Discovery of the absolute truth … 14 (परमसत्य की खोज…14)

Adventure of the Truth…

Discovery of the absolute truth … 14

December 15, 2003

When the fire of enlightenment burns, then it requires satsanga, self-study, self-examination, self-observation etc. to provoke it further so that it may not be extinguished again.

-7:30 a.m.

  • Love is spiritual attraction, lust is physical attraction.
  • Love always sacrifices its desires and remains satisfied and happy even by losing, lust always fulfils its desires and remains dissatisfied every time even after getting.
  • Love is power, lust is weakness.
  • When lust disappears then love appears, these two can never go together at all.
  • Lust is a lower state and love is higher than high.
  • Lust can be transformed into love and when lust is transformed in love then the creeper of love flourishes and spreads its flower’s fragrance in entire world.
  • Love is eternal smile of bliss, lust is the mourning of grief, is the lamentation of dissatisfaction.
  • Love is the dance of the dignity of prosperity, lust is the lamentation of scarcity, is the restlessness of scarcity.

-8:45 a.m.

Those who were baby girls till yesterday, now has become mothers,

Not known, where the world is going so fast?

-11:00 a.m.

The search for my ultimate truth has now become a yajna. My body is the altar of yajna, enlightenment is the ignited fire. All my faults and ignorance have been consumed in this fire. And the external knowledge is the havan material which is raising up this fire further.

-11:07 a.m.

Do not know how many times my goals moved away from me,

Do not know how many times slippers broke,

Do not know how many times I stumbled,

Do not know how many times I forgot the way,

Do not know how often the blisters erupted,

Do not know how many stones moistened,

Still, I’m moving on to my goal,

Faster…  faster…  faster…

Do not know how many times life missed,

Do not know how often beloved took umbrage,

Do not know how many times spring came,

Do not know how many new sprouts came,

Do not know how often the time looted,

Do not know how many times I missed from self,

I have not paused, I have not bent,

I have not even tired for a moment,

I am moving on to my goal,

-12:50 p.m.

(अंतर्यात्रा)

परमसत्य की खोज…14

15 दिसम्बर 2003

जब आत्मज्ञान की अग्नि जल जाती है तो फिर उसे और भड़काने के लिए सत्संग, स्वाध्याय, आत्मपरीक्षण, आत्म-अवलोकन आदि की जरूरत पड़ती है ताकि वह फिर न बुझ जाए।

-7:30 a.m.

  • प्रेम आध्यात्मिक आकर्षण है, वासना शारीरिक आकर्षण।
  • प्रेम हमेशा खोता है और खोकर भी संतुष्ट और प्रसन्न रहता है, वासना हमेशा पाती है और पाकर भी हर बार असंतुष्ट रहती है।
  • प्रेम शक्ति है, वासना दुर्बलता।
  • जब वासना मिटती है तभी प्रेम जागृत होता है, ये दोनों एक साथ कभी नहीं चल सकते।
  • वासना निम्नतर अवस्था है और प्रेम उच्च से भी उच्चतर।
  • वासना मिटकर प्रेम में पनपती है और प्रेम की बेल फैलकर अपनी खुशबू सम्पूर्ण संसार में बिखेर देती है।
  • प्रेम आनंद की चिरस्थायी मुस्कान है, वासना दुःख का करुण क्रंदन है, असंतुष्टि का मातम है।
  • प्रेम सम्पन्नता की गरिमा का नृत्य है, वासना अभाव का विलाप, अभाव की छटपटाहट है।

-8:45 a.m.

कल तक जो बच्चियां थीं, अब माँ बन चली हैं,

ये दुनिया इतनी तेज, न जाने कहाँ पर चली है।

-11:00 a.m.

मेरी परम सत्य की खोज अब यज्ञ हो गई है। मेरा शरीर यज्ञ की वेदी है, आत्मज्ञान प्रज्वलित अग्नि है। मेरे सारे दोष तथा अज्ञान इस अग्नि में जलकर भस्म हो चुके हैं तथा बाह्य ज्ञान हविष्य (हवन सामग्री) है जो इस अग्नि को और बढ़ाते जा रहा है।

-11:07 a.m.

न जाने कितनी बार मंजिलें रूठीं,

न जाने कितनी बार चप्पलें टूटीं,

न जाने कितनी बार ठोकरें खाईं,

न जाने कितनी बार राह भुलाई,

न जाने कितनी बार फूटे छाले,

न जाने कितने पत्थर तर कर डाले,

फिर भी बढे चला जा रहा हूँ अपनी मंजिल पर,

और तेज… और तेज… और तेज…

न जाने कितनी बार जीवन छूटा,

न जाने कितनी बार प्रियतम रूठा,

न जाने कितनी बहारें आईं-गईं,

न जाने कितनी कोंपलें आईं नईं,

न जाने कितनी बार समय ने लूटा,

न जाने कितनी बार मुझसे मैं छूटा,

रुका नहीं हूँ, झुका नहीं हूँ,

एक पल को भी थका नहीं हूँ,

बढे जा रहा हूँ अपनी मंजिल पर,

और तेज… और तेज… और तेज…

-12:50 p.m.