Discovery of the absolute truth … 6 (परमसत्य की खोज…6)

Adventure of the Truth…

Discovery of the absolute truth … 6

December 7, 2003

Now my dreams say that stay neutral, from the conflicts of the world. It is meaningless to be trapped in them and to waste our energy in vain. These conflicts will never end. Because untrue, ignorance will never end. There is just one way to remove them, to spread consciousness and awareness among people, to light the light of truth and knowledge.

-8:48 a.m.

Power is flawless, innocent, high-level will power; Love is a high level power. Devotion is not the fear of that unknown power, not the song of our weakness and its greatness, but it is simple-heartedness and high-level love.

-11:15 a.m.

Whenever any weakness attracts your mind, ask yourself this question –

‘Whom will you choose between strength and weakness? This is the power and that is the weakness.’

-12:08 p.m.

No sorrow, no happiness,

No cry, no laugh,

No weakness, no binding, no disorder,

No temblor of power,

Just apathy … tastelessness.

My feelings are dying,

My sensations are dying,

My thoughts are dying,

What kind of situation have I got?

 

Sex is the greatest power of man, But regret, it is the biggest weakness of people.

-4:30 p.m.

How wonderful is this world, where no one believes in truth? How wonderful is this world, where everybody considers truth to be a subject of ridicule? How strange is this world, where everyone wants to deny the direct truth which he sees from his eyes, wants to move forward ignoring it? Why the truth is so helpless even though is so powerful? How much have I become lonely in this world, holding the hand of truth? There is no one with me, except my soul, no one…

-5:45 p.m.

Don’t you touch the feet of your parents? Then why to blush to touch the feet of that superpower? What damage in bowing in front of that statue?

Absolutely, there is damage, we do not fall on the feet of the parents with that feeling, by which we fall on the feet of God. If we fall on the feet of God with the same spirit, with which we fall on the parents’ feet, then there is no harm, but this does not happen. We touch the feet of parents to take their blessings or to please them but when we touch the feet of God, we feel ourselves helpless; we feel ourselves powerless. We do not experience this when we touch parents’ feet. When we touch their feet, we only want blessings if we could make appropriate use of our power and efficiency. But when we fall on God’s feet, we forget our power and we make him responsible for our good and bad, which is not justified.

A person does not make his parents guilty of his ignorance and sorrows, then why does he make God culprit? My protest is not from the custom of touching feet but is from the false reverence, from the hypocrisy, from trickery. We kill him (God) immediately, when we touch his feet. We let him off from our mind. Touching feet is not as important as knowing him. He is only a question, do not stumble upon that question, do not kill it, try to know him and try to know its answer. The person who knows him begins to love him and where true love is manifested; where is the need for show off?

-6:50 p.m.

One who discovers the answer, the question dies for him. And the person who does not want to know the answer dies for the question. The question remains at its place.

-6:55 p.m.

Now I have started receiving the footprints of other great people on the path of truth. It means, I am not going in the wrong direction. My path is absolutely right.

-7:35 p.m.

I will not let prove people’s jokes to be true (my madness). I will prove people’s today’s joke wrong and turn them into repentance.

They are sad that I am going away from them. I am glad that I am coming closer to others. Woman knows how to gather, not to squander the day when she will know how to share; she will entitle the real love.

-7:50 p.m

(अंतर्यात्रा)

परमसत्य की खोज…6

7 दिसम्बर 2003

अब मेरे स्वप्न कहते हैं कि तटस्थ रहो, संसार की उलझनों से। इनमे फंसकर व्यर्थ ही अपनी शक्ति व्यय करना निरर्थक है। ये उलझने कभी खत्म नहीं होंगी क्योंकि असत्य, अज्ञान कभी ख़त्म नहीं होगा। इन्हें दूर करने का बस एक उपाय है, लोगों में चेतना और जाग्रति फैलाना, सत्य और ज्ञान की ज्योति जगाना।

-8:48 a.m.

शक्ति दोषरहित, निर्विकार, उच्चस्तरीय, आत्मबल है, प्रेम उच्च स्तरीय शक्ति है। भक्ति उस अज्ञात शक्ति से डर नहीं, अपनी दुर्बलता और उसकी महानता का गान भी नहीं, बल्कि सरल-हृदयता  है, उच्च स्तरीय प्रेम है।

-11:15 a.m.

जब भी कोई दुर्बलता तुम्हारे मन को आकर्षित करे, स्वयं से एक ही प्रश्न करो –

‘शक्ति और दुर्बलता में से तुम किसे चुनोगे? ये रही शक्ति और वो रही दुर्बलता।’

-12:08 p.m.

दुःख नहीं, ख़ुशी भी नहीं,

रुदन नहीं, हंसी भी नहीं,

दुर्बलता नहीं, बंधन नहीं, विकार नहीं,

शक्ति का कोई भूचाल भी नहीं,

बस एक उदासीनता… नीरसता।

मेरे एहसास मरते जा रहे हैं,

मेरी अनुभूतियाँ मरती जा रहीं हैं,

मेरे विचार मरते जा रहे हैं,

ये कैसी स्थिति में आ गया हूँ मैं?

