Discovery of the absolute truth … 7 (परमसत्य की खोज…7)

Adventure of the Truth…

Discovery of the absolute truth … 7

December 8, 2003

A good swimmer does not enjoy the shallow edges, Similarly, a wise man does not enjoy the materialism.

-8:00 a.m.

In this world…

  1. How many such people are there, who have the courage to follow the life of truth to get that God?
  2. How many people are there, who want to struggle to get the true God (ultimate truth) leaving the false God?
  3. How many people are there, who are willing to give up their luxurious life for that ecstasy (God)?
  4. How many people are willing to give up their ignorance to relieve happiness and misery?
  5. How many people are there which have an indomitable courage to leave everything to get that true God?
  6. How many mothers are there, who can sacrifice (give up) their son in the name of god?
  7. How many wives are there, who can sacrifice (give up) their husbands in the name of god?

No one…? Then what wonder that he does not listen to you, then why lamentation that he is stern, sorrow giver. Stop shedding the false tear of crocodile. Stop condemning him. When you can’t be loyal to him, then how can you expect this from him? You yourself deal with him dishonestly and blame him! And you want to get his love too! Want to get his grace too!

Keep doing false worship, keep shaking bells, keep breaking coconut and keep on appealing. He will never listen to you, never, because your voice does not have the power of truth, there is shouting of lies and hypocrisy. There is no power of truth in your worship; there is manipulation of lies and hypocrisy.

There is no fragrance of truth in your incense sticks but a bad smell of lie and hypocrisy.

There is no feeling of true sacrifice in your coconut but the ill-will of bribe.

Your temple is not the home of truth but the place of demonstration of lies and hypocrisy and how can a true God live in a false place? Your life is a truss of lies. How can the God of truth comprise in it?

-8:50 a.m.

The fear of losing everything keeps a man away from the truth but the thing which can be snatched is not the truth, it is illusion, man considers it to be true and lives the life.

-8:52 a.m.

The nature of a woman is inherently of a retainer and a concomitant. It does not mean that she cannot rise above the man in power rather it means that as the woman is gentle organed in nature, in the same way, her mind is also very gentle and playful, and cannot have the necessary perseverance and patience for fulfillment of any purpose and it remains trapped in these illusory creation.

That is why the name of any woman is not found in the derivation of any religion and the name of women is secondary in all religions, the reason for this is that they know their safety only after staying behind the male. If the women could get the desired strength of the mind and ideas then she can move beyond the man in power.

-9:50 a.m.

Now my dreams have become the path to my goal.

-9:54 a.m.

Now acedia is my permanent sense.

-11:10 a.m.

It is preferable to sacrifice their lives on the dutiful path than to leave the field due to fear of conflicts.

-11:25 a.m.

The main purpose of living people is entertainment (fun). The purpose of my life is exaltation.

-11:35 a.m.

There is lust on one side of love and there is tedium on the other hand of it but love is absence of lust, love is absence of tedium. Love is neither tedium nor lust; rather, it is a situation between these two, but beyond these two.

-11:38 a.m.

(अंतर्यात्रा)

परमसत्य की खोज…7

8 दिसम्बर 2003

एक अच्छे तैराक को उथले किनारों पर मजा नहीं आता, इसी प्रकार एक सच्चे ज्ञानी को विषय-भोगों में मजा नहीं आता।

-8:00 a.m.

इस संसार में…

  1. ऐसे कितने लोग हैं, जो उस ईश्वर को पाने के लिए सत्य का आजीवन साथ देने का साहस रखते हैं?
  2. ऐसे कितने लोग हैं, जो उस झूठे ईश्वर को छोड़ सच्चे ईश्वर (परम सत्य) को पाने का संघर्ष करना चाहते हैं?
  3. ऐसे कितने लोग हैं, जो उस परमानन्द (ईश्वर) के लिए अपने भोग-विलास, सुख और सुविधाएं भी छोड़ देने को तैयार हैं?
  4. ऐसे कितने लोग हैं जो सुख-दुखों से मुक्ति हेतु अपने अज्ञान को छोड़ देने को तैयार हैं?
  5. ऐसे कितने लोग हैं जिनमें उस सच्चे ईश्वर को पाने के लिए सब कुछ छोड़ देने का अदम्य साहस है?
  6. ऐसी कितनी माताएं हैं, जो भगवान के नाम पर अपने बेटे का बलिदान दे सकती हैं, जो भगवान को पाने के लिए उसे त्याग सकती हैं?
  7. ऐसी कितनी पत्नियां हैं, जो भगवान के चरणों में अपने पति का बलिदान दे सकती हैं, जो भगवान को पाने के लिए उसे त्याग सकती हैं?

