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Discovery of the absolute truth … 15 (परमसत्य की खोज…15)

Adventure of the Truth…

Discovery of the absolute truth … 15

December 16, 2003

Idiot people only understand the language of punishment; hence the provision of punishment is kept for them. Not to punish fools and criminals for their improvement would also be injustice.

-9:50 A.M.

Today I got angry deliberately, today I had to get angry deliberately. In fact, he was not anger, it was an acting of anger, it was hypocrisy. At that time it became compulsory for me to become angry. In some circumstances anger and force-performance becomes mandatory, then it is not unreasonable to use it in public interest. In the same way, the way the police’s anger and force-performance are not inappropriate.

To become a doer, to remain in this world, sometimes we will have to be hypocritical, which means we will have to show the feeling which we are not feeling. If this hypocrisy benefits the public instead of any harm, then it is not unreasonable to do so.

-10:20 A.M.

If you are completely devoted, completely conscientious, completely truthful and completely honest, to yourself then this is enough for you. If you do not do even a little bit of hypocrisy with your soul and conscience, then you are the priest of truth in true sense, worshipers of truth and seekers of truth. If after this there is some defects in you then do not care for those flaws. Those defects will go away in a few days when you will move ahead on this path and even if these do not get end up, these will not be able to spoil much. Your dedication to yourself will force them to run away. You just have to do the same thing continuously. Every moment you have to hear the voice of your conscience and you have to accept it and assimilate it. Keep in mind that in no circumstances may you deny them. You may not ignore them.

-10:30 A.M.

Not sacrifice of resources but to use resources for the public interest is a conscience. Anybody can sacrifice the means, but if we have enough resources and power to make some welfare of the people, then it is better to use them for others welfare rather than the sacrifice.

-4:30 p.m.

If you will take away your mind from your holy purpose, then you will find your mind engaged again in those disorders, again you will find your mind fighting with those temptations.

-5:45 p.m.

Do not pay more attention to the flaws of others. If you focus your attention on the faults of others, your mind will also try to run towards defects disorderly and will waste your power.

[Dream message]

How can man enjoy happiness in lower truth after tasting the taste of higher truth? How can a person enjoy the game of children after being young?

It is equally true that a child can not understand how great the joy of youth is in comparision of the joy of childhood.

-10:10 p.m.

(अंतर्यात्रा)

परमसत्य की खोज…15

16 दिसम्बर 2003

मूर्ख लोग केवल दंड की भाषा ही समझते हैं इसलिए उनके लिए दंड का प्रावधान रखा गया है। मूर्खों और अपराधियों को उनके सुधार के लिए दंड न देना भी अन्याय होगा।

-9:50 A.M.

आज मैंने जानबूझकर क्रोध किया, आज मुझे जानबूझकर क्रोध करना पड़ा। वास्तव में वह क्रोध नहीं, क्रोध का अभिनय था, मिथ्याचार था। उस समय मेरे लिए क्रोध करना भी अनिवार्य हो गया था। कुछ परिस्थितियों में क्रोध तथा बल-प्रदर्शन अनिवार्य हो जाता है, तब उसका जनहित में प्रयोग करना अनुचित नहीं। ठीक उसी प्रकार, जिस प्रकार कि पुलिस का क्रोध व बल-प्रदर्शन अनुचित नहीं।

कर्मवादी बनने पर इस संसार में रहने के लिए थोड़ा बहुत मिथ्याचरण भी अभिनय के रूप में करना पड़ेगा अर्थात जो हमारे भीतर नहीं है वह भी दिखाना पड़ेगा। यदि इस मिथ्याचार से जनसामान्य को कोई हानि न होकर फायदा ही हो तो ऐसा करना अनुचित नहीं।

-10:20 A.M.

यदि आप स्वयं के प्रति पूर्णतः समर्पित हैं, पूर्णतः कर्तव्यनिष्ठ हैं, पूर्णतः सत्यनिष्ठ हैं, पूरी तरह ईमानदार हैं तो यही आपके लिए पर्याप्त है। यदि आप अपनी आत्मा तथा विवेक से एक छोटा सा भी मिथ्याचार नहीं करते तो आप सही अर्थों में सत्य के पुजारी हैं, सत्य के उपासक हैं, सत्य के साधक हैं। इसके बाद यदि आपमें कुछ दोष रह भी जाते हैं तो उन दोषों की परवाह मत कीजिये। वे दोष इस मार्ग पर चलते-चलते कुछ दिनों में आप ही समाप्त हो जाएंगे और यदि समाप्त नहीं भी हुए तो भी आपका ज्यादा कुछ नहीं बिगाड़ पाएंगे। आपका स्वयं के प्रति समर्पण उन्हें भागने पर विवश कर देगा। बस आपको निरंतर एक ही कार्य करना है। हर पल अपनी अंतरात्मा की आवाज सुनना है और उसे स्वीकार कर आत्मसात कर लेना है। ध्यान रहे किन्हीं भी परिस्थितियों में आप इन्हें नकार न पाएं। इनकी उपेक्षा न करने पाएं।

-10:30 A.M.

साधनों का त्याग नहीं, साधनों का जनहित के लिए सदुपयोग ही सद्विवेक है।  साधनों का त्याग तो कोई भी कर सकता है, परन्तु यदि हम इतने साधन सम्पन्न और शक्ति सम्पन्न हैं कि लोगों का कुछ कल्याण कर सकते हैं तो उनका सदुपयोग त्याग से श्रेयस्कर है।

-4:30 p.m.

यदि अपने मन को अपने पवित्र उद्देश्य से तनिक भी दूर हटाओगे तो अपने मन को पुनः उन्हीं विकारों में लिप्त पाओगे, पुनः उन्हीं प्रलोभनों से जूझता पाओगे।

-5:45 p.m.

दूसरों के दोषों पर अधिक ध्यान मत दो। यदि दूसरों के दोषों पर अपना ध्यान केंद्रित करोगे तो तुम्हारा मन भी उच्छृंखल होकर दुर्बलता की ओर भागने की कोशिश करेगा और तुम्हारी शक्तियों का अपव्यय करेगा।

[स्वप्न सन्देश]

उच्चतर सत्य का स्वाद चख लेने के बाद मनुष्य निम्नतर सत्य में आनंद कैसे उठा सकता है? युवा होने के बाद मनुष्य बच्चों के खेल का आनंद कैसे ले सकता है?

ये बात भी उतनी ही सत्य है कि एक बच्चा नहीं समझ सकता कि युवावस्था के आनंद बाल्यावस्था के आनंद से कितने श्रेष्ठतर हैं।

-10:10 p.m.