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Discovery of the absolute truth … 1 (परमसत्य की खोज…१)

Adventure of the Truth…

Discovery of the absolute truth … 1

December 2, 2003

That which was fake, which was false, which was virtual, which was confusion, which was arrogance, broke down. Which is true, has survived.

-7: 25 a.m.

So far I used to think that dreams are unimportant, I understand that false imagery of mind, but now I think we have to get these fantasies of finding the truth. I considered them false imagination of mind so far, but now I think that further we have to discover the truth from these imaginations too. So let’s come and start the further journey with the dreams of last night…

First dream – I am moving with a corpse on a stretcher with some people, in my old school, in each class and seeking a proper place to put the corpse. Though the rooms are totally empty but what a surprise! It is raining torrentially from the roof of all the rooms. With people I try to put the corpse in each room but people with me start cry – ‘Hey! The corpse will rot here, let’s go somewhere else and seek the more suitable room.’

Thus we go to each room one by one and try to put the corpse but in each room we get the same torrential raining, then we go upstairs rooms. This way first floor, second floor, third floor… we get the same condition in each room. And finally, feeling defeated, we come out of there with the corpse.

Interpretation of the dream – I and the people with me are a sign to the world and that corpse is pointing to the trust. The huge rooms of the school buildings are pointing to the heart of the people. We are looking for a place in the hearts of others to put our faith, but like the corpse in the torrential rain, the trust is becoming mutilated everywhere. And finally I took my trust with me instead of putting my trust on others, that is I converted my trust into my self-confidence.

Second dream – I am travelling in a bus with my elder brother in relationship (I am not willing to reveal his name). There is no space to sit in the bus. We are sitting on the bottom (on the floor of the bus) and eating peanuts. I am eating peanuts and throwing its peels out of the bus and he is spreading it around him. After a while I looked at him, he is buried up to neck in the pile of peels thrown by himself. And I’m surprised to see him asking why they had not thrown out the peels.

Interpretation of dream – Just the two of us to be surrounded by the crowd is telling that we are struggling in the world. The sitting of us on the floor equally is expressing that he also have the same ground which is mine. Peels are our faults and disorders and peeled peanuts are the knowledge. I am assimilating the knowledge while throwing my faults and disorders outside and he is assimilating the knowledge but not throwing away his faults and disorders while spreading around him and after a while, he got suffer by his faults and disorder badly and I am asking him that why he didn’t throw away his faults and disorders, why he kept hugged them?

-9:48 a.m.

Now the only thing remains in my life – the distraction of thirst to meet the absolute power.’

I know the answer to each of your questions, I know the solution to every of your problems but I won’t give answer to any of your questions, because it will never become the answer to your problem, the answer will belong to me, not you.

-10:45 a.m.

I started to live in infinity.

What Rama, Krishna, Buddha, Jesus could not explain, Ramtirth, Shankaracharya and Vivekananda came to explain that. What they could not explain, Osho came to explain that and what Osho could not explain, I have come to explain that and what I shall not be able to explain, anyone else will come to explain that.

The reason behind the inability of all them was nothing but their high level. They were so higher in level that they could not be equivalent to the level of ordinary people.

-11: 14 a.m.

When you are fully prepared to assimilate that power, when you are fully able to conceive that power, when you become so powerful that you can conduct those powers, in these circumstances, the waiting for the absolute power with the true heart is the true worship. However absolute power doesn’t come to you but you approach to the absolute power by increasing your powers

-11:34 a.m.

The only prosperity of power can love. Lack of strength – weakness can never love. Infirmity can never give anything to anyone.

-11:36 a.m.

Self-hypnosis helps substantially to increase our powers. Whenever you feel infirmity, take its help. For this, look your eyes in your reflection in a mirror and focus your vision on your glabellas, on the command chakra and don’t look at anything else, Stay tuned for a while so, then give a positive suggestion to your mind, your courage and your strength will be increased.

-4:28 p.m.


परमसत्य की खोज…१

२ दिसम्बर २००३

जो नकली था, झूठा था, आभासी था, मिथ्या था, भ्रम था, दम्भ था, वह टूट गया, जो सत्य है वह बचा रह गया।

-७:२५ a.m.

