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Discovery of the truth … 6 (सत्य की खोज…6)

Adventure of the Truth…

Discovery of the truth … 6

20 November 2003

Like the sun what else needs to publish the truth, it is self-luminous.

-8: 30 a.m.

Today I am at peace, do not know this is the peace after the storm or before the storm?

-8: 32 p.m.

Our old experiences (dogmas) are our enemy that not only let us to reach to the reality of the new experience but mixes them with it in between imperfectly. It is the same as to bilge and have the unripe grapes without waiting for the ripening and understand that I have known the am the taste of this fruit, this is very sour.

-8:45 a.m.

The unanswered question is better than answered incorrectly.

-8: 50 a.m.

Do not reach at a decision quickly, decision taken quickly is fatal.

-9: 00 a.m.

The sense of diversity and resultant division is the feces of knowledge, is the illusion of knowledge. The knowledge of our Ignorance is the only true knowledge.

Weakness is circumstantial illusion and strength is eternal truth.

-9:35 a.m.

Life is a deep intoxication, I’m feeling it.

The voice of the spirit attracts the spirit provided ears of spirit should be open.

-10: 58 a.m.

The strangeness of the experience has brought me to a supernatural world, where my whole existence has become sight.

-11: 22 a.m.

The river of questions has begun to flow Incessant, whose sole answer is-‘The absolute truth’, which will be obtain on reaching at the cradle of the river.

-12: 10 p.m.

The origin of ideas is mind; the origin of sentiments is heart. Consciousness is the source of mind and the heart and the source of the consciousness is soul. What is the source of the absolute soul (God)?

-12: 20 p.m.

I’m heading to the simplicity from complexity or from simplicity to complexity? The heart is being comfortable but mind is being involved in complexity.

-12: 25 p.m.

Am I the artist of the drama of the life or the director? or both?

-12: 28 p.m.

There is now a desire to listen to the silence but within the clamor of grievances is created.

-12: 35 p.m.

I am a wave, whose diameter is gradually increasing. A micro-wave coming from the center wants to be superimposed on me. My existence wants to fade by spreading away in the endless sea.

-12: 40 p.m.

Why attempt to solve every problem of outer world brings in the inner world?

-12: 50 p.m.

Is our weakness, our inability and our not to oppose injustice not our sin? Is it not our fault that we cannot do anything? To do injustice and to suffer injustice, the reason of both is ignorance.

-6: 25 p.m.

There is no place for faith, dedication and following In search of the truth. Only true courage, confidence and conduct of truth can be took ahead us on the path the truth.

-6: 45 p.m.

In the final stages of life, up to the last beat we hope that if just a breath just another breath we manage to get. Know your every breath is your last breath.

-8: 50 p.m.

Hunger and thirst are man’s primary requirements; their repression may not be solution to a problem. Their suppression begins to mental disorders. Man’s first religion is to meet them but we have to remember that it should not become the taste gluttony.

-9: 00 p.m.

The first need to follow the path of truth is – ‘ justice with own.’

-9: 15 p.m.

Now my external unconsciousness, at work, started to feel me senselessness and thoughtlessness.

-9: 20 p.m.

Despite of having two separate eyes you cannot focus on two goals simultaneously because your attention (mind) is the same.

When you have two different tasks at the same time then you feel apparently that our attention focuses on the two different functions, but it does not. Your focus stays of course on both tasks but not simultaneously but alternately.

-10: 25 p.m.

I’ve often experienced the meditation at two places, in writing ghazals and in humming ghazals.

-10: 45 p.m.

I do not any claim that everywhere I’m right, these are just my experience, these are based on what I have experienced and these are authentic to me but that would be true for everyone in every situation, I do not have any prejudice for that. My experience will be relative to others and relativity does not reveal the truth but misconception.

-11: 40 p.m.

I accepted the challenge of my life. Do you have this courage?

-11: 50 p.m.

I have experienced that the sound proves to be more effective in place of scene in taking us towards meditation. Sight works to spreads your attention in scenes while the work of the ears is to focus the attention.

-11:50 p.m.


सत्य की खोज…6

20 नवंबर २००३

सूर्य की भांति सत्य को प्रकाशित होने के लिए किसी और की क्या आवश्यकता, वह तो स्वयं ही प्रकाशमान है।

-८:३० a.m.

आज मैं एक शांति का अनुभव कर रहा हूँ, पता नहीं ये तूफ़ान के बाद की शांति है या तूफ़ान के पहले की?

-८:३२ a.m.

शत्रु हैं हमारे पुराने अनुभव (रूढ़ियाँ) जो हमें नए अनुभव की वास्तविकता तक पहुँचने ही नहीं देते बल्कि बीच में ही अधूरेपन में उन्हें अपने साथ मिलाने लगते हैं। यह ठीक वैसा ही है जैसा कि पकने की प्रतीक्षा किये बिना ही उतावलेपन में अंगूर को कच्चेपन में तोड़ लेना और ये समझना कि मैं इस फल का स्वाद जान गया हूँ, ये बेहद खट्टा होता है।

-८:४५ a.m.

गलत उत्तर से अनुत्तरित प्रश्न ही अच्छा।

-८:५० a.m.

शीघ्रतापूर्वक किसी निर्णय पर मत पहुँचो, शीघ्रतापूर्वक लिया गया निर्णय घातक होता है।

-९:०० a.m.

विविधता का बोध और परिणामजन्य विभाजन ज्ञान का मल है, ज्ञान का भ्रम है। अपने अज्ञान का ज्ञान ही सच्चा ज्ञान है।

दुर्बलता परिस्थितिजन्य भ्रम है और शक्ति शाश्वत सत्य।

-९:३५ a.m.

