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Yogesh Malviya (modernyogi53) Contact- +91 9301890285 +91 9479845879 Malviya Nivas, 1278/A4, Jawahar Nagar, Adhartal, Jabalpur (M.P.), India

Discovery of the absolute truth … 25 (परमसत्य की खोज…25)

Adventure of the Truth…

Discovery of the absolute truth … 25

December 27, 2003

Recommendations, grants, prizes are the rights of qualifications, not begging.

-7:00 A.M.

Recognize me!

I am the same power, which will lead to the rise of India.

I am the same power which will lead to the rise of humanity.

I am the same power, about which Swami Vivekananda used to say.

I am the same power that spoke from within the Christ that I will come again.

I am the same Krishna who said that I take birth again and again on this earth, to eradicate the sins of this earth.

I am the same Rama, who had set the limits of the best man by becoming Maryada Purushottama.

I am the same Hazrat Muhammad, the man of Allah, who had descended on this land as a Prophet of that God.

I am the same Buddha, who came to awaken compassion in the heart of the living beings.

I am the only Nanak, Kabir and Farid.

Recognize me! I am the power of truth.

Recognize! Recognize me, if you have vision.

-7:40 A.M.

Time repeats itself, events repeat itself, history repeats itself.

-7:50 A.M.

Who am I? I am the same power, on the strength of which, Jesus had said that stop and the storm had stopped. I am the same power, on the strength of which Vivekananda had said that if you will tell with true faith the mountain to leave its place, then it will also leave its place. I am the same power of faith.

-8:00 A.M.

Where did the search of truth bring me?

What the discovery of the truth made me?

How much did the search of truth give me?

There is nothing more in this world than truth.

-9:40 A.M.

Those who have known themselves, they do not need any scripture. Anyone who has revealed the truth hidden within him, there is nothing remains to get for him.

-4:30 P.M.

Scriptures only show the way to find oneself, to find the truth.

-5:30 P.M.

When bad habit comes, it brings many evils with it and when it goes, it carries many evils with it, at the same time, they left many good things behind, those good things which are born out of their experience.


परमसत्य की खोज…25

27 दिसम्बर 2003

अनुशंसा, अनुदान, पुरस्कार योग्यता के हक़ हैं, अधिकार हैं, खैरात या भीख नहीं।

-7:00 A.M.

मुझे पहचानो!

मैं वही शक्ति हूँ, जिससे भारत का उत्थान होगा।

मैं वही शक्ति हूँ, जिससे मानवता का उत्थान होगा।

मैं वही शक्ति हूँ, जिसके बारे में स्वामी विवेकानंद कहा करते थे।

मैं वही शक्ति हूँ, जो ईसा के भीतर से बोल उठी थी कि मैं फिर आऊंगा।

मैं वही कृष्ण हूँ जिसने कहा था कि मैं बार-बार इस पृथ्वी पर जन्म लेता हूँ, इस धरती के पाप मिटाने के लिए।

मैं वही राम हूँ जिसने मर्यादा पुरुषोत्त्तम बनकर उत्तम पुरुष की मर्यादाएं निर्धारित की थीं।

मैं वही खुदा का बंदा हजरत मुहम्मद हूँ जो उस खुदा का पैगाम सुनाने पैगम्बर बनकर इस जमीं पर उतरा था।

मैं वही बुद्ध हूँ, जो प्राणियों के ह्रदय में करुणा जगाने आया था।

मैं ही नानक, कबीर और फरीद हूँ।

पहचानो मुझे! मैं सत्य की शक्ति हूँ।

पहचानो! पहचानो मुझे! यदि तुममे दृष्टि है।

-7:40 A.M.

समय अपने आप को दोहराता है, घटनाएं अपने आप को दोहराती हैं, इतिहास अपने आप को दोहराता है।

-7:50 A.M.

मैं कौन हूँ? मैं वही शक्ति हूँ, जिसके दम पर ईसा ने कहा था कि थम जा और तूफ़ान थम गया। मैं वही शक्ति हूँ, जिसके दम पर विवेकानंद ने कहा था कि यदि तुम सच्चे विश्वास से पर्वत को भी कहोगे कि हट जा, तो वह भी अपना स्थान छोड़कर हट जाएगा। मैं वही शक्ति हूँ विश्वास की।

-8:00 A.M.

सत्य की खोज ने कहाँ से कहाँ ला खड़ा किया मुझे?

सत्य की खोज ने क्या से क्या बना दिया मुझे?

सत्य की खोज ने कितना कुछ दे डाला मुझे?

सत्य से बढ़कर इस दुनिया में और कुछ नहीं।

-9:40 A.M.

जिसने स्वयं को जान लिया उसे किसी धर्मग्रन्थ की जरूरत नहीं जाती। जिसने अपने भीतर छिपे सत्य को उद्घाटित कर लिया उसके लिए और कुछ भी पाना शेष नहीं रह जाता।

-4:30 P.M.

धर्मग्रन्थ केवल रास्ता दिखाते हैं स्वयं को पाने का, सत्य को पाने का।

-5:30 P.M.

बुरी आदत जब आती है तो अपने साथ कई बुराइयों को लेकर आती है और जब जाती है तो अपने साथ कई बुराइयों को समेटकर भी ले जाती है, साथ ही अपने पीछे कई अच्छाइयों को भी छोड़ जाती है, वे अच्छाइयां जो इनके अनुभव से जन्म लेती हैं।

Discovery of the absolute truth … 24 (परमसत्य की खोज…24 )

Adventure of the Truth…

Discovery of the absolute truth … 24

December 26, 2003

It is important that the ideal should be in front, even if it is unrecoverable.

-6:50 A.M.

Get drowned in your truth. If ignorance is true then get drowned in ignorance. If ‘false’ is true then get drowned in the false. If weakness is true then get drowned in weakness. If pain is true then get drowned in pain. If you completely embrace the immediate truth that is before you, then you will reach the eternal truth, you will experience your real power. You will experience the illusion of your weakness and anguish. As long as we do not know our power, pain and weaknesses suppress us, scare us, but when we know our true power, then they run away by fearing us.

-7:20 A.M.

Our situation in any pain or weakness is similar as it is of the blind beggar who is sitting with diamond of crores in his pouch and because of lack of knowledge of it, he is crying and begging and babbling that no one is helping him.

-7:25 A.M.

Surveys show that they spend the happiest life that are married and follows Charvak’s theory – ‘Take loan and enjoy the life’, and who take all good and bad experiences of the life. Those people lives happiest life, for which sex and adultery are entertainment and those who keep immersed themselves in alcohol and cigarettes day and night. This fact is absolutely true. There is no doubt about the truth of this fact. The survey is hundred percent true, but it is also true that their happiness is exactly like the pig rolling in mud.

