Discovery of the absolute truth … 20 (परमसत्य की खोज…20)

Adventure of the Truth…

Discovery of the absolute truth … 20

December 21, 2003

Humans are so dishonest that even they don’t love themselves truly, on the day when he will learn to love himself, on that day he will recognize the hidden power within him. On the day when he will learn to love himself truly, he will not be able to hate anyone after that day.

-7:15 A.M.

Every idiot in the world is the greatest wise man in his own eyes, and every stupidity is wisdom in his eyes. So we have to be smart so that our intelligence too not be our idiocy.

-4:10 p.m.

The person who speaks with himself is either wise man or a mad. I too talk to myself then what am I?

-4:30 p.m.

Sometimes the pursuit of knowledge also gives the illusion of insanity. I am getting rid of my knowledge. I am moving towards knowledge or towards ignorance, or towards the zero?

-4:35 p.m.

The condition of poverty and richness is more mental than physical illness. Resources and power are available for everyone. Those, who exploit these resources properly are rich and who do not exploit these resources properly are poor.

There are two types of people in the world, one who remain unhappy and damn their fate and the poverty. Secondly, those who change their fate by turning the scarcity into prosperity by their courage and their power.

-7:40 p.m.

They feel the distance from the target who get trapped in other temptations and wanders away from the target again and again. Those, whose life itself has become the goal, how can think of failure? Who lost themselves in the goal, who forgot themselves in the goal, how can they go away from the goal? How can they think of someone else except the goal? Everything reminds me of my goal (absolute truth).

-7:05 p.m.

Obstacles are indicator that you are reaching the goal.

-8:20 p.m.

Whenever I see the mirror, a question appears on my face -‘What is the Absolute truth?’

When I see an infant, its innocence smile asks -‘What is the Absolute truth?’

The chime laugh of carefree young girls asks -‘What is the Absolute truth?’

Careless joking laughs of ignorant people ask -‘What is the Absolute truth?’

The innocent eyes of the animals ask -‘What is the Absolute truth?’

Looking at the blooming flowers, it seems as these are saying -‘What is the Absolute truth?’

When I wake up in the morning, the sun’s rays ask -‘What is the Absolute truth?’

Air blows one end of my shawl and asks -‘Tell me! Where did I come from?’

Redness of the evening and sunset in the west ask -‘What is the Absolute truth?’

The darkness of the night asks -‘What is the Absolute truth?’

Every night the dreams emerging on the screen of my psyche ask -‘What is the Absolute truth?’

And then I get drown in meditation.

-9:45 p.m.

I’m going on my bicycle somewhere. A funeral procession passes from the front on the way. I think that this is a celebration of liberation, why are people so sad? Why are there tears in their eyes?

My conscience says from within – ‘O foolish! Don’t you understand even that much. This sadness is false. This sorrow is false, this distraction is also false and tears in the eyes are also liars? Everything is a relative illusion, after two hours, all this will not be so, and after two days there will be no other sign of the died person, except a picture with a garland.’

If this is a lie, then what is the truth? ‘ I question in my mind.

-‘Ha-ha-ha! You are asking me. Truth is just a question – ‘What is the ultimate truth?’ Know if you can.’ The inner voice resonates and my somnolence breaks.

And I go ahead by pedaling the bicycle, repeating in my mind – ‘What is the absolute truth?’

[Based on the remembrance of the experience on Last Sunday 14 December 2003/12: 05 p.m., which I forgot for some reason at that time.]

(अंतर्यात्रा)

परमसत्य की खोज…20

21 दिसम्बर 2003

इंसान इतना बेवफा है कि वह खुद से भी सच्चा प्रेम नहीं करता, जिस दिन वह खुद से सच्चा प्रेम करना सीख जाएगा, उस दिन वह अपने भीतर छिपी शक्ति को पहचान जाएगा। जिस दिन वह खुद से सच्चा प्रेम करना सीख जाएगा, उस दिन के बाद वह किसी से घृणा नहीं कर सकेगा।

-7:15 A.M.

दुनिया का हर बेवकूफ खुद की नजर में सबसे बड़ा अक्लमंद होता है और उसकी हर बेवकूफी उसकी नजर में एक अक्लमंदी होती है इसलिए हमें होशियार रहना होगा कि कहीं हमारी अक्लमंदी भी हमारी बेवकूफी ही न हो।

-4:10 p.m.

खुद से बातें करने वाला या तो ज्ञानी होता है या पागल। मैं भी तो खुद से बातें करता हूँ, तो फिर मैं क्या हूँ?

-4:30 p.m.

कभी कभी ज्ञान का अनुसरण भी पागलपन का भ्रम देता है। मेरा ज्ञान तो मुझसे छूटते जा रहा है। मैं ज्ञान की तरफ बढ़ रहा हूँ या अज्ञान की तरफ, या फिर शून्य की तरफ?

