलयुग के ही अनुसार जीना होगा। आप अपने परिवार की आवश्यकताएं तब तक पूरी नहीं कर सकते जब तक की थोड़ा बहुत गलत, अनैतिक या नियमों के विरुद्ध नहीं करते। आज तक मैंने ऐसा कोई परिवार नहीं देखा जो पूर्णतः सच्चाई और ईमानदारी की राह पर चलकर बना हो। सत्य के रास्तों में आने वाली बाधाओं का सामना करने का सामर्थ्य आप तो जुटा सकते हैं लेकिन अपने आश्रितों को उस पर चलने के लिए बाध्य नहीं कर सकते। मैं अपने सिद्धातों के लिए सब कुछ छोड़ सकता हूँ लेकिन सिद्धांतों को किसी भी कीमत पर नहीं छोड़ सकता।
(५) जनसंख्या वृद्धि के कारण मारामारी में आज का भविष्य चौपट है तो कल का क्या होगा इसका अंदाजा लगा पाना भी मुश्किल है। हाँ, उन लोगों के लिए आज की स्थिति में भी कोई परेशानी नहीं है जो सोचते नहीं, बस करते चले जाते हैं और स्वार्थ-सिद्धि के लिए किसी भी रास्ते को अपना सकते हैं और किसी और का काम बिगाड़ कर अपना काम बनाना जानते हैं।
(६) मैं परमस्वार्थी हूँ, आत्मसंतुष्टि को सर्वोपरि समझता हूँ और आत्मसंतुष्टि केवल तभी संभव है जबकि मैं अविवाहित रहूँ। या तो आप स्वयं को संतुष्ट कर सकते हैं या अपने परिवार को।
सदा से मेरे भीतर एक प्रेरणा ज्योति जल रही है की मेरा जीवन केवल अपने ही लिए खर्च करने के लिए नहीं। मुझे दूसरों के लिए इसे संरक्षित रखना है। मेरे लिए यह जीवन एक चुनौती है। इसलिए मैंने जीवन भर विवाह न करने की भीष्म प्रतिज्ञा की है क्योंकि मेरा जीवन उन दो प्रश्नो का उत्तर मात्र है और कुछ नहीं…
-७ सितम्बर २०००
औरों पर दोषारोपण करना जितना आसान है, स्वयं के व्यक्तित्व को दोषों से पर रखना उतना ही मुश्किल। यदि दूसरों को अपने व्यक्तित्व से प्रभावित करना हो तो पहले स्वयं के व्यक्तित्व को निखारना होगा, उसे दोषरहित करना होगा…
-८ अक्टूबर २०००
अभिलाषाओं का स्थान सभी के जीवन में होता है। अभिलाषाएं सभी के ह्रदय में होती हैं लेकिन हम में से कुछ उन्हें कोरी कल्पनाएं समझकर बिसार देते हैं और कुछ उनके लिए पागल हो जाते हैं। जो अपनी अभिलाषाओं के लिए पागल हो जाते हैं वे ही उपलब्धियां हासिल करते हैं…
-१४ अक्टूबर २०००

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