After reaching lower level, worst things also gives joy and people tend to feel the same false happiness as supreme bliss.

-8:35 A.M.

Whether the power is positive or negative, in every situation it is power and is heavy on weakness.

-12:25 P.M.

Weakness is at a lower level than power at all costs, even if the power is negative.

-4:35 P.M.

In the law of nature effrontery is better than cowardice and fearfulness. The doer of injustice is better than the person who suffers the injustice because he is at higher level of power and courage than the victim.

-4:40 P.M.

People consider only materialism as achievements. There is no significance of spiritual achievement in their vision, just like the children’s happiness is limited to toys and sweets, it do not grow ahead of toys and sweets. It cannot be explained to the child that there may be a higher happiness also. It cannot be explained to the child that anything else can give more pleasure than toys and sweets.

-9:40 P.M.

You will be alone at the peak of your life. After gaining the spiritual achievements of your life, you will be alone who will enjoy it and who will consume it. Nobody can be a partner in true bliss of anybody. How unfortunate are those people who cannot loot this bliss and remain deprived of this bliss throughout their life.

-10:00 P.M.


परमसत्य की खोज…24

26 दिसम्बर 2003

आदर्श का सामने रहना जरूरी है, भले ही वह अप्राप्य रहे।

-6:50 A.M.

अपने सत्य में डूब जाओ। यदि अज्ञान सत्य है तो अज्ञान में डूब जाओ। यदि ‘असत्य’ सत्य है तो असत्य में डूब जाओ। यदि दुर्बलता सत्य है तो दुर्बलता में डूब जाओ। यदि पीड़ा सत्य है तो पीड़ा में डूब जाओ। जो भी तात्कालिक सत्य तुम्हारे सामने है उसी को पूर्णतः अंगीकार कर लोगे तो तुम शाश्वत सत्य तक पहुँच जाओगे, अपनी वास्तविक शक्ति का अनुभव कर लोगे। दुर्बलता और पीड़ा के भ्रम होने का अनुभव कर लोगे। जब तक हम अपनी शक्ति को नहीं जान पाते, तब तक वेदनाएं और दुर्बलताएँ हमें दबाती हैं, डराती हैं, परन्तु जब हम अपनी वास्तविक शक्ति को जान लेते हैं तब ये हमसे डरकर दूर भाग जाती हैं।

-7:20 A.M.

किसी पीड़ा या दुर्बलता के आगे हमारी स्थिति ठीक वैसी ही होती है जैसी उस अंधे भिखारी की होती है जो अपनी झोली में करोड़ों के हीरे रखकर बैठा है और उसका ज्ञान न होने के कारण वह रोता, गिड़गिड़ाता भीख मांग रहा है और प्रलाप कर रहा है कि कोई उसकी मदद नहीं करता।

-7:25 A.M.

सर्वे बताते हैं कि सबसे अधिक खुशहाल जीवन वे बिताते हैं जो विवाहित हैं और चार्वाक के सिद्धांत – ‘ऋणम कृत्वा घृतम पीवेत’ पर चलते हुए दुनिया के अच्छे बुरे सभी मजे लेते हैं। सबसे अधिक खुशहाल जीवन उनका होता है, जिनके लिए सेक्स और व्यभिचार मनोरंजन होता है और जो शराब और सिगरेट में रात दिन खुद को डुबाए रखते हैं। बिलकुल सत्य है यह बात। इस बात की सत्यता पर कोई संदेह नहीं। सौ फ़ीसदी सच है यह सर्वे, पर साथ ही यह बात भी सत्य है कि उनकी ये खुशहाली ठीक वैसी ही होती है जैसी कीचड में लोटते हुए सुअर की। निम्नतर स्तर पर पहुँचने के बाद बुरी से बुरी चीजें भी आनंद प्रदान करती हैं और लोग इसी मिथ्या आनंद को परम आनंद मान  बैठते हैं।

-8:35 A.M.

शक्ति चाहे सकारात्मक हो चाहे नकारात्मक, हर स्थिति में शक्ति होती है और दुर्बलता पर भारी होती है।

-12:25 P.M.

दुर्बलता हर कीमत पर शक्ति से निम्नतर स्तर पर ही होती है, चाहे वह शक्ति नकारात्मक ही क्यों न हो।

-4:35 P.M.

कायरता और भीरुता से दुस्साहस ही अच्छा है। डरकर अन्याय सहने वाले से अन्याय करने वाला ही अच्छा है क्योंकि वह शक्ति और साहस सहने वाले से ऊंचा है।

-4:40 P.M.

लोग भौतिकवाद को ही उपलब्धियां मानते हैं। आध्यात्मिक उपलब्धि का उनकी दृष्टि में कोई महत्व नहीं होता, ठीक वैसे ही जैसे बच्चे की खुशियां खिलौनों तथा मिठाइयों तक ही सीमित रहती है, उनके आगे नहीं बढ़ पाती। उसे नहीं समझाया जा सकता कि इससे उच्चतर खुशियां भी हो सकती हैं। उसे नहीं समझाया जा सकता कि खिलौनों और मिठाइयों से उत्तम आनंद कोई और चीज भी दे सकती है।

-9:40 P.M.

अपने जीवन की चरम ऊंचाइयों पर आप नितांत अकेले होंगे। अपने जीवन की आध्यात्मिक उपलब्धियों को पाने के बाद उसका आनंद लूटने वाले, उसका उपभोग करने वाले भी आप अकेले ही होंगे। सच्चे आनंद में कोई किसी का सहभागी नहीं हो सकता। कितने बदकिस्मत होते हैं वो लोग जो इस आनंद को नहीं लूट पाते और अपने पूरे जीवन भर इस आनंद से वंचित रहते हैं।

-10:00 P.M.

Discovery of the absolute truth … 23 (परमसत्य की खोज…23)

Adventure of the Truth…

Discovery of the absolute truth … 23

December 25, 2003

At first I hated myself, I used to fight with myself, used to punish myself, now I love myself.

-8:42 A.M.

I am constantly growing, from lower truth to higher truth, from truth to ultimate truth, from darkness to light, towards the fathomless sea of power.

-9:40 A.M.

External intoxication is for self-forgetfulness, but whoever tastes the self-remembrance, never wants to come out of this intoxication. In external intoxication man goes on losing himself continuously, but in self-remembrance as much as a man goes deep, he goes on getting continuously.

-9:50 A.M.

When we see ourselves as part of this whole world, then we get free with bonds related to our individuality, caste and country-time-cause, we get free from the narrowed sense of relationships.

-10:50 A.M.

If small tasks are done with a broad vision, they become great.

-10:55 A.M.

Even though a small child is in a crowd, he recognizes the face of his parents and runs towards them and clings to them. Even like that little child, we should never forget our soul while still in the crowd of this world and always we should be self-centered, only then we shall become the source of power.

