Discovery of the absolute truth … 5 (परमसत्य की खोज…5)

Adventure of the Truth…

Discovery of the absolute truth … 5

December 6, 2003

A few days ago I was a dog tied in my own bonds and I was considering that barking is my true power.

Now I am a lion roaming free in the woods, now I can feel the power direct in me.

-11: 07 p.m.

Now I’ve become flawless.

-8: 10 a.m.

The truth seems bitter to us; it pricks like a nail in the heart, why? Because we are so weak that we cannot accept the truth of our weakness.  We don’t have enough power to adopt the truth of our own weaknesses.

-8: 13 a.m.

Do not you want the lion’s fearlessness?

Don’t you want the intensity of power, within yourself?

If you want, then you will have to adopt the discovery of truth.

-8: 15 a.m.

A few days back I was chasing the life, now the life is chasing  me.

-8: 22a.m.

Order yourself, preach yourself.

If you never forget your purpose, no obstacle in the world can distract you from your path. No force in the world can stop you from reaching your goals.

-11: 50 a.m.

When a coconut is ripened completely, the inner shell is easily released when it breaks, but when the coconut remains raw then it is not possible to get it out completely.

The mind has to be prepared first to leave any defect-disorder. If your mind is ready then you can leave that bad practice without any difficulty. But if you want to leave it in your mind’s rawness then it will be very painful and eventually you will not be able to leave it.

-12: 01 p.m.

Generally, people take the meaning of renunciation from fear or hatred that they have abandoned something, they will be afraid of it all life, they will escape from it or abhor it, they will ignore it.

The true meaning of renunciation is that it should seem so worthless to you that the object should get out of your mind.

-12: 27 p.m.

In the domestic world, the touch of love and emotions is lost in the hearth and grinder, then about which love and affection among husband and wife people talk? There remains only needs – The needs of hospitality of the guests, the needs of their luxury, the necessity of upbringing of the children, the needs of their own livelihood of the couple. There remains only needs – their own needs of physical and mental hunger. There remains only conflict, then for which love and emotion people talk about? There remains only sentimentality, but sentimentality is not love and emotion; there is a momentary impulse, but love and emotions are not impulse but eternal cognition. Love does not take birth in bondage, it takes birth in liberation.

People’s love comes like storm and then goes out flowingly. That love is not love but lust. That is love is not love but impulse of fulfillment of desire. That love is not love but invasion of lust. Ever try to see your love being neutral, sincerely, you will find that your love is not love but craving to gain something, it is desire to achieve something, it is desire to gain someone’s faith, it is desire to get someone’s attention and mind, it is desire to get pleasure of somebody’s touch, it is desire to get somebody’s proximity, it is desire to get victory over someone’s mind, it is desire to make someone your slave, or it is desire to make himself someone’s slave.

There is very little difference in love and lust. It is not easy to understand. The excessive lack of love within us turns into lust whereas absence of lust is the only real love. Love is free of disorder, desire and bondage. Unless the man becomes free of disorder, desire and bondage, he can’t love truly. Love is the flow of extreme power, not morbidity and impoverishment. When power becomes so heavy that it cannot be handled, then it starts to spill in the form of love from your life. It does not have to show, it appears itself. Do not mistake to suppose love to your weakness, mental sickness, longing and lust.

-2: 14 p.m.

I am losing in void.

-3: 00 p.m.

We walk in such a journey throughout life that the beginning of which is not known to us, the end of which is not known to us; the goal of which is not known to us; path of which is not known to us. It’s a sheep move, our life, and nothing else.

Is this the real life? Originating from sex and getting dissolved in sex? To gasp away among struggles stuck in conflicts? Is this the real life?

If yes then what is the result of the conflict? What is the result of our struggle, void and nothing?

If not, why doesn’t anyone try to know? Why do all try to hide these questions, why do man run away fearing these questions. Accepting defeat from them, considering them God’s play, folding their hands and closing their eyes why people bury them?

If it is Lord’s play, then isn’t it our duty to know that Lord and his play and to be grateful towards him? When he has given us such a great wealth of power, why should we let our self be a puppet of his hands? Is not everyone’s duty to know the truth? Then why should we leave those mysteries as mysteries and why should we keep living like an insignificant insect? Why and how long should we run away from the truth, from absolute truth fearing those questions?

No not anymore…

-3: 25 p.m.

I used to consider life as a beggar but in its begging pot, there are countless diamonds.

