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Discovery of the absolute truth … 19 (परमसत्य की खोज…19)

Adventure of the Truth…

Discovery of the absolute truth … 19

December 20, 2003

As far as possible, avoid criticism of others. Criticism of others narrows our ideology. It makes our mentality frustrated, interrupts our mental and spiritual advancement. We will not get anything by criticizing others. Become a critic of yourself, review yourself, only then we will be able to achieve everything we want.

-2:30 p.m.

Some time ago I used to think, how should I spend my time? Now I think, from where I should bring more time to finish my daily tasks. I have understood very well the meaning of idiom ‘stay busy, be happy.’

We should always try that if we can’t put good impact on others, then do not let a bad influence on others. If we can’t give a positive outlook to his ideology, then do not give negative outlook too. If we can’t calm the hunger of other, do not make him mad by distorting his hunger. Every man can’t adopt each virtue. Not everything is made for every man. Attempt to improve others is silly. Improve yourself, those who have to improve, they will improve on their own by being inspired by your character. Forced ass can’t be made a horse, so the basic requirement is not to reform the society but to improve ourselves. We have to become a self-reformer, not a social reformer.

-3:00 p.m.

Most time of our life goes waste in thinking about the lives of others. If we start thinking about our lives at the same time then our life will become a beautiful palace of achievements.

-2:07 p.m.

We often think about the shortcomings, we do not think about the measures to overcome the shortcomings. We always worry, we do not contemplate. We always promote weaknesses by thinking about weaknesses frequently; we do not expel weakness by thinking about might.

-3:15 p.m.

I’m listening strange silence today, which are constantly running with me, in the solitude of the house, in the market, at the crossroads, in crowds, in clamor…

-4:55 p.m.

(अंतर्यात्रा)

परमसत्य की खोज…19

20 दिसम्बर 2003

जहाँ तक संभव हो, दूसरों की आलोचना से बचें। दूसरों की आलोचना हमारी विचारधारा को संकीर्ण करती है। हमारी मानसिकता को कुंठित करती है, हमारी मानसिक एवं आत्मिक उन्नति में बाधा उत्पन्न करती है। दूसरों की आलोचना करके हमें कुछ हासिल नहीं होगा। स्वयं के आलोचक बनें, स्वयं की समीक्षा करें, तभी हम वह सब कुछ हासिल कर पाएंगे, जो हम चाहते हैं।

-2:30 p.m.

पहले मैं सोचता था कि अपना समय कैसे व्यतीत करूँ। अब मैं सोचता हूँ कि अपने नित्य निर्धारित कामों को ख़त्म करने के लिए और अधिक समय कहाँ से लाऊँ। मैं भली भांति समझ चुका हूँ इस मुहावरे का अर्थ ‘व्यस्त रहो, मस्त रहो।’

हम हमेशा ये प्रयास करें कि यदि हम दूसरों पर अपना अच्छा प्रभाव नहीं डाल सकते तो उस पर अपना कुप्रभाव भी न पड़ने दें। यदि उसकी विचारधारा को सकारात्मक दृष्टिकोण नहीं दे सकते तो नकारात्मक दृष्टिकोण भी न दें। यदि हम दूसरे की भूख को शांत नहीं कर सकते तो उसकी भूख को विकृत करके उसे पागल भी न बनाएं। हरेक आदमी हर गुण को ग्रहण नहीं कर सकता। हर चीज हर आदमी के लिए नहीं बनी होती। दूसरों में सुधार लाने का प्रयास ही मूर्खतापूर्ण है। आप अपने आप में सुधार लाएं, जिन्हें सुधरना होगा, वे आपके चरित्रबल से प्रेरित होकर स्वयं ही सुधर जाएंगे। बलपूर्वक गधे को घोड़ा नहीं बनाया जा सकता, अतः मूल आवश्यकता समाज सुधार की नहीं है, आत्मसुधार की है। हमें समाज सुधारक नहीं बल्कि आत्म सुधारक बनना होगा।

-3:00 p.m.

हमारे जीवन का अधिकांश समय दूसरों के जीवन के बारे में सोचने में व्यर्थ चला जाता है। यदि हम वही समय अपने जीवन के बारे में सोचने में लगा दें तो हमारा जीवन उपलब्धियों का सुन्दर महल बन जाए।

-3:07 p.m.

हम अक्सर कमियों के बारे में सोचते हैं, कमियों को दूर करने के उपायों के बारे में नहीं सोचते। हम हमेशा चिंता करते हैं, चिंतन नहीं करते। हम हमेशा दुर्बलताओं के बारे में सोच-सोच कर दुर्बलता को ही बढ़ावा देते हैं, शक्ति के बारे में सोचकर दुर्बलता को नहीं खदेड़ते।

-3:15 p.m.

अजीब से सन्नाटों को सुन रहा हूँ मैं आज, जो निरंतर मेरे साथ चल रहे हैं, घर के एकांत में, बाजार में, चौराहे पर, भीड़-भाड़ में, शोरगुल में…

-4:55 p.m.

Discovery of the absolute truth … 18 (परमसत्य की खोज…18)

Adventure of the Truth…

Discovery of the absolute truth … 18

December 19, 2003

People consider…

Their ignorance as their knowledge,

Their faults as their virtue,

Their weakness as their power,

Their ego as their power,

Their weakness as their strength,

Their inefficiency as their misfortune,

Their cowardice as their smartness,

Their fear and timidity as their wisdom,

Their fugitiveness as their intelligence,

Their relative illusion as their happiness,

The truth of the life as sadness,

Illusion as the truth,

True joy as a miracle,

And truth as an impossible event.

-8:40 a.m.

Today the same strange power is running in my body. Today again the same power is vibrating my each pore. Today again I am being thrilled in the flow of the same power. Countless waves are rising up out of my heart; these are evanishing around my body, in my aura. Today, again temblor of power is rising from my heart, and   taking me in some other world. The vibrations of my brain are making me to feel like I am in a journey, as if I am wandering with my subtle body in some other world.

I do not believe that I am the same person who was a month ago. There is no question to believe because I am changed and I am changing constantly and my world is also changing with me.

Believe it or not, reality can also be beyond the imagination. Reality is infinitely more than imagination, I am realizing it today.

-9:30 p.m.

(अंतर्यात्रा)

परमसत्य की खोज…18

19 दिसम्बर 2003

लोग…

अपने अज्ञान को अपना ज्ञान,

अपने दोष को अपना गुण,

अपनी कमजोरी को अपनी शक्ति,

अपने अहंकार को अपनी शक्ति,

अपनी शक्ति को अपनी कमजोरी,

अपनी अक्षमता को अपना दुर्भाग्य,

अपनी कायरता को चालाकी,

भय तथा कापुरुषता को अक्लमंदी,

भगोड़ेपन को अपनी होशियारी,

सापेक्षिक भ्रमों को अपनी खुशियां,

जीवन की सच्चाई को दुःख,

असत्य (माया) को सत्य,

सच्चे आनंद को चमत्कार,

तथा सत्य को असंभव मानते हैं।

-8:40 a.m.