-11:00 A.M.

The way, people walking in the convoy, encamp anywhere on the ground while moving on all the earth but they do not make home anywhere, similarly, while living in the crowd of evils of the world, we should not settle between them.

-11:20 A.M.

That man can do everything in this world, who never forgets these two things – soul and death.

-2:40 A.M.

To extinguish the thirst for my soul, I need the river of bliss of supreme power, if I does not get it, then how can I extinguish my thirst from the dirty drain of lust that flows in the world. I will have to reach the shore of supreme power’s river of bliss, only my power will be my satiety, weakness can never give satiety.

-3:00 P.M.

Now I think if there can be any connection between truth and fantasy?

Who was the first to be born in truth and fantasy?

To what extent is the fantasy mandatory to reveal the truth and to what extent is the truth mandatory to reveal the imagination?

A situation arises when imaginations are going to become true and a situation arises when the fantasy goes miles away from the truth and it goes beyond too much. These situations too depend on your mental and spiritual states. If the truth is entered in your life and after one state your life becomes completely truthful so many times your pure fantasies also become alive because at that time the surface of the mind becomes such that you can’t even bring falsehood in your fantasy, your imagination also gets overwhelmed by the truth. In fact, till that time even you do not know the powers of truth, we cannot know the magic of Truth. Imagination cannot be false even in this stage.

On the contrary if you continue to fill your life with lies, if you continue to make your life perverted by hypocrisy and deceitfulness, then in a situation your life becomes so confused that it also denies you to recognize. False, deceitful, and treacherous person cannot tell about himself that what will he behave next to others or what will he behave with himself in a situation. In such a situation, in his trickery, his life goes away from him and he goes away from his important goal and his downfall goes faster but he enjoys the speed of decadence by assuming it his strength because power always gives the impression of speed and speed always gives the impression of power.

-9:50 P.M.


परमसत्य की खोज…23

25 दिसम्बर 2003

 पहले मैं स्वयं से घृणा करता था, स्वयं से लड़ता था, खुद को सजाएं देता था, अब मैं स्वयं से प्रेम करता हूँ।

-8:42 A.M.

मैं निरंतर बढ़ता चला आ रहा हूँ, निम्नतर सत्य से उच्चतर सत्य की ओर, सत्य से परम सत्य की ओर, अंधकार से प्रकाश की ओर, शक्ति के अगाध समुद्र की ओर।

-9:40 A.M.

बाहरी नशा होता है आत्म-विस्मृति के लिए किन्तु जो आत्म-स्मृति का नशा चख लेता है वह कभी इस नशे से बाहर आना नहीं चाहता। बाहरी नशे में आदमी निरंतर खोता चला जाता है लेकिन आत्मस्मृति के नशे में आदमी जितने गहरे जाते जाता है उतना ही निरंतर पाते चला जाता है।

-9:50 A.M.

जब हम स्वयं को इस समग्र विश्व के हिस्से के रूप में देखते हैं तो व्यक्तिगत, जातिगत और देश-काल -निमित्तगत बंधनों से मुक्त हो जाते हैं, रिश्ते और नातों के संकुचित अर्थों से मुक्त हो जाते हैं।

-10:50 A.M.

छोटे से छोटे कार्यों को यदि व्यापक दृष्टि रखते हुए किया जाए तो वे महान बन जाते हैं।

-10:55 A.M.

एक छोटा बच्चा कितनी ही भीड़ में क्यों न हो, अपने माँ-बाप का चेहरा पहचान लेता है और दौड़कर उनके पास जाकर उनसे लिपट जाता है। हमें भी उस छोटे बच्चे की तरह अपनी आत्मा को इस संसार की भीड़ में रहते हुए भी कभी नहीं भूलना चाहिए और हमेशा आत्मकेंद्रित बने रहना चाहिए, तभी हम शक्ति का स्त्रोत हो पाएंगे।

-11:00 A.M.

जिस प्रकार काफिले में चलने वाले लोग सारी धरती पर विचरण करते हुए कहीं भी डेरा डाल लेते हैं पर घर नहीं बसाते, वैसे ही हमें संसार की बुराइयों के बीच रहते हुए भी उनके बीच घर नहीं बसाना चाहिए।

-11:20 A.M.


वह आदमी इस दुनिया में सब कुछ कर सकता है, जो इन दो चीजों को कभी नहीं भूलता – आत्मा और मृत्यु।

-2:40 P.M.

अपनी आत्मा की प्यास बुझाने के लिए मुझे परमशक्ति की आनंदगंगा चाहिए, अगर वो नहीं मिलती तो उसकी जगह मैं संसार में बहने वाली वासना की गन्दी नाली से अपनी प्यास कैसे बुझा सकता हूँ। मुझे पहुंचना होगा परमशक्ति की आनंदगंगा के तट पर, मेरी शक्ति ही मेरी तृप्ति होगी, दुर्बलता कभी तृप्ति नहीं दे सकती।

-3:00 P.M.

अब मैं सोचता हूँ कि क्या सत्य और कल्पना में भी कोई संबंध हो सकता है?

सत्य और कल्पना में से सबसे पहले किसका प्रादुर्भाव हुआ?

सत्य को प्रकट करने के लिए कल्पना किस हद तक अनिवार्य है और कल्पना को प्रकट करने के लिए सत्य किस हद तक अनिवार्य है?

एक स्थिति ऐसी आती है, जब कल्पनाएं भी सत्य होती चली जाती हैं और एक स्थिति ऐसी भी आती है जब कल्पना सत्य से कोसों दूर होती है तथा और भी परे होती चली जाती है। ये स्थितियां भी आपकी मानसिक तथा आध्यात्मिक अवस्थाओं पर निर्भर करती हैं। यदि आपके जीवन में सत्य का प्रवेश होते चला जाता है तथा एक स्थिति के बाद आपका जीवन पूर्ण सत्यमय हो जाता है तो कई बार आपकी कपोल कल्पनाएं भी सजीव हो उठती हैं क्योंकि उस समय मन का धरातल ऐसा बन जाता हैं कि आप कल्पना में भी असत्य को नहीं ला सकते, आपकी कल्पना भी सत्य से अभिभूत हो उठती है। वास्तव में उस समय तक भी आप सत्य की शक्तियों को नहीं जान पाते, सत्य के जादू को नहीं जान पाते। इस अवस्था में कल्पना भी झूठी नहीं हो सकती।

इसके विपरीत यदि आप अपने जीवन को लगातार झूठ से भरते चले जाते हैं, मिथ्याचरण, छल और कपट से जीवन विकृत बनाते चले जाते हैं तो एक स्थिति में आपका जीवन इतना भ्रमित हो जाता है कि वह आपको भी पहचानने से इंकार करने लगता है। मिथ्या, छल और कपट भरा आचरण करने वाला व्यक्ति खुद नहीं बता सकता कि वह आगे किसके साथ क्या व्यवहार करेगा या खुद के साथ किस परिस्थिति में क्या व्यवहार करेगा। इस तरह एक स्थिति में उसकी चालबाजियों में कर जिंदगी उससे दूर होती चली जाती है और वह अपने महत्त्वपूर्ण लक्ष्य से दूर होता चला जाता है और उसका पतन शीघ्रगामी होता चला जाता है पर वह पतन की गति को भी अपनी ताकत समझ ख़ुशी मनाता है क्योंकि शक्ति हमेशा गति का आभास देती है और गति हमेशा शक्ति का आभास देती है।

-9:50 P.M.