-4:35 p.m.

गरीबी और अमीरी की अवस्था भौतिक कम और मानसिक रोग ज्यादा है। साधन और शक्ति सभी के लिए उपलब्ध हैं। जो इन साधनों का उचित दोहन कर ले वह अमीर और जो इन साधनों का उचित दोहन न कर शक्ति का अपव्यय करे, वह गरीब है।

दो तरह के लोग होते हैं दुनिया में, एक वे जो दुखी होकर विपन्नता और भाग्य को कोसते रहते हैं। दूसरे वे जो अपने साहस और अपनी शक्ति से विपन्नता को सम्पन्नता में बदल कर अपना भाग्य बदल देते हैं।

-7:40 p.m.

लक्ष्य से दूरी वे महसूस करते हैं जो अन्य प्रलोभनों में फंसकर बार-बार भटककर उससे दूर होते चले जाते हैं। जिनका जीवन ही लक्ष्य बन चुका है वे असफलता के बारे में सोच भी कैसे सकते हैं? जिन्होंने खुद को ही लक्ष्य में खो दिया, जिन्होंने खुद को ही लक्ष्य में भुला दिया, वे लक्ष्य से दूर कैसे जा सकते हैं? वे लक्ष्य को छोड़कर किसी और के बारे में सोच भी कैसे सकते हैं? मुझे तो हर चीज मेरे लक्ष्य (परमसत्य) की ही याद दिलाती है।

-7:05 p.m.

बाधाएं इस बात की द्योतक हैं कि आप लक्ष्य के करीब पहुंच रहे हैं।

-8:20 p.m.

जब भी मैं आईना देखता हूँ, मेरे चेहरे पर एक प्रश्न झलकता नजर आता है -‘परमसत्य क्या है?’

किसी छोटे बच्चे को देखता हूँ, उसकी भोली-भाली मुस्कान पूछती है -‘परमसत्य क्या है?’

अल्हड़ नवयौवनाओं की खनकती गूंजती हंसी पूछती है -‘परमसत्य क्या है?’

अज्ञानियों की लापरवाह हंसी-ठिठोली पूछती है -‘परमसत्य क्या है?’

निरीह जानवरों की मासूम आँखें पूछती हैं -‘परमसत्य क्या है?’

खिलते हुए फूलों को देखता हूँ तो लगता है, जैसे कह रहे हों -‘परमसत्य क्या है?’

सुबह उठता हूँ, सूरज की किरणें पूछती हैं -‘परमसत्य क्या है?’

हवा मेरी शॉल का एक छोर उड़ा ले जाती है और पूछती है -‘बता! मैं कहाँ से आई?’

साँझ की लालिमा और पश्चिम में डूबता सूरज पूछते हैं -‘परमसत्य क्या है?’

रात का अँधेरा पूछता है -‘परमसत्य क्या है?’

हर रात मेरे मानस पटल पर उभरते स्वप्न पूछते हैं -‘परमसत्य क्या है?’

और फिर मैं खुद से पूछता हूँ -‘परमसत्य क्या है?’

और ध्यान में डूब जाता हूँ।

-9:45 p.m.

मैं साइकिल पर कहीं जा रहा हूँ। रास्ते पर सामने से एक शवयात्रा निकलती है। मैं सोचता हूँ कि ये तो मुक्ति का उत्सव है, लोग इतने उदास क्यों हैं? इनकी आँखों में आंसू क्यों हैं?

मेरे भीतर से अंतर्मन कहता है -‘अरे मूर्ख! इतना भी नहीं समझता। ये उदासी झूठी है। ये दुःख झूठा है, ये व्याकुलता भी झूठी है, आँखों में आंसू भी झूठे हैं? सब कुछ एक सापेक्षिक भ्रम है, दो घंटे बाद ये सब कुछ नहीं होगा और दो दिन बाद मरने वाले का कोई और नामो-निशान नहीं होगा, एक माला चढ़ी तस्वीर के सिवा।’

-‘अगर ये सब झूठ है तो फिर सत्य क्या है?’ मैं मन ही मन प्रश्न करता हूँ।

-‘हा -हा -हा! अब ये भी मुझसे पूछ रहा है। सत्य सिर्फ एक प्रश्न है – ‘परम सत्य क्या है?’ जान सके तो जान ले।’ भीतर अंतर्मन की आवाज गूंजती है और मेरी तन्द्रा टूटती है।

और मैं आगे बढ़ जाता हूँ साइकिल पर पैडल मारते हुए, अपने मन में दोहराते हुए – ‘परम सत्य क्या है?’

[पिछले रविवार १४ दिसम्बर २००३ /१२:०५ p.m. के अनुभव के स्मरण पर आधारित, जो किसी कारणवश उस समय मैं भूल गया था।]