Discovery of the absolute truth … 22 (परमसत्य की खोज…22)

Adventure of the Truth…

Discovery of the absolute truth … 22

December 23, 2003

Mirror is very surprised to see me,

Sometimes I look like a straw, sometimes a river and sometimes a sea.

-7:05 A.M.

Loneliness asks us, on every move,

What is this zeal along with you?

 

Life asks me in dream, every day,

Who is this, settled inside you, doing magic?

-7:15 A.M.

There is no power more than will power.

-7:20 A.M.

When has the wind stopped for accompany of someone?

When has the fire stopped for accompany of someone?

When has the storm waited for accompany of someone?

When has the strength waited for someone?

Who has been able to be companion of all these?

Then how can someone be my companion?

Then how can I stop for accompany of someone?

-7:30 A.M.

The obstacles test you, if you succeed, then these enrich you by strength and if you fail, then these take away the remaining strength too.

-9:40 A.M.

Now I am realizing that the absolute truth is bliss, a great bliss. Yes, it can’t be anything other than this great bliss. As I am reaching near the absolute truth, I am getting wet in the bliss.

-11:38 A.M.

What is the irony is that in the last time of man, the truth stands in front of him, yet he runs away by fearing it. Rather than strength, he selects the weakness, instead of truth, he chooses only the untrue (delusion).

-9:40 P.M.

People want me to do hypocrisy and support lies, people want me to show false love, to express false sympathy.

What should I do?

Should I be hypocrite by showing sympathy and by supporting lie?

Or

Should I go with truth, being neutral?

They want me to get involved in their weakness but how can I go deliberately on the wrong path? How can I choose the path of falsehood even knowing?

They want me to cry on their weaknesses with them but now how can I cry while I have forgotten to cry.

-9:45 P.M.

People suffer – because of their ignorance, due to their sin, due to their weaknesses, Due to the dishonesty and fraud made with self, due to the dishonesty and fraud done with that supreme truth.

-9:50 P.M.

I cannot leave the truth for a moment, not at any cost. Now I can not let enter the untruth even a bit in my life.

Therefore, it will be better to give up the weaknesses on their condition instead of embracing them, regardless of the results anyway.

-9:55 P.M.

He always embraced weakness,

He refused strength, removed it away,

He accepted the illusion,

He afraid of struggle, ran away from the truth,

Kept himself covered with ignorance,

Turned down the knowledge,

Even now he is holding tightly the weaknesses,

And he is crying, screaming that someone should protect them from the clutches of this weakness.

-10:05 P.M.

Man keeps on looking throughout the life that nobody can do any good except for the absolute truth (supreme soul). Except the only absolute truth, no one (wife, children, siblings, parents, friends) is not his own. Yet he runs away from it and keeps embracing the illusion (wife, children, siblings, parents, friends), Just like, a person does not want to wake up by sleep in the fascination of a dream.

-10:25 P.M.

‘History repeats itself.’ It is true, but we are beyond the truth, therefore we cannot know.

-10:45 P.M.

I declare that I have gone mad but my madness is also – ‘truth’.

-10:50 P.M.

Walking on the path of truth is like walking on a double-edged sword.

-11:08 P.M.

(अंतर्यात्रा)

परमसत्य की खोज…22

23 दिसम्बर 2003

आईना हमें देख के हैरान है बहुत,

कभी कतरा, कभी दरिया, कभी समंदर नजर आते हैं हम।

-7:05 A.M.

तन्हाई हमसे पूछती है, हर कदम-कदम,

ये जोश किस बला का तेरे साथ-साथ है।

 

जिंदगी रोज़ हमसे पूछती है आके ख्वाब में,

ये कौन बस गया है, जो जादू जगा रहा है।

-7:15 A.M.

इच्छाशक्ति से बढ़कर और कोई शक्ति नहीं।

-7:20 A.M.

हवा भला कब किसी के साथ के लिए थमी है?

आग भला कब किसी के साथ के लिए रुकी है?

तूफ़ान ने कब किसी का इन्तजार किया है?

शक्ति ने कब किसी की प्रतीक्षा की है?

कौन इन सब का हमसफ़र हो सका है?

तो फिर मेरा हमसफ़र कोई कैसे हो सकता है?

फिर भला मैं किसी के साथ के लिए कैसे रुक सकता हूँ?

-7:30 A.M.