Discovery of the absolute truth … 22 (परमसत्य की खोज…22)

Adventure of the Truth…

Discovery of the absolute truth … 22

December 23, 2003

Mirror is very surprised to see me,

Sometimes I look like a straw, sometimes a river and sometimes a sea.

-7:05 A.M.

Loneliness asks us, on every move,

What is this zeal along with you?


Life asks me in dream, every day,

Who is this, settled inside you, doing magic?

-7:15 A.M.

There is no power more than will power.

-7:20 A.M.

When has the wind stopped for accompany of someone?

When has the fire stopped for accompany of someone?

When has the storm waited for accompany of someone?

When has the strength waited for someone?

Who has been able to be companion of all these?

Then how can someone be my companion?

Then how can I stop for accompany of someone?

-7:30 A.M.

The obstacles test you, if you succeed, then these enrich you by strength and if you fail, then these take away the remaining strength too.

-9:40 A.M.

Now I am realizing that the absolute truth is bliss, a great bliss. Yes, it can’t be anything other than this great bliss. As I am reaching near the absolute truth, I am getting wet in the bliss.

-11:38 A.M.

What is the irony is that in the last time of man, the truth stands in front of him, yet he runs away by fearing it. Rather than strength, he selects the weakness, instead of truth, he chooses only the untrue (delusion).

-9:40 P.M.

People want me to do hypocrisy and support lies, people want me to show false love, to express false sympathy.

What should I do?

Should I be hypocrite by showing sympathy and by supporting lie?


Should I go with truth, being neutral?

They want me to get involved in their weakness but how can I go deliberately on the wrong path? How can I choose the path of falsehood even knowing?

They want me to cry on their weaknesses with them but now how can I cry while I have forgotten to cry.

-9:45 P.M.

People suffer – because of their ignorance, due to their sin, due to their weaknesses, Due to the dishonesty and fraud made with self, due to the dishonesty and fraud done with that supreme truth.

-9:50 P.M.

I cannot leave the truth for a moment, not at any cost. Now I can not let enter the untruth even a bit in my life.

Therefore, it will be better to give up the weaknesses on their condition instead of embracing them, regardless of the results anyway.

-9:55 P.M.

He always embraced weakness,

He refused strength, removed it away,

He accepted the illusion,

He afraid of struggle, ran away from the truth,

Kept himself covered with ignorance,

Turned down the knowledge,

Even now he is holding tightly the weaknesses,

And he is crying, screaming that someone should protect them from the clutches of this weakness.

-10:05 P.M.

Man keeps on looking throughout the life that nobody can do any good except for the absolute truth (supreme soul). Except the only absolute truth, no one (wife, children, siblings, parents, friends) is not his own. Yet he runs away from it and keeps embracing the illusion (wife, children, siblings, parents, friends), Just like, a person does not want to wake up by sleep in the fascination of a dream.

-10:25 P.M.

‘History repeats itself.’ It is true, but we are beyond the truth, therefore we cannot know.

-10:45 P.M.

I declare that I have gone mad but my madness is also – ‘truth’.

-10:50 P.M.

Walking on the path of truth is like walking on a double-edged sword.

-11:08 P.M.


परमसत्य की खोज…22

23 दिसम्बर 2003

आईना हमें देख के हैरान है बहुत,

कभी कतरा, कभी दरिया, कभी समंदर नजर आते हैं हम।

-7:05 A.M.

तन्हाई हमसे पूछती है, हर कदम-कदम,

ये जोश किस बला का तेरे साथ-साथ है।


जिंदगी रोज़ हमसे पूछती है आके ख्वाब में,

ये कौन बस गया है, जो जादू जगा रहा है।

-7:15 A.M.

इच्छाशक्ति से बढ़कर और कोई शक्ति नहीं।

-7:20 A.M.

हवा भला कब किसी के साथ के लिए थमी है?

आग भला कब किसी के साथ के लिए रुकी है?

तूफ़ान ने कब किसी का इन्तजार किया है?

शक्ति ने कब किसी की प्रतीक्षा की है?

कौन इन सब का हमसफ़र हो सका है?

तो फिर मेरा हमसफ़र कोई कैसे हो सकता है?

फिर भला मैं किसी के साथ के लिए कैसे रुक सकता हूँ?

-7:30 A.M.

बाधाएं तुम्हें परखती हैं। अगर तुम सफल होते हो तो तुम्हें शक्ति से मालामाल करती चली जातीं हैं और अगर तुम असफल होते हो तो तुम्हारी रही-सही शक्ति भी छीन लेतीं हैं।

-9:40 A.M.

अब मैं अनुभव कर रहा हूँ कि परमसत्य एक आनंद है, महा-आनंद। हाँ, वह इस महा-आनंद के सिवा कुछ और हो ही नहीं सकता। जैसे-जैसे मैं परमसत्य के निकट पहुँचता जा रहा हूँ, वैसे-वैसे आनंद रस में भीगता जा रहा हूँ।

-11:38 A.M.

कैसी विडम्बना है कि मनुष्य के अंतिम समय में सत्य उसके एकदम सामने खड़ा रहता है फिर भी वह उससे भयभीत होकर भागता है। शक्ति की बजाय वह दुर्बलता का ही वरण करता है, सत्य की बजाय असत्य (भ्रम) का ही वरण करता है।

-9:40 P.M.

लोग चाहते हैं कि मैं मिथ्याचरण कर झूठ का साथ दूँ, झूठा प्रेम दिखाऊं, झूठी सहानुभूति व्यक्त करूँ।

मुझे क्या करना चाहिए?

सहानुभूति दर्शाकर मिथ्याचरण कर झूठ का साथ देना चाहिए?


तटस्थ होकर, उदासीन होकर सत्य का साथ देना चाहिए?

वे मुझे अपनी दुर्बलता में सम्मिलित करना चाहते हैं पर मैं जानबूझकर गलत रास्ते पर कैसे जा सकता हूँ? मैं जानते हुए भी असत्य का मार्ग कैसे चुन सकता हूँ?