-4: 35 p.m.

(अंतर्यात्रा)

परमसत्य की खोज…5

6 दिसम्बर २००३

कुछ दिनों पहले मैं अपने ही बनाए हुए बंधनों में बंधा कुत्ता था और भौंकने को ही अपनी असली शक्ति समझ रहा था।

अब मैं जंगल में आजाद घूमता हुआ शेर हूँ, अब शक्ति मुझमे प्रत्यक्ष है।

-११:०७ p.m.

अब मैं विकार शून्य हो गया हूँ।

-८:१० a.m.

सत्य हमें कड़वा लगता है, ह्रदय में शूल की भांति चुभता है, क्यों? क्योंकि हम इतने दुर्बल हैं कि अपनी दुर्बलता का सत्य भी स्वीकार नहीं कर सकते। हममें इतनी भी शक्ति नहीं की अपनी अशक्ति को अपना सकें अपनी दुर्बलता के सत्य को अपना सकें।

-८:१३ a.m.

क्या तुम नहीं चाहते सिंह जैसी निर्भयता ?

शक्ति की प्रचंडता, अपने भीतर ?

यदि चाहते हो तो तुम्हे भी सत्य की खोज को अपनाना पड़ेगा।

-८:१५ a.m.

कुछ दिन पहले मैं ज़िंदगी के पीछे भाग रहा था, अब ज़िंदगी मेरे पीछे भाग रही है।

-८:२२ a.m.

स्वयं को आदेश दो, स्वयं को उपदेश दो।

यदि तुम अपने उद्देश्य को कभी भी न भूलो तो दुनिया की कोई बाधा तुम्हे तुम्हारे मार्ग से विचलित नहीं कर सकती। दुनिया की कोई ताकत तुम्हे तुम्हारे लक्ष्य तक पहुँचने से नहीं रोक सकती।

-११:५० a.m.

जब एक नारियल पूरी तरह पक जाता है तो उसे तोड़ने पर भीतर का गोला आसानी से बाहर निकल आता है परन्तु जब नारियल कच्चा रहता है तब उसे साबुत बाहर निकलना संभव नहीं होता।

किसी भी दोष विकार को छोड़ने के लिए सबसे पहले मन को तैयार करना पड़ता है। यदि आपका मन तैयार है तो आप उस दुष्प्रवृत्ति को बिना किसी कठिनाई के छोड़ सकते हैं परन्तु यदि आप अपने मन के कच्चेपन  में उसे छोड़ना चाहते हैं तो वह बहुत कष्टदायक होगा और अंततः आप उसे नहीं छोड़ पाएंगे।

-१२:०१ p.m.

सामान्यतः लोग त्याग का अर्थ दर या घृणा से लेते हैं की किसी चीज का त्याग कर दिया याने उससे ज़िंदगी भर डरते रहेंगे, बचते रहेंगे या घृणा करते रहेंगे, उसकी उपेक्षा करते रहेंगे।

त्याग का सही अर्थ है कि वह वस्तु तुम्हे अपने लिए इतनी व्यर्थ लगने लगे कि उसका विचार भी तुम्हारे मस्तिष्क से निकल जाए।

-१२:२७ p.m.

गृहस्थ संसार में तो प्रेम और भावनाओं का स्पर्श चूल्हा-चक्की में उलझकर खो जाता है, फिर लोग पति-पत्नी में किस प्रेम और भावना की बात करते हैं? वहां तो केवल आवश्यकताएं रह जाती हैं – अतिथियों के आवभगत की, अपनी वैभव विलासिता की, बच्चों के पालन-पोषण की, दंपत्ति के स्वयं के उदर-पोषण की। वहां तो केवल आवश्यकताएं रह जाती हैं – स्वयं की शारीरिक और मानसिक भूख की। वहां तो केवल संघर्ष रह जाता है, फिर लोग किस प्रेम और भावना की बात करते हैं। वहां तो केवल भावुकता रह जाती है, पर भावुकता प्रेम और भावना नहीं होती, एक क्षणिक आवेग होता है, पर प्रेम और भावनाएं आवेग नहीं चिरस्थाई अनुभूति है। प्रेम बंधन में नहीं, मुक्ति में जन्म लेता है।