अब तक मैं सपनों को महत्वहीन समझता रहा, मिथ्या कल्पना समझता रहा मन की, किन्तु अब मैं समझता हूँ कि हमें इन कल्पनाओं में से भी सत्य को ढूंढकर निकलना होगा। तो आइये, आगे की यात्रा शुरू करते हैं विगत रात्रि के स्वप्नों से-

पहला स्वप्न – मैं कुछ लोगों के साथ एक लाश को स्ट्रेचर पर लिए घूम रहा हूँ, अपनी भूतपूर्व शाला की विभिन्न कक्षाओं में और सभी कमरों में उस लाश को रखने के लिए उचित जगह की तलाश कर रहा हूँ। हालांकि कमरे तो पूरी तरह खाली हैं परंतु आश्चर्य कि सभी कमरों की छतों से बड़ी तेज मूसलाधार बरसात हो रही है। मैं लोगों के साथ उस लाश को हर कमरे में रखने की कोशिश करता हूँ पर साथ के लोग चिल्ला उठते हैं – ‘अरे! यहाँ तो लाश सड़ जाएगी, चलो कोई और कमरा देखते हैं।’ इस तरह हम बारी-बारी से सभी कमरों में जाकर उस लाश को रखने की कोशिश करते हैं। पर हर कमरे में उसी तरह मूसलाधार वर्षा मिलती है, फिर हम ऊपर के कमरों में जाते हैं। इस तरह पहली मंजिल, दूसरी मंजिल, तीसरी मंजिल… सभी कमरों में एक ही दशा देखने को मिलती है और हम हारकर उस लाश को अपने साथ लिए वहां से बाहर निकल आते हैं।

स्वप्न फल का अनुमान – मैं और मेरे साथ के लोग संसार की ओर संकेत कर रहे हैं। शाला के भवन के विशालकाय कक्ष लोगों के ह्रदय को इंगित कर रहे हैं। हम अपना विश्वास लिए दूसरों के ह्रदय में जगह ढूंढ रहे हैं, अपना विश्वास रखने के लिए, परंतु हर जगह विश्वास उस लाश की तरह मूसलाधार बारिश में भीग कर क्षत-विक्षत होता जा रहा है। और अंत में मैंने दूसरों पर विश्वास न रखकर अपना विश्वास अपने साथ ले लिया अर्थात दूसरों पर विश्वास को मैंने आत्मविश्वास में परिणित कर लिया।

दूसरा स्वप्न – मैं अपने रिश्ते के एक बड़े भाई (नाम नहीं लेना चाहूँगा) के साथ एक बस में सफर कर रहा हूँ। बस में बैठने के लिए बिलकुल जगह नहीं है। हम सीट के नीचे की सतह ( बस के फर्श) पर बैठे मूंगफली खा रहे हैं।  मैं मूंगफली खाकर छिलके बस की खिड़की से बाहर फेंकते जा रहा हूँ और वे अपने आस-पास ही फैलाते जा रहे हैं। कुछ देर बाद जब मैंने उनकी तरफ देखा तो वे गर्दन तक अपने ही फैलाए छिलकों के ढेर में दब गए हैं। और मैं आश्चर्य से उन्हें देखकर पूछ रहा हूँ कि उन्होंने ये छिलके बाहर क्यों नहीं फेंके। स्वप्नफल का अनुमान – बस में भीड़ से हम दोनों का घिरा होना ये बता रहा है कि हम दोनों संसार में संघर्ष कर रहे हैं। फर्श पर समानता से बैठना ये व्यक्त कर रहा है कि उनका भी धरातल वही है जो मेरा है। छिलके हमारे दोष-विकार हैं और मूंगफली के दाने ज्ञान हैं। मैं ज्ञान ग्रहण करके अपने दोषों और विकारों को बाहर फेंकते जा रहा हूँ और वे ज्ञान ग्रहण करके भी अपने दोष विकारों को अपने से अलग न फेंककर अपने चारों तरफ फैलाते जा रहे हैं और थोड़ी देर बाद वे अपने दोष-विकारों से बुरी तरह ग्रस्त हो गए और मैं उनसे कह रहा हूँ कि उन्होंने अपने दोष-विकारों को अपने से दूर क्यों नहीं फेंक, अपने गले क्यों लगाए रखा।

-९:४८ a.m.