वे मुझे अपनी कमजोरियों पर अपने साथ रुलाना चाहते हैं पर अब मैं कैसे रो सकता हूँ जबकि मैं रोना भूल चुका हूँ।

-9:45 P.M.

लोग कष्ट पाते हैं – अपने अज्ञान के कारण, अपने पाप के कारण, अपनी दुर्बलता के कारण, स्वयं के साथ की गई बेईमानी और धोखेबाजी के कारण, उस परमसत्य के साथ की गई बेईमानी और धोखेबाजी के कारण।

-9:50 P.M.

मैं सत्य का साथ थोड़ी देर को भी नहीं छोड़ सकता, किसी कीमत पर नहीं। अब मैं रंच मात्र भी असत्य को प्रवेश नहीं दे सकता अपने जीवन में।

अतः दुर्बलताओं को उनके हाल पर छोड़ देना ही उचित होगा बजाय उन्हें गले लगाने के, भले ही परिणाम कुछ भी हो।

-9:55 P.M.

उन्होंने हमेशा दुर्बलता को अपने गले लगाया,

शक्ति को नकारा, दूर हटाया,

भ्रम को स्वीकार किया,

संघर्षों से डरकर सत्य से दूर भागे,

अज्ञान से स्वयं को लिपटाए रखा,

ज्ञान को ठुकराया,

अब भी वे दुर्बलताओं को कसकर पकड़े हुए हैं,

और रो रहे हैं, चिल्ला रहे हैं कि कोई उन्हें इस दुर्बलता के चंगुल से बचाए।

-10:05 P.M.

आदमी जिंदगी भर देखते रहता है कि एकमात्र परमसत्य (परमात्मा) के अलावा उसका उपकार कोई नहीं कर सकता। एकमात्र परमसत्य के अलावा कोई (पत्नी, संतानें, भाई-बहन, माँ-बाप, मित्रगण) उसका अपना नहीं। फिर भी वह उससे दूर भागता है और भ्रम (पत्नी, संतानें, भाई-बहन, माँ-बाप, मित्रगण) को ही गले लगाए रहता है, ठीक वैसे ही, जैसे कोई व्यक्ति स्वप्न के मोह में नींद से जागना  ही न चाहे।

-10:25 P.M.

‘इतिहास स्वयं को दोहराता है। ‘ सच है यह बात लेकिन हम परे हैं इस सत्य के, इसलिए नहीं जान पाते।

-10:45 P.M.

मैं यह घोषणा करता हूँ कि मैं पागल हो चुका हूँ पर मेरा पागलपन भी है – ‘सत्य’.

-10:50 P.M.

सत्य के मार्ग पर चलना दोधारी तलवार पर चलने जैसा है।

-11:08 P.M.

Discovery of the absolute truth … 21 (परमसत्य की खोज…21)

Adventure of the Truth…

Discovery of the absolute truth … 21

December 22, 2003

The way we think that the fall of the human race must have happened in the pig caste. In the same way the pig may also think that ‘the decline of pig caste must have happened in mankind.’ Just as we think, ‘we are living the best life in the birth of a human being’ and do not want to give up this life that is we do not want to die. It is possible that pigs must be thinking that ‘we are living the best life in the form of pigs on earth; God has sent us to this earth by giving us important work of removing man’s shit from the earth. They must be seeing even God as a pig. This way pigs do not want to leave their dirty lives too. Just as the pig does not want to reach its higher status (human state) by being cool in its life, in the same way, ordinary humans do not want to achieve their higher status by being happy in their life.

-7:15 A.M.

The tools without which it seemed impossible to spend the life first now have become useless; they have left from me automatically. The things, the imagination of which was giving the experience of the pleasure of heaven earlier, those things now seem to be children’s play. People’s things seem childish. People’s life seems to be childish. Am I really become so old?

-9:00 A.M.

Most part of our grief is the desire of unnecessary.

-9:20 A.M.

My life is made for the revelation of truth.

-9:22 A.M.

Motion is the power, the power is the motion. Conversion of motion is power and conversion of power is motion. Life is also a motion, death is also a motion. Motion is the eternal truth, stability is illusion.

-9:40 A.M.

Expectations from others give rise to misery; The reason for our misery is not to be satisfied our selfishness.

-11:40 A.M.

Our body is the source of infinite energy.

-11:55 A.M.

The principle of Christ, when someone slaps on one cheek then show him/her the second cheek, is not weakness or cowardice but a high level of courage. It is a sign of absence of anger, fear and weakness; it’s a sign of absence of feeling of honor and insult, it’s a sign of absence of physical ego, it’s a sign of the absence of meanness, it’s a sign of presence of vastness, it’s a sign of greatness, it’s the sign of the effect of the proximity of supreme power, it’s the sign of the furiousness of power, but my power has not reached this height right now, my courage has not been completely free from anger and fear.

Gautam Buddha’s boldness in front of Angulimal was the flow of the same great power, in front of which Angulimal’s audacity could not stay.

-9:55 P.M.


परमसत्य की खोज…21

22 दिसम्बर 2003

जिस प्रकार हम सोचते हैं कि ‘मानव जाति का पतन सुअर जाति में होता होगा।’ उसी तरह सुअर भी सोचते होंगे कि ‘सुअर जाति का पतन मानव जाति में होता होगा।’ जिस प्रकार हम सोचते हैं कि ‘हम मानव के जन्म में सर्वश्रेष्ठ जीवन बिता रहे है’ और इस जीवन को छोड़ना नहीं चाहते अर्थात मरना नहीं चाहते। बहुत संभव है कि सुअर भी सोचते होंगे कि ‘हम पृथ्वी पर सुअर के रूप में सर्वश्रेष्ठ जीवन बिता रहे हैं, परमात्मा ने हमें पृथ्वी से मनुष्यों की गंदगी दूर करने का महत्त्वपूर्ण कार्य देकर इस पृथ्वी पर भेजा है।‘ वे परमात्मा को भी सुअर के रूप में देखते होंगे। इस तरह सूअर अपने गंदे जीवन को भी छोड़ना नहीं चाहते। जिस प्रकार सुअर अपने जीवन में मस्त होकर अपनी उच्चतर अवस्था (मानव अवस्था) को पाना नहीं चाहते उसी प्रकार साधारण मनुष्य भी अपने जीवन में मस्त होकर अपनी उच्चतर अवस्था को पाना नहीं चाहता।

-7:15 A.M.

जिन साधनों के बगैर पहले जिंदगी बिताना असंभव लगता था अब वे साधन भी व्यर्थ हो गए हैं, अपने आप ही मुझसे छूट गए हैं। जिन चीजों की कल्पना पहले स्वर्गिक आनंद की अनुभूति कराती थी, वे चीजें अब बच्चों का खेल लगती हैं। लोगों की बातें बचकानी लगती हैं। लोगों का जीवन बचपना लगता है। क्या मैं सचमुच इतना बड़ा हो गया हूँ?