आज फिर वही विचित्र शक्ति दौड़ रही है मेरे शरीर में। आज फिर वही शक्ति मेरे रोम-रोम को स्पंदित कर रही है। आज फिर मैं रोमांचित हो रहा हूँ उसी शक्ति के प्रवाह में। अनगिनत तरंगें उठ रही हैं मेरे हृदयस्थल से और विस्तृत होकर फैलती जा रही हैं, विलीन होती जा रही हैं मेरे शरीर के चारों तरफ, आभामंडल में। आज फिर मेरे ह्रदय से उठ रहा है शक्ति का भूचाल और ले जा रहा है मुझे किसी दूसरी दुनिया में। मेरे मस्तिष्क के प्रकम्पन मुझे एक यात्रा का आभास करा रहे हैं, मानों मैं अपने सूक्ष्म शरीर के साथ किसी और ही दुनिया में विचरण कर रहा हूँ।

विश्वास ही नहीं होता कि मैं वही शख्स हूँ जो आज से एक माह पूर्व था। विश्वास करने का तो प्रश्न ही नहीं उठता क्योंकि मैं बदल चुका हूँ और सतत परिवर्तित होता चला जा रहा हूँ और मेरी दुनिया भी मेरे साथ-साथ बदलती जा रही है। कोई विश्वास करे या न करे, वास्तविकता भी कल्पनातीत हो सकती है।

कोई विश्वास करे या न करे, वास्तविकता भी कल्पनातीत हो सकती है। वास्तविकता परिमाण में कल्पना से अनंत गुना बड़ी होती है, यह आज समझ में आ रहा है।

-9:30 p.m.

Discovery of the absolute truth … 17 (परमसत्य की खोज…17)

Adventure of the Truth…

Discovery of the absolute truth … 17

December 18, 2003

Human becomes superhuman by encroachment of the laws of nature. In the beginning, he has to struggle with nature, but later nature also begins to support him.

-8:10 a.m.

God (absolute truth) is not as complicated as it has been made by religious Lal-Bujhakkadas.

-9:20 a.m.

‘We know!’ By thinking of this we ignore many small things and remove them from the mind while these things are important for our character formation and our success.

-10:00 a.m.

Everyone is happy to keep company with the truth, as far as there is no pain.

-10:55 a.m.

The attraction of truth is the most intense attraction of the world, provided you have real iron (honesty) inside you.

-12:55 p.m.

How can be truth found by engaging ourselves in illusion, entangling ourselves in delusion? The discovery of truth has become utterly difficult because people can’t save themselves from the attraction of delusion and they get entangled in it and get continuously away from the truth. Only the truth can be invented by those who are detached from delusion, which are free from the trap of delusion in this world full of delusional charm.

-4:05 p.m.

Man has become so accustomed to hypocrisy that he also wants to prove his mistakes to others’ mistakes. He wants to impose his mistakes on others.

-9:35 p.m.

How surprising that people live their whole life by believing their false life as true, by assuming their existence to their shadow. People bear false misery knowing the truth to falsehood, celebrate false happiness, and remain deprived of true joy while true life stays at a distance of just one step from them all the time but they can’t gather the courage to grow a single step towards truth, they deny true power in front of false weakness throughout life and ultimately meet their ends. My mind gets melted by mercy, seeing the miserable condition of people.

-9:40 p.m.

Remember, when the goal is near to achieving, at the same time we become breathless. Do not lose your courage till death. If you lose courage, then you will lose even by winning.

-10:10 p.m.

(अंतर्यात्रा)

परमसत्य की खोज…17

18 दिसम्बर 2003

प्रकृति के नियमों का अतिक्रमण करके ही मानव अतिमानव बनता है। आरम्भ में उसे इसके लिए प्रकृति से संघर्ष करना पड़ता है, पर बाद में प्रकृति भी उसका साथ देने लगती है।

-8:10 a.m.

ईश्वर (परमसत्य) इतना जटिल नहीं है जितना धार्मिक लाल-बुझक्कड़ों ने इसे बना दिया है।

-9:20 a.m.

‘हम जानते हैं!’ या ‘हमें मालूम है!’ यह सोचकर हम बहुत सी छोटी-छोटी बातों की उपेक्षा कर उन्हें दिमाग से निकाल देते हैं जबकि यही बातें हमारे चरित्र गठन तथा हमारी सफलता के लिए महत्त्वपूर्ण होती हैं।

-10:00 a.m.

सत्य का साथ वहां तक देने में सबको ख़ुशी होती है, जहाँ तक कोई कष्ट न हो।

-10:55 a.m.

सत्य का आकर्षण दुनिया का सबसे तीव्र आकर्षण है बशर्ते आपके अंदर असली फौलाद (ईमानदारी) हो।

-12:55 p.m.

स्वयं को माया में फंसा कर, भ्रम में उलझाकर सत्य की खोज कैसे की जा सकती है? सत्य की खोज इसलिए दूभर हो गई है क्योंकि लोग माया के आकर्षण से खुद को बचा नहीं पाते और इसमें उलझकर सत्य से निरंतर दूर होते जाते हैं। सत्य की खोज केवल वे ही कर सकते हैं जो माया से निर्लिप्त रहें, माया के आकर्षण से भरे इस संसार में मायाजाल से मुक्त रहें।

-4:05 p.m.

आदमी मिथ्याचार का इतना आदी हो चुका है कि अपनी गलतियों को भी दूसरे की गलतियां साबित करना चाहता है। अपनी गलतियों को भी दूसरों पर थोपना चाहता है।

-9:35 p.m.

कितने आश्चर्य की बात है कि लोग अपने झूठे जीवन को सच मानकर, अपनी परछाई को अपना वजूद मानकर सारा जीवन जीते हैं। लोग झूठ को सच जानकर झूठे कष्ट सहते हैं, झूठी खुशियां मनाते हैं और सच्चे आनंद से वंचित रह जाते हैं जबकि सच्चा जीवन हर समय उनसे एक कदम की दूरी पर होता है पर वे सच की तरफ एक कदम भी बढ़ने का साहस नहीं जुटा पाते, जीवन भर झूठी दुर्बलता के सामने सच्ची शक्ति को झुठलाते रहते हैं और एड़ियाँ घिसते-घिसते मर जाते हैं। मेरा मन दया से द्रवित हो जाता है लोगों की ये दयनीय दशा देखकर।

-9:40 p.m.

याद रखो, जब मंजिल करीब होती है, तभी दम फूलता है। मर जाओ पर हिम्मत न हारो। अगर हिम्मत हार गए तो जीतकर भी हार जाओगे।

-10:10 p.m.

Discovery of the absolute truth … 16 (परमसत्य की खोज…16)

Adventure of the Truth…

Discovery of the absolute truth … 16

December 17, 2003

If you want true success, then you will have to strictly follow the discipline. The pain of the struggle will have to suffer. The more you fight, the more difficult you suffer, the sooner you will go forward, more you will reach near the goal. Those who save themselves from the struggles and those who sit on the basis of fate can never attain true success; they can only get the leavings of others’ success.

Success got by the wrong way and the success got by the help of others can’t give happiness and satisfaction for a long time, it is like a dead prey. Dead prey can make the fox happy, not the lion. Dead prey and other’s leavings are not of any use of the lion.

-10:15 a.m.

The decision of a moment is enough to transform your life into heaven and the decision of a moment is enough to ruin your life by making it hell.

-10:30 a.m.