अब केवल एक ही चीज बची है मेरे जीवन में – ‘परम मिलन की प्यास की व्याकुलता।’

मैं तुम्हारे हर प्रश्न का उत्तर जानता हूँ, तुम्हारी हर समस्या का हल जानता हूँ पर तुम्हारे किसी भी प्रश्न का उत्तर नहीं दूंगा क्योंकि वह उत्तर तुम्हारी समस्या का समाधान कभी नहीं बन सकेगा। वह उत्तर भी मेरा ही होगा, तुम्हारा नहीं।

-१०:४५ a.m.

मैं अनंत में जीने लगा हूँ।

जो बात राम, कृष्ण, बुद्ध, ईसा नहीं समझा पाए, वो बात समझाने शंकराचार्य, रामतीर्थ और विवेकानंद आए।  जो बात ये लोग नहीं समझा पाए वो बात समझाने ओशो आए और जो बात ओशो नहीं समझा सके वो बात समझाने मैं आया हूँ। जो बात मैं नहीं समझा सकूंगा, उसे समझने कोई और आएगा।

इन सबकी असमर्थता का कारण और कुछ नहीं बल्कि इनका उच्च स्तर था। वे इतने उच्च स्तर पर थे कि अपना स्तर जान सामान्य के स्तर के बराबर नहीं कर सके।

-११:१४ a.m.

जब आप पूरी तरह से तैयार हो जाते हैं उस शक्ति को आत्मसात करने के लिए। जब आप पूरी तरह से समर्थ हो जाते हैं उस शक्ति को ग्रहण करने के लिए, जब आप इतने शक्तिशाली हो जाते हैं की उन शक्तियों का संचालन कर सकते हैं, तब इन परिस्थितियों में सच्चे ह्रदय से उस परम शक्ति की जो प्रतीक्षा होती है, वही सच्ची पूजा होती है।

हालांकि परमशक्ति आपके पास नहीं आती बल्कि आप स्वयं पहुँचते हैं उस परमशक्ति के पास, अपनी शक्तियों में निरंतर वृद्धि करते हुए।

-११:३४ a.m.

शक्ति की सम्पन्नता ही प्रेम कर सकती है। शक्ति का अभाव- दुर्बलता कभी प्रेम नहीं कर सकता। दुर्बलता कभी किसी को कुछ नहीं दे सकती।

११:३६ a.m.

आत्मसम्मोहन काफी हद तक सहायक होता है हमारी शक्तियों को बढ़ाने में। जब भी कभी दुर्बलता महसूस करो, इसकी सहायता लो। इसके लिए आईने में अपने प्रतिबिम्ब में अपनी आँखें देखो और अपनी दृष्टि केंद्रित कर दो भ्रूमध्य आज्ञा चक्र पर और कुछ मत देखो, कुछ देर तक इसी तरह देखते रहो, फिर मन को सकारात्मक आदेश दो।  तुम्हारा साहस और तुम्हारी शक्ति बढ़ी हुई प्रतीत होगी।

-४:२८ p.m.

Discovery of the truth…18 (सत्य की खोज…18)

Adventure of the Truth…

Discovery of the truth…18

December 2, 2003, Tue,

Now I am realizing that I was the Ram, I was the krishna, I was the buddha, I was the Jesus, I was the Mahavira, I was the Muhammad, I was the Vivekananda, I was the Osho.

It was me in these all, because I am the power of truth. Don’t start to worship me coming to my words; otherwise it will ruin my discovery of truth.

If you believe what I say, then awake them all inside. The more confident I am saying that you are the same, but I have known and you are ignorant. If you want to know, then start the “discovery of the truth”.

-12:15 a.m.

All religions are true at the beginning but people have deviated by walking for centuries on those ways, so I’ve come to show the way.

Instead of walking on these paths, people are applying vermilion on them, they are worshipping them by incense and they are offering coconuts so that God may come to them by those ways but neither the ways walk nor the God. Then people will have to walk to get the divine. Atheism was my confusion. Theism before the atheism was also an illusion of theism. Also, theism of all the people is the confusion of the theism. Today I am truly a theist. Today I have completed a phase of discovery of the truth. Now the second phase – discovery of the absolute truth, meeting the absolute strength, begins.