-9:00 A.M.

हमारे दुःख का अधिकांश भाग अनावश्यक की कामना होता है।

-9:20 A.M.

मेरा जीवन सत्य के रहस्योद्घाटन के लिए बना है।

-9:22 A.M.

गति ही शक्ति है, शक्ति ही गति। गति का रूपांतरण शक्ति है, शक्ति का रूपांतरण गति। जीवन भी गति है, मृत्यु भी गति। गति ही शाश्वत सत्य है, विराम भ्रम है।

-9:40 A.M.

दूसरों से अपेक्षाएं ही दुखों को जन्म देतीं हैं, हमारे दुखों का अधिकांश कारण हमारे स्वार्थ की पूर्ति न होना है।

-11:40 A.M.

हमारा शरीर अनंत ऊर्जा का स्त्रोत है।

-11:55 A.M.

ईसा का किसी के एक गाल पर चांटा मारने पर दूसरा गाल दिखाने का सिद्धांत दुर्बलता या कायरता नहीं वरन उच्चस्तरीय साहस है। क्रोध, भय या दुर्बलता के अभाव का प्रतीक है, मान-अपमान की भावना के अभाव का प्रतीक है, भौतिक अहम् के अभाव का प्रतीक है, क्षुद्रता के अभाव का प्रतीक है, विशालता के भाव का प्रतीक है, विराटता के भाव का प्रतीक है, परमशक्ति के सान्निध्य के प्रभाव का प्रतीक है, शक्ति की प्रचंडता का प्रतीक है, पर मेरी शक्ति अभी इस ऊंचाई तक नहीं पहुँच पाई है, मेरा साहस अभी क्रोध और भय से पूर्णतः मुक्त नहीं हो पाया है।

गौतम बुद्ध की अंगुलिमाल के सामने प्रकट निर्भीकता उसी प्रचंड शक्ति का प्रवाह थी जिसके सामने अंगुलिमाल के दुस्साहस की दुर्बलता भी नहीं टिक सकी।

-9:55 P.M.

Discovery of the absolute truth … 20 (परमसत्य की खोज…20)

Adventure of the Truth…

Discovery of the absolute truth … 20

December 21, 2003

Humans are so dishonest that even they don’t love themselves truly, on the day when he will learn to love himself, on that day he will recognize the hidden power within him. On the day when he will learn to love himself truly, he will not be able to hate anyone after that day.

-7:15 A.M.

Every idiot in the world is the greatest wise man in his own eyes, and every stupidity is wisdom in his eyes. So we have to be smart so that our intelligence too not be our idiocy.

-4:10 p.m.

The person who speaks with himself is either wise man or a mad. I too talk to myself then what am I?

-4:30 p.m.

Sometimes the pursuit of knowledge also gives the illusion of insanity. I am getting rid of my knowledge. I am moving towards knowledge or towards ignorance, or towards the zero?

-4:35 p.m.

The condition of poverty and richness is more mental than physical illness. Resources and power are available for everyone. Those, who exploit these resources properly are rich and who do not exploit these resources properly are poor.

There are two types of people in the world, one who remain unhappy and damn their fate and the poverty. Secondly, those who change their fate by turning the scarcity into prosperity by their courage and their power.

-7:40 p.m.

They feel the distance from the target who get trapped in other temptations and wanders away from the target again and again. Those, whose life itself has become the goal, how can think of failure? Who lost themselves in the goal, who forgot themselves in the goal, how can they go away from the goal? How can they think of someone else except the goal? Everything reminds me of my goal (absolute truth).

-7:05 p.m.

Obstacles are indicator that you are reaching the goal.

-8:20 p.m.

Whenever I see the mirror, a question appears on my face -‘What is the Absolute truth?’

When I see an infant, its innocence smile asks -‘What is the Absolute truth?’

The chime laugh of carefree young girls asks -‘What is the Absolute truth?’

Careless joking laughs of ignorant people ask -‘What is the Absolute truth?’

The innocent eyes of the animals ask -‘What is the Absolute truth?’

Looking at the blooming flowers, it seems as these are saying -‘What is the Absolute truth?’

When I wake up in the morning, the sun’s rays ask -‘What is the Absolute truth?’

Air blows one end of my shawl and asks -‘Tell me! Where did I come from?’

Redness of the evening and sunset in the west ask -‘What is the Absolute truth?’

The darkness of the night asks -‘What is the Absolute truth?’

Every night the dreams emerging on the screen of my psyche ask -‘What is the Absolute truth?’

And then I get drown in meditation.

-9:45 p.m.

I’m going on my bicycle somewhere. A funeral procession passes from the front on the way. I think that this is a celebration of liberation, why are people so sad? Why are there tears in their eyes?

My conscience says from within – ‘O foolish! Don’t you understand even that much. This sadness is false. This sorrow is false, this distraction is also false and tears in the eyes are also liars? Everything is a relative illusion, after two hours, all this will not be so, and after two days there will be no other sign of the died person, except a picture with a garland.’

If this is a lie, then what is the truth? ‘ I question in my mind.

-‘Ha-ha-ha! You are asking me. Truth is just a question – ‘What is the ultimate truth?’ Know if you can.’ The inner voice resonates and my somnolence breaks.

And I go ahead by pedaling the bicycle, repeating in my mind – ‘What is the absolute truth?’

[Based on the remembrance of the experience on Last Sunday 14 December 2003/12: 05 p.m., which I forgot for some reason at that time.]


परमसत्य की खोज…20

21 दिसम्बर 2003

इंसान इतना बेवफा है कि वह खुद से भी सच्चा प्रेम नहीं करता, जिस दिन वह खुद से सच्चा प्रेम करना सीख जाएगा, उस दिन वह अपने भीतर छिपी शक्ति को पहचान जाएगा। जिस दिन वह खुद से सच्चा प्रेम करना सीख जाएगा, उस दिन के बाद वह किसी से घृणा नहीं कर सकेगा।

-7:15 A.M.

दुनिया का हर बेवकूफ खुद की नजर में सबसे बड़ा अक्लमंद होता है और उसकी हर बेवकूफी उसकी नजर में एक अक्लमंदी होती है इसलिए हमें होशियार रहना होगा कि कहीं हमारी अक्लमंदी भी हमारी बेवकूफी ही न हो।

-4:10 p.m.

खुद से बातें करने वाला या तो ज्ञानी होता है या पागल। मैं भी तो खुद से बातें करता हूँ, तो फिर मैं क्या हूँ?

-4:30 p.m.