If you break someone’s hearth, you will have to fill her stomach. You will have to burn in the fire of her stomach. You will have to die in her hunger. Your life will become a morsel of her.

-10:40 a.m.

By thinking that we love someone very much or respect him/her very much, to tolerate or accept his/her unworthy and foolish things is not the love but is weakness.

-1:00 p.m.

Fear is congenital instinct. Every creature is afraid of the creature of high power, so an ignorant person is also afraid of God.

-5:30 p.m.

In the Bible story I read that when God created Adam and Eve then they tasted the fruit of the Eden Garden and made the displeasure to God. Due to which the mountains of sorrows fell upon them. The spring of their everlasting happiness began to change in the drains of sorrows. The symbolic meaning I took was that Adam and Eve were the early man and woman, those were an unbreakable part of that superpower. When they consumed the fruit of the Garden of Eden that means they consumed lust with each other consequently they lost their power and they split apart from the ultimate power, then their power started to descend by the sex and the rest of the power was spent in increasing the next generation. This was the reason that Jesus Christ repeatedly emphasized celibacy and said, ‘Impotents are of three types, the one who are born impotent by the womb of mother, second who are made impotent by people and  third, those who become impotent themselves for the God. The impotence here does not mean to break our male organ, maybe some people did this, rather it means to abandon our sexual desire to get the supreme power…

If we want to connect again with the supreme power that Adam and Eve had lost then we will have to pace in the opposite direction of Adam and Eve, that means we will have to pace in the opposite direction of our ancestors, that means we will have to go to the center from the periphery of our social circle.

-9:15 p.m.

All the Avatar-men, Great men, or Saint-men, who are born on this earth, they are all excellent at their places. They are all incomparable; we can’t compare anyone with anyother, but even then they were an ordinary human, they were influenced by the circumstances and they struggled with unfavorable conditions to achieve that superpower. None the struggle of them can be said to be small or big, but the circumstances can’t be ignored.

As far as I understand, I have found homogeneity in the struggles of all the characters; I have found homogeneity in their heights, but still their circumstances are different. All of them were beyond the time, place and reason. But the circumstances were not beyond country-time-reason. They were completely free, but the circumstances were not free from them.

Compared to these conditions, I learned that the category of superman like Jesus, Buddha and Mahavira has assimilated only one aspect of supreme power. They all knew only one side of superpower but superman like Ram and Krishna have known both sides of the superpower and Krishna has touched the heights which Ram could not touch. So I consider Krishna a perfect superman.

I am neither biased towards Hindu religion nor following of any other popular religion (Muslim, Sikh, Christian, Buddhist). I have become neutral from all the religions; I have risen above the bonds of all religions but still cannot ignore the truths of these religions. Truth is collectible for me from everywhere; truth is acceptable to me everywhere, even if it does get by any religion.

Jesus Christ is also a stage of mine, Krishna too. Muhammad is also a stage of mine, Nanak, Buddha and Mahavir too. I am not different from any of these. That’s why I say that my religion is just one ‘truth’, my God is just one ‘absolute truth’.  The experience described above is a direct experience of my truth, there is no bias or discrimination of any religion.

-9:30 p.m.

Just as a pivot in the wheel holds the entire wheel and drives that wheel faster and faster but itself remains beyond the speed, it remains constant. In the same way, the absolute power stays steady and is holding this worldly wheel and is moving it at a certain speed, in a certain order. These changes are the relative illusions arising due to the speed of the same wheel.

-11:10 p.m.

Everything is happening in a certain order in a predefined way. I’m just an excuse. My dreams are also linked to my awakening and my awakening is also associated with my dream. My present is linked to my past and the future is from the present. Everything is relative illusion. I am leaving the perimetric speed and reaching to the axle at the center.

But still this truth can’t be denied that I am the power, I am a part of the ultimate power and will again become one with absolute power. I will be the ultimate truth from the truth. The more I am using my power, the more rapidly my strength is growing.

-11:45 p.m.

I constantly see that life is a box of magic.

-11:50 p.m.

(अंतर्यात्रा)

परमसत्य की खोज…16

17 दिसम्बर 2003

यदि सच्ची सफलता चाहते हो तो कड़े से कड़ा अनुशासन अपनाना पड़ेगा। संघर्षो के कष्टों को झेलना पड़ेगा। जितना अधिक संघर्ष करोगे, जितना अधिक कष्ट झेलोगे, उतनी ही शीघ्र आगे बढ़ोगे, उतने ही लक्ष्य के समीप पहुंचोगे। संघर्षों से खुद को बचाने वाले और किस्मत के भरोसे बैठे रहने वाले कभी सच्ची सफलता नहीं पा सकते, उन्हें सिर्फ दूसरों की सफलता की जूठन मिल सकती है।

गलत तरीके से तथा दूसरों के सहारे मिली सफलता ज्यादा दिनों तक ख़ुशी तथा संतुष्टि नहीं दे सकती, वह तो मरे हुए शिकार के समान होती है। मरा हुआ शिकार लोमड़ी को ही प्रसन्न कर सकता है, शेर को नहीं। मरा हुआ शिकार तथा दूसरों की जूठन शेर के किसी काम की नहीं होती।

-10:15 a.m.

एक पल का निर्णय ही काफी होता है आपकी ज़िंदगी को स्वर्ग में बदल देने के लिए और एक पल का निर्णय ही काफी होता है आपकी ज़िन्दगी को बर्बाद कर नर्क बना देने के लिये।

-10:30 a.m.

अगर किसी का चूल्हा फोड़ोगे तो उसका पेट भी तुम्हे ही भरना पड़ेगा। उसकी पेट की आग में तुमको ही जलना पड़ेगा। उसकी भूख में तुमको ही मिटना पड़ेगा। तुम्हारा जीवन ही उसका ग्रास बन जाएगा।

-10:40 a.m.

ये सोचकर कि हम किसी को बहुत प्रेम करते हैं या उसका बहुत आदर करते हैं, उसकी अनुचित तथा बेवकूफी भरी बातों को सहन करना या स्वीकार करना प्रेम नहीं दुर्बलता है।

-1:00 p.m.

भय अथवा डर सहजात वृत्ति है। हर प्राणी अपने से उच्च शक्ति के प्राणी से डरता है इसीलिए एक अज्ञानी इंसान भी भगवान् से डरता है।

-5:30 p.m.