-12:45 a.m.


सत्य की खोज…18

2 दिसम्बर २००३

अब मैं अनुभव कर रहा हूँ कि राम भी मैं ही था, कृष्ण भी मैं ही था, बुद्ध भी मैं ही था, ईसा भी मैं ही था, महावीर भी मैं ही था, मुहम्मद भी मैं ही था, विवेकानंद भी मैं ही था, ओशो भी मैं ही था।

मैं ही तो था इन सब में क्योंकि मैं शक्ति हूँ सत्य की।

कहीं मेरी बातों में आकर मुझे भी इन्ही लोगों की तरह पूजने मत लग जाना, नहीं तो मेरी सत्य की खोज का बंटाढार हो जाएगा।

अगर मेरी बातों में विश्वास है तो अपने अंदर जगा कर देखना इन सबको। मैं उतने ही आत्मविश्वास से कह रहा हूँ कि आप भी वही हैं, पर मैं जान चुका हूँ और आप अनभिज्ञ हैं। यदि जानना चाहते हैं तो शुरू कर दीजिये ‘सत्य की खोज’।

-१२:१५ a.m.

सभी धर्म सत्य से ही शुरू हुए हैं किन्तु इतनी सदियों से लोग चलते-चलते भटक गए हैं इन रास्तों पर, इसलिए मैं आया हूँ रास्ता दिखाने।

लोग इन रास्तों पर चलने की बजाय इन्हें सिन्दूर, अगरबत्ती लगाकर पूज रहे हैं, नारियल फोड़कर प्रसाद चढ़ा रहे हैं कि परमात्मा इस रास्ते से चलकर इनके पास आ जाए पर न तो रास्ते चलते हैं और न ही वो परमात्मा। चलना तो लोगों को ही पड़ेगा उस परमात्मा को पाने के लिए। नास्तिकता मेरा भ्रम था। नास्तिकता के पहले की आस्तिकता भी आस्तिकता का भ्रम थी। सभी लोगों की आस्तिकता आस्तिकता का भ्रम ही है। सही मायने में आस्तिक मैं आज हुआ हूँ। आज मेरी सत्य की खोज का एक चरण पूर्ण हुआ। अब दूसरा चरण शुरू होता है, उस परम सत्य की खोज का, परम शक्ति से मिलन का।

-१२:४५ a.m.

Discovery of the truth…17 (सत्य की खोज…17)

Adventure of the Truth…

Discovery of the truth…17

December 1, 2003, Mon,

Whole night my inner positive energy fought with the negative energy and after a tough struggle the positive energy has defeated the negative energy, also defeated the intense invasion of sex. I undeterred by attacks of powers was tossing and turning all night.

-3: 50 A.m.

My mind has now started to obey my command.

-9: 07 A.m.

All my energy is focusing on my navel. This energy is now making me aware of the heat and vibrations.

-11: 46 A.m.

You are the flame, you are the light

You are the earth, you are the heaven.

You are in every direction, you are the sea shore and you are the bank of river,

You are all the thoughts originating from the zero.

You are the sun, you are the moon,

You are the microscopic stoma in the particles.

You are the word, you are the meaning,

You are the zero, you are the omnipotent.

You are the infinite inside the void,

You are the life inside the organism.

You are the trap, you are the liberation,

You are the greed, you are the tedium.

You are the sight, you are the creation,

You are the macro inside the micro.


You are the dream you are the reality,

You are the act you are the gratified.

You are the power, you are the power,

You are the power, you are that power.


Whom will you choose between the strength and weakness?

-10: 45 A.m.

Demolish all the walls of infirmity today,

Shed the current of power in each pulse today.

-12:20 p.m.

Forget the difference of sin and righteousness from your heart today,

Just lit the flame of the truth in the lamp of your heart.

-5: 05 p.m.

The rest with you, if you give a yes,

Break the pane and lead to a new world.

-3: 00 p.m.

I feel regret on the non-prosperity of words, worldwide words are short to express my feelings.

-3: 58 p.m.

If you will remain powerless like a straw, anyone will blow you.

-9:10 p.m.

As night falls, the effect of negative forces intensifies. In between brain seems stuck on zero. Vibrations of the brain seem to be fast. Fluctuations of breaths become faster. As much as the ultimate power may try the negative forces over me, I am not going to flee the field. I have full faith on my powers.