बाधाएं तुम्हें परखती हैं। अगर तुम सफल होते हो तो तुम्हें शक्ति से मालामाल करती चली जातीं हैं और अगर तुम असफल होते हो तो तुम्हारी रही-सही शक्ति भी छीन लेतीं हैं।

-9:40 A.M.

अब मैं अनुभव कर रहा हूँ कि परमसत्य एक आनंद है, महा-आनंद। हाँ, वह इस महा-आनंद के सिवा कुछ और हो ही नहीं सकता। जैसे-जैसे मैं परमसत्य के निकट पहुँचता जा रहा हूँ, वैसे-वैसे आनंद रस में भीगता जा रहा हूँ।

-11:38 A.M.

कैसी विडम्बना है कि मनुष्य के अंतिम समय में सत्य उसके एकदम सामने खड़ा रहता है फिर भी वह उससे भयभीत होकर भागता है। शक्ति की बजाय वह दुर्बलता का ही वरण करता है, सत्य की बजाय असत्य (भ्रम) का ही वरण करता है।

-9:40 P.M.

लोग चाहते हैं कि मैं मिथ्याचरण कर झूठ का साथ दूँ, झूठा प्रेम दिखाऊं, झूठी सहानुभूति व्यक्त करूँ।

मुझे क्या करना चाहिए?

सहानुभूति दर्शाकर मिथ्याचरण कर झूठ का साथ देना चाहिए?

या

तटस्थ होकर, उदासीन होकर सत्य का साथ देना चाहिए?

वे मुझे अपनी दुर्बलता में सम्मिलित करना चाहते हैं पर मैं जानबूझकर गलत रास्ते पर कैसे जा सकता हूँ? मैं जानते हुए भी असत्य का मार्ग कैसे चुन सकता हूँ?

वे मुझे अपनी कमजोरियों पर अपने साथ रुलाना चाहते हैं पर अब मैं कैसे रो सकता हूँ जबकि मैं रोना भूल चुका हूँ।

-9:45 P.M.

लोग कष्ट पाते हैं – अपने अज्ञान के कारण, अपने पाप के कारण, अपनी दुर्बलता के कारण, स्वयं के साथ की गई बेईमानी और धोखेबाजी के कारण, उस परमसत्य के साथ की गई बेईमानी और धोखेबाजी के कारण।

-9:50 P.M.

मैं सत्य का साथ थोड़ी देर को भी नहीं छोड़ सकता, किसी कीमत पर नहीं। अब मैं रंच मात्र भी असत्य को प्रवेश नहीं दे सकता अपने जीवन में।

अतः दुर्बलताओं को उनके हाल पर छोड़ देना ही उचित होगा बजाय उन्हें गले लगाने के, भले ही परिणाम कुछ भी हो।

-9:55 P.M.

उन्होंने हमेशा दुर्बलता को अपने गले लगाया,

शक्ति को नकारा, दूर हटाया,

भ्रम को स्वीकार किया,

संघर्षों से डरकर सत्य से दूर भागे,

अज्ञान से स्वयं को लिपटाए रखा,

ज्ञान को ठुकराया,

अब भी वे दुर्बलताओं को कसकर पकड़े हुए हैं,

और रो रहे हैं, चिल्ला रहे हैं कि कोई उन्हें इस दुर्बलता के चंगुल से बचाए।

-10:05 P.M.

आदमी जिंदगी भर देखते रहता है कि एकमात्र परमसत्य (परमात्मा) के अलावा उसका उपकार कोई नहीं कर सकता। एकमात्र परमसत्य के अलावा कोई (पत्नी, संतानें, भाई-बहन, माँ-बाप, मित्रगण) उसका अपना नहीं। फिर भी वह उससे दूर भागता है और भ्रम (पत्नी, संतानें, भाई-बहन, माँ-बाप, मित्रगण) को ही गले लगाए रहता है, ठीक वैसे ही, जैसे कोई व्यक्ति स्वप्न के मोह में नींद से जागना  ही न चाहे।

-10:25 P.M.

‘इतिहास स्वयं को दोहराता है। ‘ सच है यह बात लेकिन हम परे हैं इस सत्य के, इसलिए नहीं जान पाते।

-10:45 P.M.

मैं यह घोषणा करता हूँ कि मैं पागल हो चुका हूँ पर मेरा पागलपन भी है – ‘सत्य’.

-10:50 P.M.

सत्य के मार्ग पर चलना दोधारी तलवार पर चलने जैसा है।

-11:08 P.M.