बाइबिल की कहानी में मैंने पढ़ा कि जब गॉड ने आदम और ईव को बनाया तो उन्होंने ईडन गार्डन का फल चखकर गलती की और गॉड को अप्रसन्न कर दिया जिससे उन पर दुखों के पहाड़ टूट पड़े। उनके चिरस्थाई आनंद का झरना दुखों की नालियों में बदलने लगा।

इसका प्रतीकात्मक अर्थ मैंने ये लिया कि आदम तथा ईव प्रारंभिक पुरुष तथा स्त्री थे, जो उस परमशक्ति का अटूट हिस्सा थे। जब उन्होंने ईडन गार्डन का फल चखा अर्थात परस्पर काम-वासना का उपभोग किया तो उनकी शक्ति का हास हो गया और वे परम शक्ति से विखंडित होकर पृथक हो गए फिर उनकी शक्ति का काम (सेक्स) के द्वारा अधोगमन (पतन) होने लगा और बाकी बची-खुची शक्ति आगे के वंश को बढ़ाने में व्यय हो गई। यही कारण था कि ईसा मसीह ने ब्रह्मचर्य पर जोर दिया था और कहा था ‘नपुंसक तीन तरह के होते हैं, एक जो अपनी माँ के गर्भ से ही नपुंसक पैदा होते हैं, दूसरे वे जो लोगों द्वारा नपुंसक बनाए जाते हैं, तीसरे वे जो ईश्वर के लिए खुद नपुंसक बन जाते हैं।’ यहाँ नपुंसक का अर्थ यह नहीं कि अपनी पुरुषेन्द्रिय को खंडित कर दें, संभवतः जैसा कि कुछ लोगों ने किया भी हो, बल्कि इसका अर्थ है कि अपनी कामवासना को त्याग दें उस परम शक्ति को पाने के लिए…

यदि हम उस परम शक्ति से पुनः सम्बद्ध होना चाहें जिसे आदम और ईव ने खो दिया था तो हमें आदम और ईव की उलटी दिशा में चलना पड़ेगा अर्थात अपने पूर्वजों की विपरीत दिशा में चलना पड़ेगा अर्थात अपने सामाजिक चक्र की परिधि से केंद्र पर जाना पड़ेगा।

-9:15 p.m.

इस धरती पर जितने भी अवतार-पुरुष, महापुरुष या संतपुरुष हुए हैं, वे सभी अपने-अपने स्थानों पर श्रेष्ठ हैं। वे सभी अतुलनीय हैं, हम किसी की भी तुलना किसी से नहीं कर सकते, पर फिर भी वे एक साधारण मानव ही थे, परिस्थितियों से प्रभावित थे और उन्होंने प्रतिकूल परिस्थितियों से संघर्ष करते हुए उस परमशक्ति को प्राप्त किया। उनमें से किसी का भी संघर्ष छोटा या बड़ा नहीं कहा जा सकता पर परिस्थितियों को भी नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।

जहाँ तक मैं समझता हूँ, मैंने सभी चरित्रों के संघर्षों में एकरूपता पाई है, उनकी ऊंचाइयों में एकरूपता पाई है, पर फिर भी उनकी परिस्थितियां अलग-अलग पाई हैं। वे सभी तो देश-काल-निमित्त से परे थे पर परिस्थितियां देश-काल-निमित्त से परे नहीं थीं। वे तो पूर्णतया मुक्त थे पर परिस्थितियां उनसे मुक्त नहीं थीं।

इन्हीं परिस्थितियों की तुलना से मैंने ये जाना कि ईसा, बुद्ध और महावीर जैसे अतिमानवों की श्रेणी ने परमशक्ति के केवल एक ही पक्ष को आत्मसात किया है। ये सभी परमशक्ति के केवल एक ही पक्ष को जान पाए पर राम और कृष्ण जैसे अतिमानवों ने परमशक्ति के दोनों पक्षों को जाना है और कृष्ण ने उन ऊंचाइयों को भी छुआ है जिन्हेँ राम नहीं छू पाए अतः कृष्ण को मैं पूर्ण अतिमानव मानता हूँ। मैं न तो हिन्दू धर्म का पक्षपाती हूँ और न ही किसी अन्य प्रचलित धर्म (मुस्लिम, सिक्ख ईसाई, बौद्ध) का अनुगामी। मैं सभी धर्मों से तटस्थ हो चुका हूँ, सभी धर्मों के बंधनों से ऊपर उठ चुका हूँ पर फिर भी इन धर्मों के सत्यों की उपेक्षा नहीं कर सकता। सत्य तो मेरे लिए हर जगह से संग्रहणीय है, सत्य मेरे लिए हर जगह से ग्राह्य है, चाहे वह किसी भी धर्म से क्यों न मिले।

ईसा मसीह भी मेरी एक अवस्था है, कृष्ण भी। मुहम्मद भी मेरी ही एक अवस्था है, नानक, बुद्ध और महावीर भी। मैं इनमें से किसी से भी पृथक नहीं हूँ इसलिए मैं कहता हूँ कि मेरा धर्म सिर्फ एक है ‘सत्य’, मेरा ईश्वर सिर्फ एक है ‘परमसत्य’. उपरोक्त वर्णित अनुभव मेरे सत्य का ही प्रत्यक्ष अनुभव है, किसी धर्म का पक्षपात या भेदभाव नहीं।

-9:30 p.m.

जिस प्रकार एक धुरी सम्पूर्ण पहिये को थामे रहती है तथा तीव्र से तीव्रतम रफ़्तार में उस पहिये को घुमाती रहती है परन्तु स्वयं गति से परे रहती है, अचल रहती है, स्थिर रहती है। उसी प्रकार वह परम शक्ति अविचल, स्थिर रहकर इस संसार रुपी पहिये को थामे हुए है तथा एक निश्चित रफ़्तार में, एक निश्चित क्रम में घुमा रही है। ये सारे परिवर्तन उसी पहिये की गति के कारण उत्पन्न होने वाले सापेक्षिक भ्रम हैं।

-11:10 p.m.

सब कुछ पूर्व निश्चित सा एक निश्चित क्रम में घटित हो रहा है। मैं एक निमित्त मात्र हूँ। मेरे स्वप्न भी मेरी जाग्रति से जुड़े हुए हैं और मेरी जाग्रति भी मेरे स्वप्न से जुडी हुई है। मेरा वर्तमान मेरे भूत से जुड़ा हुआ है और भविष्य वर्तमान से। सब कुछ सापेक्षिक भ्रम है। मैं परिधि की गति को छोड़कर केंद्र पर स्थित धुरी पर पहुँच रहा हूँ।

पर फिर भी इस सत्य से इंकार नहीं किया जा सकता कि मैं शक्ति हूँ, परम शक्ति का एक अंश हूँ और पुनः परमशक्ति से मिलकर एक हो जाऊंगा। सत्य से परमसत्य हो जाऊंगा। मैं अपनी शक्ति का जितना अधिक उपयोग कर रहा हूँ मेरी शक्ति उतनी ही तेजी से बढ़ती जा रही है।

-11:45 p.m.

मैं लगातार देख रहा हूँ कि ज़िंदगी जादू का एक पिटारा है।

-11:50 p.m.

Discovery of the absolute truth … 15 (परमसत्य की खोज…15)

Adventure of the Truth…

Discovery of the absolute truth … 15

December 16, 2003

Idiot people only understand the language of punishment; hence the provision of punishment is kept for them. Not to punish fools and criminals for their improvement would also be injustice.

-9:50 A.M.

Today I got angry deliberately, today I had to get angry deliberately. In fact, he was not anger, it was an acting of anger, it was hypocrisy. At that time it became compulsory for me to become angry. In some circumstances anger and force-performance becomes mandatory, then it is not unreasonable to use it in public interest. In the same way, the way the police’s anger and force-performance are not inappropriate.

To become a doer, to remain in this world, sometimes we will have to be hypocritical, which means we will have to show the feeling which we are not feeling. If this hypocrisy benefits the public instead of any harm, then it is not unreasonable to do so.

-10:20 A.M.