-9: 15 p.m.

To which the world considers my seriousness and indifference, it is my strong internal conflict, it is my constant self-observation. I see that how a seed fell on earth, how the dirt and clay covered it, how it sprouted, how the leaves came on it, how it became a plant and now, how it is going to be a sky-high huge tree.

Second, minute, hour, day, night, week and month nothing realizes me anything now. I’m just moving constantly toward my goal.

-10:30 p.m.

By escaping from his weaknesses, one cannot discover the truth.

-10: 45 p.m.

How many insects, flies, mosquitoes die every hour in the world? Who lament on those. Then why do you want to call the divine on the earth by stirring up the chaos on the death of any of your kinsfolk? Why do you expect him to come to mourn on your mourning, to weed, or to give you solace, you’re all insects for him.

Don’t cry, don’t entreat, don’t hit your head on stone that why doesn’t he listen to you. Buzzing of insects can’t reach his ears. Yes, of course he will listen to your voice, but at that time when you will not be the moth-pests, when you will awake up so much inner strength, that you will be equivalent to him. Then wake those powers from today, from now, which are sleeping within. Justice-injustice are the definitions given by your own, these are the rules of the world of you insects. These rules do not go into his world. There runs only one rule is’ the law of force.’ Power, power, power! Power itself is eternal truth.

-11:00 p.m.

The closed doors of my life, which were walls of prison for me, are now open for me. Suffering in the prison I had been only guessing the beauty of outside, but now revealed that what is freedom, what is the free flight, what is the beauty of the open sky, What is the greenery of the earth, what are the flowing picturesque waterfalls, how the outstretched arms of mountain ranges calls on its lap, what is a panoramic view of the forest. Now I am free from all worldly ties.

-11:47 p.m.


सत्य की खोज…17

1 दिसम्बर २००३

 रात भर मेरे भीतर की सकारात्मक ऊर्जा, नकारात्मक ऊर्जा से लड़ती रही और कड़े संघर्षों के बाद सकारात्मक ऊर्जा ने नकारात्मक ऊर्जा को परास्त कर दिया, काम के प्रबल आक्रमण को भी परास्त कर दिया। रात भर मैं शक्तियों के प्रहारों से व्याकुल हो करवटें बदलता रहा।

-३:५० a.m.

अब मन मेरे आदेश मानने लगा है।

-९:०७ a.m.

मेरी सारी ऊर्जा नाभि पर केंद्रित हो रही है। यह ऊर्जा मुझे उष्णता और स्पंदन का बोध करा रही है।

-११:४६ a.m.

ज्योति तुम, प्रकाश तुम

पृथ्वी तुम, आकाश तुम।

दिग्दिगंत में हो तुम, कूल और कछार तुम,

शून्य से उपज रहे समग्र ये विचार तुम।

सूर्य तुम हो चंद्र तुम,

कण में सूक्ष्म रंध्र तुम।

शब्द तुम हो अर्थ तुम,

शून्य तुम समर्थ तुम।

शून्य में अनंत तुम,

जीव में जीवंत तुम।

पाश तुम हो मुक्ति तुम,

लोभ तुम विरक्ति तुम।

दृष्टि तुम हो, सृष्टि तुम,

व्यष्टि में समष्टि तुम।

स्वप्न तुम यथार्थ तुम,

कृत्य तुम कृतार्थ तुम।

शक्ति तुम, शक्ति तुम,

शक्ति तुम वो शक्ति तुम।

शक्ति और दुर्बलता में से आप किसे चुनोगे ?

-१०:५५  a.m.

सब दीवारें दुर्बलता की आज ढहा दो,

रग-रग में शक्ति की धारा आज बहा दो।

-१२:२० p.m.

पाप-पुण्य का भेद ह्रदय से आज भुला दो,

ह्रदय दीप में सत्य की केवल ज्योत जला दो।

-५:०५  p.m.

है अख्तियार में तेरे, अगर तू हाँ कर दे,

फलक को तोड़ के पैदा नया जहाँ कर दे।

-३:०० p.m.