कभी कभी ज्ञान का अनुसरण भी पागलपन का भ्रम देता है। मेरा ज्ञान तो मुझसे छूटते जा रहा है। मैं ज्ञान की तरफ बढ़ रहा हूँ या अज्ञान की तरफ, या फिर शून्य की तरफ?

-4:35 p.m.

गरीबी और अमीरी की अवस्था भौतिक कम और मानसिक रोग ज्यादा है। साधन और शक्ति सभी के लिए उपलब्ध हैं। जो इन साधनों का उचित दोहन कर ले वह अमीर और जो इन साधनों का उचित दोहन न कर शक्ति का अपव्यय करे, वह गरीब है।

दो तरह के लोग होते हैं दुनिया में, एक वे जो दुखी होकर विपन्नता और भाग्य को कोसते रहते हैं। दूसरे वे जो अपने साहस और अपनी शक्ति से विपन्नता को सम्पन्नता में बदल कर अपना भाग्य बदल देते हैं।

-7:40 p.m.

लक्ष्य से दूरी वे महसूस करते हैं जो अन्य प्रलोभनों में फंसकर बार-बार भटककर उससे दूर होते चले जाते हैं। जिनका जीवन ही लक्ष्य बन चुका है वे असफलता के बारे में सोच भी कैसे सकते हैं? जिन्होंने खुद को ही लक्ष्य में खो दिया, जिन्होंने खुद को ही लक्ष्य में भुला दिया, वे लक्ष्य से दूर कैसे जा सकते हैं? वे लक्ष्य को छोड़कर किसी और के बारे में सोच भी कैसे सकते हैं? मुझे तो हर चीज मेरे लक्ष्य (परमसत्य) की ही याद दिलाती है।

-7:05 p.m.

बाधाएं इस बात की द्योतक हैं कि आप लक्ष्य के करीब पहुंच रहे हैं।

-8:20 p.m.

जब भी मैं आईना देखता हूँ, मेरे चेहरे पर एक प्रश्न झलकता नजर आता है -‘परमसत्य क्या है?’

किसी छोटे बच्चे को देखता हूँ, उसकी भोली-भाली मुस्कान पूछती है -‘परमसत्य क्या है?’

अल्हड़ नवयौवनाओं की खनकती गूंजती हंसी पूछती है -‘परमसत्य क्या है?’

अज्ञानियों की लापरवाह हंसी-ठिठोली पूछती है -‘परमसत्य क्या है?’

निरीह जानवरों की मासूम आँखें पूछती हैं -‘परमसत्य क्या है?’

खिलते हुए फूलों को देखता हूँ तो लगता है, जैसे कह रहे हों -‘परमसत्य क्या है?’

सुबह उठता हूँ, सूरज की किरणें पूछती हैं -‘परमसत्य क्या है?’

हवा मेरी शॉल का एक छोर उड़ा ले जाती है और पूछती है -‘बता! मैं कहाँ से आई?’

साँझ की लालिमा और पश्चिम में डूबता सूरज पूछते हैं -‘परमसत्य क्या है?’

रात का अँधेरा पूछता है -‘परमसत्य क्या है?’

हर रात मेरे मानस पटल पर उभरते स्वप्न पूछते हैं -‘परमसत्य क्या है?’

और फिर मैं खुद से पूछता हूँ -‘परमसत्य क्या है?’

और ध्यान में डूब जाता हूँ।

-9:45 p.m.

मैं साइकिल पर कहीं जा रहा हूँ। रास्ते पर सामने से एक शवयात्रा निकलती है। मैं सोचता हूँ कि ये तो मुक्ति का उत्सव है, लोग इतने उदास क्यों हैं? इनकी आँखों में आंसू क्यों हैं?

मेरे भीतर से अंतर्मन कहता है -‘अरे मूर्ख! इतना भी नहीं समझता। ये उदासी झूठी है। ये दुःख झूठा है, ये व्याकुलता भी झूठी है, आँखों में आंसू भी झूठे हैं? सब कुछ एक सापेक्षिक भ्रम है, दो घंटे बाद ये सब कुछ नहीं होगा और दो दिन बाद मरने वाले का कोई और नामो-निशान नहीं होगा, एक माला चढ़ी तस्वीर के सिवा।’

-‘अगर ये सब झूठ है तो फिर सत्य क्या है?’ मैं मन ही मन प्रश्न करता हूँ।

-‘हा -हा -हा! अब ये भी मुझसे पूछ रहा है। सत्य सिर्फ एक प्रश्न है – ‘परम सत्य क्या है?’ जान सके तो जान ले।’ भीतर अंतर्मन की आवाज गूंजती है और मेरी तन्द्रा टूटती है।

और मैं आगे बढ़ जाता हूँ साइकिल पर पैडल मारते हुए, अपने मन में दोहराते हुए – ‘परम सत्य क्या है?’

[पिछले रविवार १४ दिसम्बर २००३ /१२:०५ p.m. के अनुभव के स्मरण पर आधारित, जो किसी कारणवश उस समय मैं भूल गया था।]

Discovery of the absolute truth … 19 (परमसत्य की खोज…19)

Adventure of the Truth…

Discovery of the absolute truth … 19

December 20, 2003

As far as possible, avoid criticism of others. Criticism of others narrows our ideology. It makes our mentality frustrated, interrupts our mental and spiritual advancement. We will not get anything by criticizing others. Become a critic of yourself, review yourself, only then we will be able to achieve everything we want.

-2:30 p.m.

Some time ago I used to think, how should I spend my time? Now I think, from where I should bring more time to finish my daily tasks. I have understood very well the meaning of idiom ‘stay busy, be happy.’

We should always try that if we can’t put good impact on others, then do not let a bad influence on others. If we can’t give a positive outlook to his ideology, then do not give negative outlook too. If we can’t calm the hunger of other, do not make him mad by distorting his hunger. Every man can’t adopt each virtue. Not everything is made for every man. Attempt to improve others is silly. Improve yourself, those who have to improve, they will improve on their own by being inspired by your character. Forced ass can’t be made a horse, so the basic requirement is not to reform the society but to improve ourselves. We have to become a self-reformer, not a social reformer.

-3:00 p.m.

Most time of our life goes waste in thinking about the lives of others. If we start thinking about our lives at the same time then our life will become a beautiful palace of achievements.

-2:07 p.m.

We often think about the shortcomings, we do not think about the measures to overcome the shortcomings. We always worry, we do not contemplate. We always promote weaknesses by thinking about weaknesses frequently; we do not expel weakness by thinking about might.

-3:15 p.m.

I’m listening a strange silence today, which is constantly running with me, in the solitude of the house, in the market, at the crossroads, in crowds, in clamor…

-4:55 p.m.