If you are completely devoted, completely conscientious, completely truthful and completely honest, to yourself then this is enough for you. If you do not do even a little bit of hypocrisy with your soul and conscience, then you are the priest of truth in true sense, worshipers of truth and seekers of truth. If after this there is some defects in you then do not care for those flaws. Those defects will go away in a few days when you will move ahead on this path and even if these do not get end up, these will not be able to spoil much. Your dedication to yourself will force them to run away. You just have to do the same thing continuously. Every moment you have to hear the voice of your conscience and you have to accept it and assimilate it. Keep in mind that in no circumstances may you deny them. You may not ignore them.

-10:30 A.M.

Not sacrifice of resources but to use resources for the public interest is a conscience. Anybody can sacrifice the means, but if we have enough resources and power to make some welfare of the people, then it is better to use them for others welfare rather than the sacrifice.

-4:30 p.m.

If you will take away your mind from your holy purpose, then you will find your mind engaged again in those disorders, again you will find your mind fighting with those temptations.

-5:45 p.m.

Do not pay more attention to the flaws of others. If you focus your attention on the faults of others, your mind will also try to run towards defects disorderly and will waste your power.

[Dream message]

How can man enjoy happiness in lower truth after tasting the taste of higher truth? How can a person enjoy the game of children after being young?

It is equally true that a child can not understand how great the joy of youth is in comparision of the joy of childhood.

-10:10 p.m.

(अंतर्यात्रा)

परमसत्य की खोज…15

16 दिसम्बर 2003

मूर्ख लोग केवल दंड की भाषा ही समझते हैं इसलिए उनके लिए दंड का प्रावधान रखा गया है। मूर्खों और अपराधियों को उनके सुधार के लिए दंड न देना भी अन्याय होगा।

-9:50 A.M.

आज मैंने जानबूझकर क्रोध किया, आज मुझे जानबूझकर क्रोध करना पड़ा। वास्तव में वह क्रोध नहीं, क्रोध का अभिनय था, मिथ्याचार था। उस समय मेरे लिए क्रोध करना भी अनिवार्य हो गया था। कुछ परिस्थितियों में क्रोध तथा बल-प्रदर्शन अनिवार्य हो जाता है, तब उसका जनहित में प्रयोग करना अनुचित नहीं। ठीक उसी प्रकार, जिस प्रकार कि पुलिस का क्रोध व बल-प्रदर्शन अनुचित नहीं।

कर्मवादी बनने पर इस संसार में रहने के लिए थोड़ा बहुत मिथ्याचरण भी अभिनय के रूप में करना पड़ेगा अर्थात जो हमारे भीतर नहीं है वह भी दिखाना पड़ेगा। यदि इस मिथ्याचार से जनसामान्य को कोई हानि न होकर फायदा ही हो तो ऐसा करना अनुचित नहीं।

-10:20 A.M.

यदि आप स्वयं के प्रति पूर्णतः समर्पित हैं, पूर्णतः कर्तव्यनिष्ठ हैं, पूर्णतः सत्यनिष्ठ हैं, पूरी तरह ईमानदार हैं तो यही आपके लिए पर्याप्त है। यदि आप अपनी आत्मा तथा विवेक से एक छोटा सा भी मिथ्याचार नहीं करते तो आप सही अर्थों में सत्य के पुजारी हैं, सत्य के उपासक हैं, सत्य के साधक हैं। इसके बाद यदि आपमें कुछ दोष रह भी जाते हैं तो उन दोषों की परवाह मत कीजिये। वे दोष इस मार्ग पर चलते-चलते कुछ दिनों में आप ही समाप्त हो जाएंगे और यदि समाप्त नहीं भी हुए तो भी आपका ज्यादा कुछ नहीं बिगाड़ पाएंगे। आपका स्वयं के प्रति समर्पण उन्हें भागने पर विवश कर देगा। बस आपको निरंतर एक ही कार्य करना है। हर पल अपनी अंतरात्मा की आवाज सुनना है और उसे स्वीकार कर आत्मसात कर लेना है। ध्यान रहे किन्हीं भी परिस्थितियों में आप इन्हें नकार न पाएं। इनकी उपेक्षा न करने पाएं।

-10:30 A.M.

साधनों का त्याग नहीं, साधनों का जनहित के लिए सदुपयोग ही सद्विवेक है।  साधनों का त्याग तो कोई भी कर सकता है, परन्तु यदि हम इतने साधन सम्पन्न और शक्ति सम्पन्न हैं कि लोगों का कुछ कल्याण कर सकते हैं तो उनका सदुपयोग त्याग से श्रेयस्कर है।

-4:30 p.m.

यदि अपने मन को अपने पवित्र उद्देश्य से तनिक भी दूर हटाओगे तो अपने मन को पुनः उन्हीं विकारों में लिप्त पाओगे, पुनः उन्हीं प्रलोभनों से जूझता पाओगे।

-5:45 p.m.

दूसरों के दोषों पर अधिक ध्यान मत दो। यदि दूसरों के दोषों पर अपना ध्यान केंद्रित करोगे तो तुम्हारा मन भी उच्छृंखल होकर दुर्बलता की ओर भागने की कोशिश करेगा और तुम्हारी शक्तियों का अपव्यय करेगा।

[स्वप्न सन्देश]

उच्चतर सत्य का स्वाद चख लेने के बाद मनुष्य निम्नतर सत्य में आनंद कैसे उठा सकता है? युवा होने के बाद मनुष्य बच्चों के खेल का आनंद कैसे ले सकता है?

ये बात भी उतनी ही सत्य है कि एक बच्चा नहीं समझ सकता कि युवावस्था के आनंद बाल्यावस्था के आनंद से कितने श्रेष्ठतर हैं।

-10:10 p.m.

Discovery of the absolute truth … 14 (परमसत्य की खोज…14)

Adventure of the Truth…

Discovery of the absolute truth … 14

December 15, 2003

When the fire of enlightenment burns, then it requires satsanga, self-study, self-examination, self-observation etc. to provoke it further so that it may not be extinguished again.

-7:30 a.m.

  • Love is spiritual attraction, lust is physical attraction.
  • Love always sacrifices its desires and remains satisfied and happy even by losing, lust always fulfils its desires and remains dissatisfied every time even after getting.
  • Love is power, lust is weakness.
  • When lust disappears then love appears, these two can never go together at all.
  • Lust is a lower state and love is higher than high.
  • Lust can be transformed into love and when lust is transformed in love then the creeper of love flourishes and spreads its flower’s fragrance in entire world.
  • Love is eternal smile of bliss, lust is the mourning of grief, is the lamentation of dissatisfaction.
  • Love is the dance of the dignity of prosperity, lust is the lamentation of scarcity, is the restlessness of scarcity.

-8:45 a.m.

Those who were baby girls till yesterday, now has become mothers,

Not known, where the world is going so fast?

-11:00 a.m.

The search for my ultimate truth has now become a yajna. My body is the altar of yajna, enlightenment is the ignited fire. All my faults and ignorance have been consumed in this fire. And the external knowledge is the havan material which is raising up this fire further.

-11:07 a.m.