मुझे शब्दों की असम्पन्नता पर अफ़सोस होता है, दुनिया भर के शब्द कम हैं मेरे भावों को व्यक्त करने केलिए।

-३:५८ p.m.

अगर तिनके की तरह शक्तिहीन रहोगे तो कोई भी फूंक मार कर उड़ा देगा।

-९:१० p.m.

रात होते ही नकारात्मक शक्तियों का प्रभाव तेज हो जाता है। मस्तिष्क बीच-बीच में शून्य पर अटकने लगता है। मस्तिष्क के प्रकम्पन तेज होने लगते हैं। श्वास के उतार-चढ़ाव तेज हो जाते हैं। वो परमशक्ति मुझ पर चाहे जितनी नकारात्मक शक्तियां आजमा ले, मैं मैदान छोड़कर भागने वालों में से नहीं। मुझे अपनी शक्तियों पर पूरा भरोसा है।

-९:१५ p.m.

जिसे दुनिया मेरी गंभीरता तथा उदासीनता समझती है, वह मेरा कड़ा आतंरिक संघर्ष है, मेरा सतत आत्म अवलोकन है। मैं देख रहा हूँ कि कैसे एक बीज धरती पर पड़ा, कैसे उस पर धूल मिटटी चढ़ी, कैसे वह अंकुरित हुआ, कैसे उसमे पत्तियां आईं, कैसे वह पौधा बना और अब कैसे वह एक गगन चुम्बी विशाल वृक्ष बनने जा रहा है।

पल, मिनट, पहर, दिन, रात, हफ्ते, महीने अब किसी चीज का कोई आभास नहीं। बस मैं बढ़ जा रहा हूँ निरंतर अपने लक्ष्य की ओर।

-१०:३० p.m.

अपनी दुर्बलताओं से भागने वाला कभी सत्य की खोज नहीं कर सकता।

-१०:४५ p.m.

दुनिया में कितने कीड़े, मक्खी, मच्छर हर घंटे में मरते हैं? उन पर कौन शोक प्रकट करता है? फिर क्यों तुम अपने किसी सगे-संबंधी के मर जाने पर कोहराम मचाकर उस परमात्मा को धरती पर बुलाना चाहते हो? क्यों उससे अपेक्षा करते हो कि वह भी तुम्हारे शोक पर शोक मनाने आए, उसके लिए तो तुम कीड़े-मकोड़े ही हो।

रोओ मत, गिड़गिड़ाओ भी मत, पत्थर पर सर भी मत पटको कि वह तुम्हारी क्यों नहीं सुनता। कीट-पतंगों की भिनभिनाहट उसके कानों तक नहीं पहुँच सकती। हाँ, वह तुम्हारी आवाज जरूर सुनेगा, पर उस वक़्त जब तुम कीट पतंगे नहीं रह जाओगे, जब तुम अपने भीतर इतनी शक्ति जागृत कर लोगे कि उसके समतुल्य हो जाओगे। तो फिर उठाओ आज ही से, अभी से, अपने भीतर सोई हुई उन शक्तियों को। न्याय-अन्याय तो तुम्हारी ही दी हुई परिभाषाएँ हैं, तुम्हारी कीट-पतंगों की दुनिया के नियम हैं। ये नियम उसकी दुनिया में नहीं चलते। वहाँ सिर्फ एक ही नियम चलता है- ‘शक्ति का नियम।’ शक्ति, शक्ति, शक्ति ही शाश्वत सत्य है।

-११:०० pm

मेरे जीवन के बंद द्वार जो अब तक मेरे लिए कैदखाने की दीवार थे, अब मेरे लिए खुलते चले हैं। इस कैदखाने में छटपटाता हुआ मैं बाहर की सुंदरता का अब तक सिर्फ अनुमान ही लगाता रहा, पर अब पता चला है कि आजादी क्या होती है, स्वच्छन्दता की उन्मुक्त उड़ान क्या होती है, खुले आसमान का सौंदर्य क्या होता है, धरती की हरियाली क्या होती है, बहते हुए सुरम्य झरने क्या होते हैं, पर्वत श्रृंखलाएं कैसे बांहें पसारे अपनी गोद में बुलाती है, वन का मनोरम दृश्य क्या होता है। अब मैं मुक्त हूँ सारे सांसारिक बंधनों से।

-११:४७ pm