कोई नहीं…? तो फिर क्या आश्चर्य कि वह तुम्हारी नहीं सुनता, तो फिर कैसा रुदन कि वो निष्ठुर है, कठोर है, दुखदाई है। बंद करो अपने मगरमच्छ के झूठे आंसू बहाना। बंद करो उसे कोसना धिक्कारना। जब तुम सच्चे दिल से उसके नहीं हो सकते, तो उससे इस बात की उम्मीद कैसे कर सकते हो? खुद ही उसके साथ बेईमानी करते हो और उसे ही दोषी ठहराते हो! और उस पर उसका प्रेम भी पाना चाहते हो! उसकी कृपा भी पाना चाहते हो!

करते रहो झूठी पूजा, हिलाते रहो घंटियां, तोड़ते रहो नारियल, लगाते रहो गुहार। वो तुम्हारी कभी नहीं सुनने वाला, कभी नहीं, क्योंकि तुम्हारी आवाज में सत्य की शक्ति नहीं, झूठ और आडम्बर की चीख पुकार है। तुम्हारी पूजा में सत्य की शक्ति नहीं, झूठ और आडम्बर का प्रपंच है।

तुम्हारी अगरबत्ती में सत्य की सुगंध नहीं, झूठ और आडम्बर की दुर्गन्ध है।

तुम्हारे नारियल में सच्चे त्याग की भावना नहीं, रिश्वत की दुर्भावना है।

तुम्हारे मंदिर सत्यग्रह नहीं, झूठ और आडम्बर के प्रदर्शन स्थल हैं और झूठे स्थान में सच्चा ईश्वर कैसे रह सकता है?

तुम्हारा जीवन झूठ का पुलिंदा है। उसमे सत्य रुपी ईश्वर कैसे समा सकता है?

-8:50 a.m.

सब कुछ छिन जाने का भय ही आदमी को सत्य से दूर करता है, पर जो छीना जाता है वह सत्य नहीं भ्रम होता है, जिसे आदमी सत्य मानकर जीता है।

-8:52 a.m.

स्त्री की प्रकृति स्वभावतः अनुचरी तथा सहगामिनी की है। इसका अर्थ ये नहीं कि वह शक्ति में पुरुष से ऊपर नहीं उठ सकती बल्कि इसका अर्थ ये है कि जिस प्रकार नारी स्वभावतः कोमलांगी होती है, उसी प्रकार उसका मन भी अत्यधिक कोमल तथा चंचल होता है तथा किसी उद्देश्य पूर्ति के लिए आवश्यक दृढ़ता तथा धैर्य नहीं रख पाता तथा इन्हीं प्रपंचों में फंसकर रह जाता है।

यही कारण है कि किसी भी धर्म की व्युत्पत्ति में किसी नारी का नाम नहीं मिलता तथा सभी धर्मों में स्त्रियों का नाम द्वितीयक है, इसका कारण भी यही है कि उन्होंने पुरुष के पीछे रहने में ही अपनी सुरक्षा जानी है। यदि नारी में यह वांछित मन तथा विचारों की दृढ़ता आ जाए तो वह शक्ति में पुरुष से भी आगे बढ़ सकती है।

-9:50 a.m.

अब मेरे स्वप्न भी मेरे लक्ष्य का मार्ग बन गए हैं।

-9:54 a.m.

अब अनासक्ति मेरा स्थाई भाव है।

-11:10 a.m.

संघर्षों के भय से मैदान छोड़कर भागने की अपेक्षा कर्तव्यपथ पर अपने प्राणों की आहुति दे देना कहीं श्रेयस्कर है।

-11:25 a.m.

लोगों के जीने का अहम मकसद मनोरंजन (मजा) होता है। मेरा जीने का मकसद है आत्मोत्कर्ष।

-11:35 a.m.

प्रेम के एक और वासना है तो दूसरी ओर विरक्ति, पर प्रेम है वासनाशून्यता, प्रेम है विरक्ति का अभाव, प्रेम न तो विरक्ति है और न ही वासना बल्कि इन दोनों के बीच की स्थिति है पर इन दोनों से परे है।

-11:38 a.m.