Do not know how many times my goals moved away from me,

Do not know how many times slippers broke,

Do not know how many times I stumbled,

Do not know how many times I forgot the way,

Do not know how often the blisters erupted,

Do not know how many stones moistened,

Still, I’m moving on to my goal,

Faster…  faster…  faster…

Do not know how many times life missed,

Do not know how often beloved took umbrage,

Do not know how many times spring came,

Do not know how many new sprouts came,

Do not know how often the time looted,

Do not know how many times I missed from self,

I have not paused, I have not bent,

I have not even tired for a moment,

I am moving on to my goal,

-12:50 p.m.

(अंतर्यात्रा)

परमसत्य की खोज…14

15 दिसम्बर 2003

जब आत्मज्ञान की अग्नि जल जाती है तो फिर उसे और भड़काने के लिए सत्संग, स्वाध्याय, आत्मपरीक्षण, आत्म-अवलोकन आदि की जरूरत पड़ती है ताकि वह फिर न बुझ जाए।

-7:30 a.m.

  • प्रेम आध्यात्मिक आकर्षण है, वासना शारीरिक आकर्षण।
  • प्रेम हमेशा खोता है और खोकर भी संतुष्ट और प्रसन्न रहता है, वासना हमेशा पाती है और पाकर भी हर बार असंतुष्ट रहती है।
  • प्रेम शक्ति है, वासना दुर्बलता।
  • जब वासना मिटती है तभी प्रेम जागृत होता है, ये दोनों एक साथ कभी नहीं चल सकते।
  • वासना निम्नतर अवस्था है और प्रेम उच्च से भी उच्चतर।
  • वासना मिटकर प्रेम में पनपती है और प्रेम की बेल फैलकर अपनी खुशबू सम्पूर्ण संसार में बिखेर देती है।
  • प्रेम आनंद की चिरस्थायी मुस्कान है, वासना दुःख का करुण क्रंदन है, असंतुष्टि का मातम है।
  • प्रेम सम्पन्नता की गरिमा का नृत्य है, वासना अभाव का विलाप, अभाव की छटपटाहट है।

-8:45 a.m.

कल तक जो बच्चियां थीं, अब माँ बन चली हैं,

ये दुनिया इतनी तेज, न जाने कहाँ पर चली है।

-11:00 a.m.

मेरी परम सत्य की खोज अब यज्ञ हो गई है। मेरा शरीर यज्ञ की वेदी है, आत्मज्ञान प्रज्वलित अग्नि है। मेरे सारे दोष तथा अज्ञान इस अग्नि में जलकर भस्म हो चुके हैं तथा बाह्य ज्ञान हविष्य (हवन सामग्री) है जो इस अग्नि को और बढ़ाते जा रहा है।

-11:07 a.m.

न जाने कितनी बार मंजिलें रूठीं,

न जाने कितनी बार चप्पलें टूटीं,

न जाने कितनी बार ठोकरें खाईं,

न जाने कितनी बार राह भुलाई,

न जाने कितनी बार फूटे छाले,

न जाने कितने पत्थर तर कर डाले,

फिर भी बढे चला जा रहा हूँ अपनी मंजिल पर,

और तेज… और तेज… और तेज…

न जाने कितनी बार जीवन छूटा,

न जाने कितनी बार प्रियतम रूठा,

न जाने कितनी बहारें आईं-गईं,

न जाने कितनी कोंपलें आईं नईं,

न जाने कितनी बार समय ने लूटा,

न जाने कितनी बार मुझसे मैं छूटा,

रुका नहीं हूँ, झुका नहीं हूँ,

एक पल को भी थका नहीं हूँ,

बढे जा रहा हूँ अपनी मंजिल पर,

और तेज… और तेज… और तेज…

-12:50 p.m.

Discovery of the absolute truth … 13 (परमसत्य की खोज…13)

Adventure of the Truth…

Discovery of the absolute truth … 13

December 14, 2003

The man is so happy even in his ignorance that he feels proud even sitting above the heap of ignorance (evil) as if he has achieved the height of the Everest.

-12:50 a.m.

In order to avoid their problems, People run away from their problems and hide in such a cave, which is an open mouth of a crocodile of death.

-7:15 a.m.

Higher truth is an explosion, after knowing which the ware does not remain the same, which he was before, he becomes transformed completely.

Not obeying the celibacy is to deceit ourselves, it is to deceive with our own soul and conscience.

-4:15 a.m.

My competition is with myself own and not anyone.

-11:55 a.m.

The animals and fools do not work till they are tortured, so here Gandhi ji’s non-violence theory does not apply.

-12:15 p.m.

The true worship is the feeling of gratitude towards that supreme God, but the worship of people is not a true gratitude, but a pretense of gratitude. When people do not want to know that superpower, then how can their gratitude be true, those who ignore him, how can love him? Those who can’t love him how can worship. People’s worship is not love but fear. They are afraid of that ultimate truth, they are afraid of that supreme power, so they worship him.

-12:30 p.m.

Power! Power! Power!

Power is the only truth. Truth is the only power.

-12:35 p.m.

My present life is the effect of the actions of my prior life. If my prior actions has been so high that I will get their return in this birth and my soul will reach the climax and merge in God, Then I will get salvation and if my previous deeds are not so effective, then my current karmas (deeds) will make my path of salvation so I can’t leave doing good deeds in any case I can’t leave the path of truth in any case because my extreme goal is to meet with absolute power (salvation).

-10:45 p.m.

The science of spirituality is not so difficult as hard as the ignorance of people has made it.

-10:50 p.m.

People often leave their hard work on their faith, but they do not know that fate is nothing but the result of past actions and further destiny will also be created by the current karma.

-11:00 p.m.

(अंतर्यात्रा)

परमसत्य की खोज…13

14 दिसम्बर 2003

आदमी अपने अज्ञान में भी इतना खुश रहता है कि अज्ञान (बुराइयों) के ढेर के ऊपर बैठकर भी गर्व महसूस करता है कि मानो उसने एवरेस्ट की ऊंचाई हासिल कर ली हो।

-12:50 a.m.

लोग अपनी समस्याओं से बचने के लिए, अपनी परेशानियों से भागकर ऐसी कंदरा (गुफा) में जा छिपते हैं जो काल रुपी मगरमच्छ का खुला हुआ मुंह होती है।

-7:15 a.m.

उच्चतर सत्य एक विस्फोट होता है जिसे जानने के बाद जानने वाला वह नहीं रह जाता, जो वह पहले रहता है, वह पूरी तरह रूपांतरित हो चुका होता है।

ब्रह्मचर्य का पालन न करना स्वयं से कपटाचरण करना है, अपनी आत्मा तथा विवेक से छल करना है।

-4:15 a.m.

मेरा कॉम्पीटीशन (स्पर्धा) खुद से है और किसी से नहीं।

-11:55 a.m.

जानवरों और मूर्खों को जब तक प्रताड़ित न किया जाए तब तक वे अपना काम नहीं करते अतः यहाँ गाँधी जी का अहिंसा का सिद्धांत लागू नहीं होता।

-12:15 p.m.

सच्ची पूजा कृतज्ञता का भाव है उस परमसत्य परमात्मा के प्रति, परन्तु लोगों की पूजा सच्ची कृतज्ञता नहीं बल्कि कृतज्ञता का ढोंग है। जब लोग उस परमशक्ति को जानना ही नहीं चाहते तो फिर उनकी कृतज्ञता सच्ची कैसे हो सकती है, जो लोग उसकी उपेक्षा करते हैं वे उससे प्रेम कैसे कर सकते हैं, जो लोग प्रेम नहीं कर सकते वे पूजा कैसे कर सकते हैं? लोगों की पूजा प्रेम नहीं भय है। वे डरते हैं उस परम सत्य से, उस परम शक्ति से, इसलिए वे उसकी पूजा करते हैं।

-12:30 p.m.