परमसत्य की खोज…19

20 दिसम्बर 2003

जहाँ तक संभव हो, दूसरों की आलोचना से बचें। दूसरों की आलोचना हमारी विचारधारा को संकीर्ण करती है। हमारी मानसिकता को कुंठित करती है, हमारी मानसिक एवं आत्मिक उन्नति में बाधा उत्पन्न करती है। दूसरों की आलोचना करके हमें कुछ हासिल नहीं होगा। स्वयं के आलोचक बनें, स्वयं की समीक्षा करें, तभी हम वह सब कुछ हासिल कर पाएंगे, जो हम चाहते हैं।

-2:30 p.m.

पहले मैं सोचता था कि अपना समय कैसे व्यतीत करूँ। अब मैं सोचता हूँ कि अपने नित्य निर्धारित कामों को ख़त्म करने के लिए और अधिक समय कहाँ से लाऊँ। मैं भली भांति समझ चुका हूँ इस मुहावरे का अर्थ ‘व्यस्त रहो, मस्त रहो।’

हम हमेशा ये प्रयास करें कि यदि हम दूसरों पर अपना अच्छा प्रभाव नहीं डाल सकते तो उस पर अपना कुप्रभाव भी न पड़ने दें। यदि उसकी विचारधारा को सकारात्मक दृष्टिकोण नहीं दे सकते तो नकारात्मक दृष्टिकोण भी न दें। यदि हम दूसरे की भूख को शांत नहीं कर सकते तो उसकी भूख को विकृत करके उसे पागल भी न बनाएं। हरेक आदमी हर गुण को ग्रहण नहीं कर सकता। हर चीज हर आदमी के लिए नहीं बनी होती। दूसरों में सुधार लाने का प्रयास ही मूर्खतापूर्ण है। आप अपने आप में सुधार लाएं, जिन्हें सुधरना होगा, वे आपके चरित्रबल से प्रेरित होकर स्वयं ही सुधर जाएंगे। बलपूर्वक गधे को घोड़ा नहीं बनाया जा सकता, अतः मूल आवश्यकता समाज सुधार की नहीं है, आत्मसुधार की है। हमें समाज सुधारक नहीं बल्कि आत्म सुधारक बनना होगा।

-3:00 p.m.

हमारे जीवन का अधिकांश समय दूसरों के जीवन के बारे में सोचने में व्यर्थ चला जाता है। यदि हम वही समय अपने जीवन के बारे में सोचने में लगा दें तो हमारा जीवन उपलब्धियों का सुन्दर महल बन जाए।

-3:07 p.m.

हम अक्सर कमियों के बारे में सोचते हैं, कमियों को दूर करने के उपायों के बारे में नहीं सोचते। हम हमेशा चिंता करते हैं, चिंतन नहीं करते। हम हमेशा दुर्बलताओं के बारे में सोच-सोच कर दुर्बलता को ही बढ़ावा देते हैं, शक्ति के बारे में सोचकर दुर्बलता को नहीं खदेड़ते।

-3:15 p.m.

अजीब से सन्नाटे को सुन रहा हूँ मैं आज, जो निरंतर मेरे साथ चल रहा है, घर के एकांत में, बाजार में, चौराहे पर, भीड़-भाड़ में, शोरगुल में…

-4:55 p.m.

Discovery of the absolute truth … 18 (परमसत्य की खोज…18)

Adventure of the Truth…

Discovery of the absolute truth … 18

December 19, 2003

People consider…

Their ignorance as their knowledge,

Their faults as their virtue,

Their weakness as their power,

Their ego as their power,

Their weakness as their strength,

Their inefficiency as their misfortune,

Their cowardice as their smartness,

Their fear and timidity as their wisdom,

Their fugitiveness as their intelligence,

Their relative illusion as their happiness,

The truth of the life as sadness,

Illusion as the truth,

True joy as a miracle,

And truth as an impossible event.

-8:40 a.m.

Today the same strange power is running in my body. Today again the same power is vibrating my each pore. Today again I am being thrilled in the flow of the same power. Countless waves are rising up out of my heart; these are evanishing around my body, in my aura. Today, again temblor of power is rising from my heart, and   taking me in some other world. The vibrations of my brain are making me to feel like I am in a journey, as if I am wandering with my subtle body in some other world.

I do not believe that I am the same person who was a month ago. There is no question to believe because I am changed and I am changing constantly and my world is also changing with me.

Believe it or not, reality can also be beyond the imagination. Reality is infinitely more than imagination, I am realizing it today.

-9:30 p.m.


परमसत्य की खोज…18

19 दिसम्बर 2003


अपने अज्ञान को अपना ज्ञान,

अपने दोष को अपना गुण,

अपनी कमजोरी को अपनी शक्ति,

अपने अहंकार को अपनी शक्ति,

अपनी शक्ति को अपनी कमजोरी,

अपनी अक्षमता को अपना दुर्भाग्य,

अपनी कायरता को चालाकी,

भय तथा कापुरुषता को अक्लमंदी,

भगोड़ेपन को अपनी होशियारी,

सापेक्षिक भ्रमों को अपनी खुशियां,

जीवन की सच्चाई को दुःख,

असत्य (माया) को सत्य,

सच्चे आनंद को चमत्कार,

तथा सत्य को असंभव मानते हैं।

-8:40 a.m.

आज फिर वही विचित्र शक्ति दौड़ रही है मेरे शरीर में। आज फिर वही शक्ति मेरे रोम-रोम को स्पंदित कर रही है। आज फिर मैं रोमांचित हो रहा हूँ उसी शक्ति के प्रवाह में। अनगिनत तरंगें उठ रही हैं मेरे हृदयस्थल से और विस्तृत होकर फैलती जा रही हैं, विलीन होती जा रही हैं मेरे शरीर के चारों तरफ, आभामंडल में। आज फिर मेरे ह्रदय से उठ रहा है शक्ति का भूचाल और ले जा रहा है मुझे किसी दूसरी दुनिया में। मेरे मस्तिष्क के प्रकम्पन मुझे एक यात्रा का आभास करा रहे हैं, मानों मैं अपने सूक्ष्म शरीर के साथ किसी और ही दुनिया में विचरण कर रहा हूँ।

विश्वास ही नहीं होता कि मैं वही शख्स हूँ जो आज से एक माह पूर्व था। विश्वास करने का तो प्रश्न ही नहीं उठता क्योंकि मैं बदल चुका हूँ और सतत परिवर्तित होता चला जा रहा हूँ और मेरी दुनिया भी मेरे साथ-साथ बदलती जा रही है। कोई विश्वास करे या न करे, वास्तविकता भी कल्पनातीत हो सकती है।

कोई विश्वास करे या न करे, वास्तविकता भी कल्पनातीत हो सकती है। वास्तविकता परिमाण में कल्पना से अनंत गुना बड़ी होती है, यह आज समझ में आ रहा है।

-9:30 p.m.