ज़िंदगी एक गहरा नशा है, मैं इसे महसूस कर रहा हूँ।

आत्मा की आवाज आत्मा को आकर्षित करती है बशर्ते आत्मा के कान खुले हों।

-१०:५८ a.m.

अनुभवों की विचित्रता ने मुझे एक अलौकिक जगत में ला खड़ा किया है, जहाँ मेरा समग्र अस्तित्व दृष्टि बनकर रह गया है।

-११:२२ a.m.

प्रश्नों की नदी अनवरत बह चली है, जिनका एकमात्र उत्तर है-‘परमसत्य’, जो इस नदी के उद्गमस्थल पर पहुंचकर ही प्राप्त होगा।

-१२:१० p.m.

विचारों का उद्गम मन है, भावों का उद्गम ह्रदय। मन तथा ह्रदय का स्त्रोत चेतनता है तथा चेतनता का स्त्रोत आत्मा।  फिर परमात्मा का स्त्रोत क्या है?

-१२:२० p.m.

मैं जटिलता से सरलता की ओर बढ़ रहा हूँ या सरलता से जटिलता की ओर? ह्रदय सहज हुआ जा रहा है पर मन जटिलता में उलझता जा रहा है।

-१२:२५ p.m.

मैं जीवन के नाटक का पात्र हूँ या निर्देशक? या फिर एक साथ दोनों ही?

-१२:२८ p.m.

अब मौन को सुनने की इच्छा होती है पर अंदर व्यथाओं का कोलाहल मचा है।

-१२:३५ p.m.

मैं एक लहर हूँ, जिसका व्यास शनैः-शनैः बढ़ता जा रहा है। केंद्र से आने वाली एक सूक्ष्म लहर तेजी से मुझ पर आरोपित होना चाहती है। फैलते फैलते मेरा अस्तित्व मिट जाना चाहता है उस अनंत समुद्र में।

-१२:४० p.m.

बहिर्जगत की हर समस्या को हल करने का प्रयास अंतर्जगत में ही क्यों ले जाता है?

-१२:५० p.m.

क्या हमारी दुर्बलता, असमर्थता और अन्याय का विरोध न करना ही हमारा पाप नहीं? क्या यही हमारा दोष नहीं कि हम कुछ नहीं कर सकते? अन्याय करना और अन्याय सहना दोनों का कारण अज्ञानता है।

-६:२५ p.m.

सत्य की खोज में श्रद्धा, समर्पण और अनुसरण का कोई स्थान नहीं। केवल सच्चे साहस, आत्मविश्वास और सत्याचरण से ही सत्य की राह पर आगे बढ़ा जा सकता है।

-६:४५ p.m.

आखिरी धड़कन तक ये आस लगी रहती है कि बस एक सांस और मिल जाए। अपनी हर सांस को अपनी आखिरी सांस मानो।

-8:५० p.m.

भूख और प्यास मनुष्य की प्राथमिक आवश्यकताएं हैं, इनका दमन किसी समस्या का हल नहीं हो सकता। इनके दमन से मानसिक विकृतियां आने लगती हैं। इनकी पूर्ति करना मनुष्य का प्रथम धर्म है पर साथ ही ये भी ध्यान रखना होगा कि कहीं ये स्वाद लोलुपता न बन जाए।

-९:०० p.m.

सत्य के मार्ग पर चलने की सबसे पहली आवश्यकता है – ‘स्वयं के साथ न्याय।’

-९:१५ p.m.

अब मेरी बाह्य अचेतनता, कार्य के दौरान मुझे भाव -शून्यता तथा विचार -शून्यता का बोध कराने लगी है।

-९:२० p.m.

दो अलग-अलग आँख होते हुए भी आप दो लक्ष्यों पर एक साथ  ध्यान केंद्रित नहीं कर सकते क्योंकि आपका ध्यान (मन) एक ही है।

जब आप एक ही समय में दो अलग-अलग कार्य करते हैं तो आपको ये आभास होता है कि हमारा ध्यान दोनों कार्यों पर केंद्रित है परन्तु ऐसा होता नहीं है। आपका ध्यान जरूर दोनों कार्यों पर रहता है पर एक साथ नहीं बल्कि बारी-बारी से।

-१०:२५ p.m.

ध्यान का साक्षात्कार मैंने प्रायः दो जगह किया है, ग़ज़लें लिखते समय और ग़ज़लें गुनगुनाते समय।

-१०:४५ p.m.

मैं ऐसा कोई दावा नहीं करता कि मैं हर जगह सही हूँ, ये तो केवल मेरे अनुभव हैं, मेरे प्रत्यक्ष पर आधारित हैं, जो मेरे लिए पूर्णतः सत्य हैं पर हर परिस्थिति में हर किसी के लिए सत्य होंगे, ऐसा मेरा कोई पूर्वाग्रह नहीं है। दूसरों के लिए मेरे अनुभव सापेक्षिक होंगे और सापेक्षिकता सत्य नहीं आभास प्रकट करती है।

-११:४० p.m.

मैंने अपने जीवन की चुनौती स्वीकार कर ली है। क्या आप में है ये साहस?

-११:५० p.m.

मैंने अनुभव किया है कि दृश्य के स्थान पर ध्वनि ध्यान की ओर ले जाने में अधिक कारगर सिद्ध होती है। दृष्टि का काम है दृश्यों में आपके ध्यान को फैलाना जबकि कानों का काम है ध्यान संकुचित करना, ध्यान को केंद्रित करना।

-११:५० p.m.