शक्ति! शक्ति! शक्ति!

शक्ति ही सत्य है। सत्य ही शक्ति है।

-12:35 p.m.

मेरा वर्तमान जीवन मेरे पूर्वजन्मों के कर्मों का प्रभाव है। यदि मेरे पूर्वकर्म इतने उच्चतर रहे होंगे कि उनका प्रतिफल मुझे इसी जन्म में मिल जाएगा और मेरी आत्मा चरमोत्कर्ष पर पहुँच कर विलीन हो जाएगी परमात्मा में, तो मैं मुक्त हो जाऊँगा और यदि मेरे पूर्व कर्म इतने प्रभावशाली नहीं हुए तो, मेरे वर्तमान कर्म ही मेरी मुक्ति का मार्ग बनाएँगे इसलिए मैं अच्छे कर्म करना किसी दशा में नहीं छोड़ सकता, सत्य का मार्ग किसी स्थिति में नहीं छोड़ सकता। क्योंकि मेरा चरम लक्ष्य परम शक्ति से मिलन (मुक्ति) है।

-10:45 p.m.

इतना गूढ़ और इतना कठिन नहीं है आध्यात्म का विज्ञानं, जितना लोगों की अज्ञानता (न जानने की इच्छा तथा उपेक्षा) ने बना रखा है।

-10:50 p.m.

लोग अक्सर अपने कठिन कामों को भाग्य के भरोसे छोड़ कर बैठ जाते हैं पर वे ये नहीं जानते कि भाग्य और कुछ नहीं बल्कि पूर्व कर्मों का परिणाम है तथा आगे का भाग्य भी वर्तमान कर्म ही बनाएँगे।     -11:00 p.m.

Discovery of the absolute truth … 12

Adventure of the Truth…

Discovery of the absolute truth … 12

December 13, 2003

Satsang (Good accompaniment) removes bigger demerit too. (Dream message)

-7: 05 a.m.

Always keep away from ignorance; even a little touch of ignorance contaminates the knowledge.

Do not spend your power by preaching to fools. Ignorance can only end with the knowledge of oneself, not by the discourses of others.

-10:10 a.m.

Trying to remove the ignorance of others is vain like sprinkling petrol on ash to try to burn the fire. Petrol of preach can work only when the fire of enlightenment has arisen within.

-10:15 a.m.

Today Tolstoy introduced me to three deep truths –

1- The most important time – which is in front of you.

2- The most important person – who stands before you.

3- The most important thing – what you are doing.

-12:07 p.m.

The only way to avoid temptations is to –

Keep yourself busy every day, every hour, every minute, every second. Think of your present work as the most important and keep up with full dedication.

-6:30 p.m.

Every Mother of today’s world understands that our country needs the saints like Shankaracharya, Ramkrishna, Vivekananda, Gandhi, Osho, we need the priests of truth like these, but she thinks that he should not be born in our house, he should be born in our neighbor’s house.

People want to get quality of high level but do not want to pay the price. People want a lot but they do not want to sacrifice desirable for it.

-10:34 p.m.

(अंतर्यात्रा)

परमसत्य की खोज…12

13 दिसम्बर 2003

सत्संग बड़े से बड़े दुर्गुण को भी दूर कर देता है। (स्वप्न सन्देश)

-7: 05 a.m.

अज्ञान से हमेशा दूर रहो, अज्ञान का तनिक सा भी स्पर्श ज्ञान को दूषित कर देता है।

मूर्खों को उपदेश देकर अपनी शक्ति व्यय मत करो। अज्ञान केवल स्वयं के ज्ञान से ही ख़त्म हो सकता है, दूसरों के उपदेशों से नहीं।

-10:10 a.m.

दूसरों के अज्ञान को दूर करने की कोशिश करना बुझी राख पर पेट्रोल छिड़ककर आग जलाने की कोशिश के समान व्यर्थ है। उपदेश का पेट्रोल केवल तभी काम कर सकता है, जब भीतर ज्ञान की अग्नि सुलग उठी हो।

-10:15 a.m.

आज टॉलस्टॉय ने मुझे तीन गहरे सत्यों से परिचित कराया –

१-सबसे महत्त्वपूर्ण समय – जो तुम्हारे सामने है।

२- सबसे महत्त्वपूर्ण व्यक्ति – जो तुम्हारे सामने खड़ा है।

३- सबसे महत्त्वपूर्ण कार्य – जो तुम कर रहे हो।

-12:07 p.m.

प्रलोभनों से बचने का एकमात्र उपाय है –

हर दिन, हर घंटे, हर मिनट, हर सेकंड स्वयं को व्यस्त रखो। अपने वर्तमान कार्य को सबसे महत्त्वपूर्ण समझो और उसी में पूरी लगन के साथ जुटे रहो।

-6:30 p.m.

आज की दुनिया की हर माँ समझती है कि हमारे देश को शंकराचार्य, रामकृष्ण, विवेकानंद, गाँधी, ओशो, जैसी संतानों की जरूरत है, इनके जैसे सत्य के पुजारियों की जरूरत है, पर वह ये सोचती है कि ये हमारे घर में पैदा न हों, हमारे पड़ोसी के घर में पैदा हो जाएं।

लोग गुणवत्ता तो उच्चतर स्तर की पाना चाहते हैं पर उसकी कीमत नहीं चुकाना चाहते। लोग पाना तो बहुत कुछ चाहते हैं पर उसके लिए वांछनीय त्याग नहीं करना चाहते।

-10:34 p.m.

Discovery of the absolute truth … 11

Adventure of the Truth…

Discovery of the absolute truth … 11

December 12, 2003

Last night’s Dream – I am sitting with my friend Sardar ji on a bare cot made of jute rope in my home (which is a plain hut) and we are eating food. There are some dry chapati’s and some chuteny on a plate placed on a wooden lamina in front of us. I urge him to take it more.

Sardar ji says tauntingly, “Oye! Is this any food for men, Come with me, I will tell you what type of food is for human beings.”

I say – “Brother, we poor take such type of food, we get the satisfaction in this food that you do not get in the royal dishes.”

Sardar ji says – “Believe me one thing, I’m not even telling you to be dishonest nor I am asking you to do any wrong thing, just take this gift from me. You should not have any objection in this.”

I want to refuse but he puts his hand on my mouth and stops me and he leaves the gift and goes away. I open it and find a gold brick in it.

As soon as that gold brick came to me, my life changed. Instead of my clay house there was a luxurious building, Jute cot was replaced by wood and glass and cushion made imported sofa sets and furniture. The bungalow was full of servants and relatives. The little children and young girls of the neighborhood started getting attracted towards me. All began to express love on me more than ever before, everyone began to feel proud coming near to me and often they started looking for opportunities to come to me. More and more I was getting the jealous mixed love of relatives but my influence converted their jealousy into love. Meanwhile, there was none information about Sardarji.