 

काम (सेक्स) मनुष्य की सबसे बड़ी शक्ति है, परन्तु अफ़सोस कि काम ही लोगों की सबसे बड़ी कमजोरी है।

-4:30 p.m.

ये कैसा अद्भुत संसार है, जहाँ कोई सत्य पर विश्वास नहीं करता? ये कैसा अद्भुत संसार है, जहाँ हर कोई सत्य को हास परिहास का विषय समझता है? ये कैसा विचित्र संसार है, जहाँ हर कोई आँखों से दिख रहे प्रत्यक्ष सत्य को भी नकारना चाहता है, उसकी उपेक्षा कर आगे बढ़ जाना चाहता है, सत्य इतना शक्तिशाली होते हुए भी इतना लाचार क्यों है? मैं कितना अकेला हो गया हूँ, इस संसार में सत्य का हाथ थामकर? कोई नहीं है मेरे साथ, मेरी आत्मा के सिवा, कोई नहीं…

-5:45 p.m.

क्या तुम अपने माता-पिता के पैर नहीं पड़ते? तो फिर उस परमशक्ति के पैर पड़ने में कैसी शर्म? उस मूर्ति के सामने सर झुकाने में क्या नुकसान?

नुकसान है, बिलकुल है, माता-पिता के पैर हम उस भावना से नहीं पड़ते, जिस भावना से भगवान् के पड़ते हैं। यदि भगवान के पैर हम उसी भावना से पड़ें, जिससे माता-पिता के पड़ते हैं, तब तो कोई नुकसान नहीं, पर ऐसा होता नहीं है। हम माता-पिता के पैर पड़ते हैं उनका आशीर्वाद लेने के लिए या उन्हें खुश करने के लिए लेकिन भगवान के पैर पड़ते समय हम स्वयं को अशक्त अनुभव करते हैं, शक्तिहीन अनुभव करते हैं। माता-पिता के पैर पड़ते समय हम ऐसा अनुभव नहीं करते। उनके पैर पड़ते समय हम केवल आशीर्वाद चाहते हैं कि हम अपनी शक्ति तथा क्षमता का उचित प्रयोग कर सकें परन्तु भगवान के पैर पड़ते समय हम अपनी शक्ति को ही भुला देते हैं और अपने अच्छे-बुरे का जिम्मेदार उसे ही बना देते हैं जो कि न्यायसंगत नहीं है।

एक व्यक्ति अपने अज्ञान और दुखों का दोषी अपने माता-पिता को तो नहीं बनाता, फिर उसका दोषी वह भगवान को क्यों बनाता है? मेरा विरोध पैर पड़ने की प्रथा से नहीं है बल्कि झूठी श्रद्धा से है, आडम्बर से है, प्रवंचना से है। उसके पैर पड़कर हम उसे (परमात्मा को) तुरंत ही मार देते हैं, अपने दिमाग से उतार देते हैं। पैर पड़ना उतना महत्वपूर्ण नहीं है जितना कि उसे जानना। वह तो केवल एक प्रश्न है, पैर पड़कर उस प्रश्न को ठोकर मत मारो, उसकी हत्या मत करो, उसे जानने की कोशिश करो, उसका उत्तर जानने की कोशिश करो। जो उसे जान लेता है वह उससे सच्चा प्रेम करने लगता है और जहाँ सच्चा प्रेम प्रकट हो जाए वहां दिखावे की आवश्यकता ही कहाँ रह जाती है।

-6:50 p.m.

जो उत्तर जान लेता है, उसके लिए प्रश्न मर जाते हैं। और जो उत्तर नहीं जानना चाहता, वह प्रश्न के लिए मर जाता है; प्रश्न तो जहाँ का वहीं रह जाता है।

-6:55 p.m.

अब मुझे अपने सत्य के मार्ग पर अन्य महान लोगों के पदचिन्ह भी मिलने लगे हैं, याने मैं गलत दिशा में नहीं जा रहा हूँ। मेरा मार्ग बिलकुल सही है।

-7:35 p.m.

मैं लोगों के परिहास को सही (मेरा पागलपन) साबित होने नहीं दूंगा। मैं लोगों के आज के परिहास को गलत साबित कर पश्चाताप में बदल दूंगा।

उन्हें दुख है कि मैं उनसे दूर होता जा रहा हूँ। मुझे खुशी है कि मैं औरों के करीब आ रहा हूँ।

औरत समेटना (बटोरना) जानती है, लुटाना नहीं; जिस दिन वह लुटाना (बांटना) जान जाएगी उस दिन वह वास्तविक प्रेम की अधिकारिणी बन जाएगी।

-7:50 p.m.