Discovery of the absolute truth … 19 (परमसत्य की खोज…19)

Adventure of the Truth…

Discovery of the absolute truth … 19

December 20, 2003

As far as possible, avoid criticism of others. Criticism of others narrows our ideology. It makes our mentality frustrated, interrupts our mental and spiritual advancement. We will not get anything by criticizing others. Become a critic of yourself, review yourself, only then we will be able to achieve everything we want.

-2:30 p.m.

Some time ago I used to think, how should I spend my time? Now I think, from where I should bring more time to finish my daily tasks. I have understood very well the meaning of idiom ‘stay busy, be happy.’

We should always try that if we can’t put good impact on others, then do not let a bad influence on others. If we can’t give a positive outlook to his ideology, then do not give negative outlook too. If we can’t calm the hunger of other, do not make him mad by distorting his hunger. Every man can’t adopt each virtue. Not everything is made for every man. Attempt to improve others is silly. Improve yourself, those who have to improve, they will improve on their own by being inspired by your character. Forced ass can’t be made a horse, so the basic requirement is not to reform the society but to improve ourselves. We have to become a self-reformer, not a social reformer.

-3:00 p.m.

Most time of our life goes waste in thinking about the lives of others. If we start thinking about our lives at the same time then our life will become a beautiful palace of achievements.

-2:07 p.m.

We often think about the shortcomings, we do not think about the measures to overcome the shortcomings. We always worry, we do not contemplate. We always promote weaknesses by thinking about weaknesses frequently; we do not expel weakness by thinking about might.

-3:15 p.m.

I’m listening strange silence today, which are constantly running with me, in the solitude of the house, in the market, at the crossroads, in crowds, in clamor…

-4:55 p.m.

(अंतर्यात्रा)

परमसत्य की खोज…19

20 दिसम्बर 2003

जहाँ तक संभव हो, दूसरों की आलोचना से बचें। दूसरों की आलोचना हमारी विचारधारा को संकीर्ण करती है। हमारी मानसिकता को कुंठित करती है, हमारी मानसिक एवं आत्मिक उन्नति में बाधा उत्पन्न करती है। दूसरों की आलोचना करके हमें कुछ हासिल नहीं होगा। स्वयं के आलोचक बनें, स्वयं की समीक्षा करें, तभी हम वह सब कुछ हासिल कर पाएंगे, जो हम चाहते हैं।

-2:30 p.m.

पहले मैं सोचता था कि अपना समय कैसे व्यतीत करूँ। अब मैं सोचता हूँ कि अपने नित्य निर्धारित कामों को ख़त्म करने के लिए और अधिक समय कहाँ से लाऊँ। मैं भली भांति समझ चुका हूँ इस मुहावरे का अर्थ ‘व्यस्त रहो, मस्त रहो।’

हम हमेशा ये प्रयास करें कि यदि हम दूसरों पर अपना अच्छा प्रभाव नहीं डाल सकते तो उस पर अपना कुप्रभाव भी न पड़ने दें। यदि उसकी विचारधारा को सकारात्मक दृष्टिकोण नहीं दे सकते तो नकारात्मक दृष्टिकोण भी न दें। यदि हम दूसरे की भूख को शांत नहीं कर सकते तो उसकी भूख को विकृत करके उसे पागल भी न बनाएं। हरेक आदमी हर गुण को ग्रहण नहीं कर सकता। हर चीज हर आदमी के लिए नहीं बनी होती। दूसरों में सुधार लाने का प्रयास ही मूर्खतापूर्ण है। आप अपने आप में सुधार लाएं, जिन्हें सुधरना होगा, वे आपके चरित्रबल से प्रेरित होकर स्वयं ही सुधर जाएंगे। बलपूर्वक गधे को घोड़ा नहीं बनाया जा सकता, अतः मूल आवश्यकता समाज सुधार की नहीं है, आत्मसुधार की है। हमें समाज सुधारक नहीं बल्कि आत्म सुधारक बनना होगा।

-3:00 p.m.

हमारे जीवन का अधिकांश समय दूसरों के जीवन के बारे में सोचने में व्यर्थ चला जाता है। यदि हम वही समय अपने जीवन के बारे में सोचने में लगा दें तो हमारा जीवन उपलब्धियों का सुन्दर महल बन जाए।

-3:07 p.m.

हम अक्सर कमियों के बारे में सोचते हैं, कमियों को दूर करने के उपायों के बारे में नहीं सोचते। हम हमेशा चिंता करते हैं, चिंतन नहीं करते। हम हमेशा दुर्बलताओं के बारे में सोच-सोच कर दुर्बलता को ही बढ़ावा देते हैं, शक्ति के बारे में सोचकर दुर्बलता को नहीं खदेड़ते।

-3:15 p.m.

अजीब से सन्नाटों को सुन रहा हूँ मैं आज, जो निरंतर मेरे साथ चल रहे हैं, घर के एकांत में, बाजार में, चौराहे पर, भीड़-भाड़ में, शोरगुल में…

-4:55 p.m.