लोगों का प्रेम तूफ़ान की तरह आता है और बहकर निकल जाता है। वह प्रेम नहीं वासना है। वह प्रेम प्रेम नहीं इच्छापूर्ति का आवेग है। वह प्रेम प्रेम नहीं, आक्रमण है वासना का। कभी तटस्थ होकर देखें अपने प्रेम को, पूर्णतः ईमानदारी से, आप पाएंगे कि आपका प्रेम प्रेम नहीं लालसा है कुछ पाने की, इच्छा है कुछ हासिल करने की, इच्छा है किसी का विश्वास हासिल करने की, इच्छा है किसी का ध्यान तथा मन हासिल करने की, इच्छा है किसी का स्पर्श सुख हासिल करने की, इच्छा है किसी का सान्निध्य हासिल करने की, इच्छा है किसी के मन पर विजय हासिल करने की, इच्छा है किसी को अपना गुलाम बनाने की, या इच्छा है खुद को किसी का गुलाम बना देने की।

बहुत थोड़ा अंतर है प्रेम और वासना में। जिसे समझ पाना आसान नहीं है। हमारे भीतर प्रेम की अत्यधिक कमी वासना में बदल जाती है जबकि वासना की अनुपस्थिति ही वास्तविक प्रेम है। प्रेम है विकार मुक्त, कामना मुक्त, बंधन मुक्त। जब तक आदमी विकार मुक्त, कामना मुक्त, बंधन मुक्त नहीं हो जाता, तब तक वह सच्चा प्रेम नहीं कर सकता। प्रेम शक्ति की अतिशयता का प्रवाह है, रुग्णता और दरिद्रता नहीं। जब शक्ति इतनी अधिक हो जाए कि संभाले न सम्भले, तब वह प्रेम के रूप में छलकने लगती है आपके जीवन से। उसे दिखाना नहीं पड़ता, वह स्वयं ही प्रकट होती है। अपनी दुर्बलता, मानसिक रुग्णता, लालसा और वासना को प्रेम समझने की भूल न करें।

-२:१४ p.m.

मैं शून्य में खोने लगा हूँ।

-३:०० p.m.

हम ऐसे सफर में चलते हैं जीवन भर, जिसका आरम्भ हम नहीं जानते, जिसका अंत हमें नहीं मालूम, जिसका लक्ष्य हमें नहीं मालूम, जिसका मार्ग हमें नहीं मालूम। बस, एक भेड़ चाल है हमारा जीवन, और कुछ नहीं।

क्या यही है वास्तविक जीवन? काम से जनित होकर काम में विलीन हो जाना? संघर्षों में फंसकर संघर्षों के बीच ही दम तोड़ देना?

अगर हाँ तो फिर संघर्ष का परिणाम क्या है? हमारे संघर्ष का क्या परिणाम निकलता है, शून्य और कुछ नहीं। जीवन जहाँ से शुरू हुआ था, वहीँ पर आकर दम तोड़ देता है। जिन सवालों को लेकर जीव पैदा होता है, जीवन भर उन सवालों को दबाता है, छिपाता है अपने आप से, भागता है इन सवालों से, उपेक्षा करता है इन सवालों की और अंत में लड़ते हुए मर जाता है इन्हीं सवालों से, मर जाता है इन्ही सवालों को आँखों में लिए। आखिर क्या है इन सवालों का जवाब?

अगर नहीं मालूम तो कोई जानने की कोशिश क्यों नहीं करता? उन्हें छिपाने की कोशिश क्यों करते हैं सब, उसने डरकर क्यों भागता है इंसान, उनसे हारकर उन्हें भगवान या प्रभु की लीला मान हाथ जोड़कर, आँखें बंद कर उन्हें दफना क्यों देता है?

यदि वह प्रभु की लीला है तो क्या हमारा फर्ज नहीं की हम भी जानें उस प्रभु को, उसकी लीला को और कृतज्ञ हों उसके प्रति। जब उसने हमें शक्ति की इतनी बड़ी सम्पदा दी है तो खुद को उसके हाथों की कठपुतली क्यों बनने दें? क्या सत्य को जानना हर किसी का फर्ज नहीं? तो फिर क्यों हम उन रहस्यों को रहस्य ही बना रहने दें और क्यों एक क्षुद्र कीट की तरह जीते रहें? क्यों और कब तक भागते रहें उस सत्य से, परमसत्य से, उन सवालों से डरकर?

नहीं, अब और नहीं…

-३:२५ p.m.

मैं ज़िंदगी को भिखारिन समझता रहा पर इसके भिक्षापात्र में तो अनगिनत हीरे पड़े हैं।

-४:३५ p.m.