The next situation I find very freaky, I see that Sardaraji is walking along with me in the market, and there are crowds of people (my colleagues) together. Going forward, we stopped at once. In front, there were police jeeps and the policemen were sitting secretly in it. Seeing us, they started firing indiscriminately. Sardarji also roared and took out his pistol and started firing in reply. Seeing Sardarji I also took out my revolver and started firing. Many of my men died untimely. After some time, seeing the side of police heavy Sardar ji began to run. I too started running behind him. The police was behind. We ran into an open small cell of a small house to save our lives and we sat down there secretly. After a while, the man, who used to live there came into the room and started making noise seeing us there. We ran away from there and as soon as we came out, the owner of that house came there and they also started making noise and the police started to follow us again. While running away from police, I and Sardarji fell apart and I entered into high and big ruins like building of the school to hide myself. Outside the building, the dry leaves of eucalyptus were creating such a sound on walking that own chirm were creating panic in own heart. There were a large number of spider webs on the main gate and the channel gate was half open. All the rooms in the interior were found locked and there were thick layers of dust on the locks and inside walls, corridors and doors were layered with dust. By not finding a hiding place, I started climbing up the ladder. On going up to three or four floors above, I see another channel gate on the way to the top (going to the roof), the big lock on which is teasing me. Now I was of nowhere. The police was behind, there was no way to go ahead and I did not know where the Sardarji had disappeared. I was wondering what to do, what not to do, same time I hear the voice of loud laugh from behind. I look back and find, Sardar ji is standing, who is saying that have you seen the consequence of greed, now you lost. Now where is your truth and honesty, now where is  your and self-confidence?

-10:12 a.m.

Interpretation of the dream – As I had guessed in the previous dream, Sardar ji is my courage, which has turned into audaciousness and he is dissatisfied with my current situation (in dream). He is showing the temptation of the world to my dissatisfaction. He is showing the greed of the gloom of the world to my simple and theoretical life. I do not want to accept this luxury of the world, I don’t want to accept these temptations, but my audacity forces me to be trapped into temptation as a gold brick, by which the level of my status increases in society but in my spiritual life, I start to fall. Courage which has taken the form of audacity, turns my positive powers into negative power and pushes me into the path of deep fall. People running with me in the market are all evils (ignorance), which are running alongside me. As Sardarji, my audacity is also with me. The police men are the result of these evils with which I encounter, In which my evil and my audacity fight with me and my audacity leaves them and runs away. When the audacity also leaves me, then I too run away and we take shelter in a small cell. That small cell is my hobby. To avoid the consequences of evils (Ignorance) I hide myself with my courage in my hobbies but I can’t even succeed in this and soon my inner conscience begins to make noise in the form of that man, and we get out from there and run away again, who shouts out loudly and put the consequences behind my ignorance. Running away from all these, I enter the ruins of that school to hide. That ruin was my hollow ego, it was a false pride, entering in which I could not find the way to forward. And the loud laugh of my courage and alarming me for my truthfulness and honesty is telling to warn me to avoid ignorance and temptations.

Conclusion – I would like to keep this dream in the category of prophetic dreams which is giving me this message that a small temptation is enough for spiritual fall. A temptation is enough to ruin all the good qualities of a human. A temptation is enough to turn a person into a dangerous wolf from a sage, so avoiding temptations is right for me.

-12:10 p.m.

The dreams highlights our weak points.

 

The root of most of our problems is the taste sense (tongue). By being subjugated to the tongue, we take more and more stodgy things, it takes extra internal energy of our body to digest them. Due to incontinence in food we have to suffer the following losses –

  1. The additional internal energy of the body has to be spent.
  2. The digestive system and other parts of the body have to work more than necessary, thereby the chances of disturbance in them gets increased.
  3. Imbalance in internal energy within the body occurs.
  4. This imbalance of energy provokes lust and by being subjected to lust, the man starts wasting his spiritual powers.
  5. Man’s will power falls due to the fall of spiritual powers and due to the fall of the will-power weakens the confidence and the other weaknesses start to dominate.
  6. Eating more reduces positive energy, from which laziness and laxities are born and laziness decreases our consciousness.
  7. The origin of the new diseases everyday and abundance of the new diseases is the result of over eating.

-8:00 a.m.

Look all the temptations of the world as a beautiful pot made of gemstones, which is filled of poison.

-11:00 a.m.

(अंतर्यात्रा)

परमसत्य की खोज…11

12 दिसम्बर 2003

विगत रात्रि का स्वप्न – मैं अपने एक मित्र सरदार जी के साथ अपने झोपड़ीनुमा सादे-कच्चे से मकान में एक रस्सी वाली नंगी खाट पर बैठा हूँ और हम खाना खा रहे हैं। सामने पटे पर सूखी रोटी और एक प्लेट में चटनी रखी है। मैं उसे प्रेमपूर्वक और लेने का आग्रह करता हूँ।

सरदार जी ताना मारते हुए कहते हैं -“ओए! ये भी कोई आदमियों का खाना है, चल मेरे साथ मैं बताता हूँ तुझे, आदमियों का खाना कैसा होता है।”

मैं कहता हूँ -“भैया, हम गरीबों का खाना तो ऐसा ही होता है, हमें इसी खाने में वो संतोष मिल जाता है जो तुम्हें छप्पन तरह के पकवानों में नहीं मिलता।”

सरदार जी कहते हैं -” तू मेरी एक बात बस मान ले, मैं तुझे बेईमान बनने को भी नहीं कह रहा हूँ और न ही कोई गलत काम करने को कह रहा हूँ, बस तू मेरा ये गिफ्ट ले ले। इसमें तो तुझे कोई ऐतराज नहीं होना चाहिए।”

मैं मना करना चाहता हूँ पर वह मेरे मुंह पर हाथ रखकर मुझे रोक देता है और वह गिफ्ट छोड़कर चला जाता है। मैं उसे खोलकर देखता हूँ तो उसमें एक सोने की ईंट रखी हुई मिलती है।

उस सोने की ईंट का आना था कि मेरी ज़िंदगी ही बदल गई। मेरे मिटटी के कच्चे मकान की जगह आलीशान इमारत थी, रस्सी के खाट की जगह लकड़ी और कांच और कुशन से जड़े हुए इम्पोर्टेड सोफासेट और फर्नीचर थे। बंगला, नौकर चाकरों और रिश्ते-नातेदारों से भरा था। आस-पड़ोस के छोटे-छोटे बच्चे और नवयुवतियां मेरी ओर आकर्षित होने लगे थे। सभी मुझ पर पहले से अधिक प्रेम प्रकट करने लगे, सभी मेरे करीब आने में गर्व महसूस करने लगे और अक्सर मेरे पास आने के मौके तलाशने लगे। रिश्तेदारों का ईर्ष्यामिश्रित प्रेम भी अधिक प्राप्त होने लगा था किन्तु मेरा प्रभाव उनकी ईर्ष्या को भी प्रेम में ही अभिव्यक्त कर रहा था। इस बीच सरदार जी का कहीं अता-पता नहीं था।

अगली स्थिति मैं बहुत ही विकराल पाता हूँ, देखता हूँ कि भरे बाज़ार में मेरे साथ-साथ सरदारजी चल रहे हैं और साथ में कई लोगों (मेरे साथियों) की भीड़ चल रही है। आगे जाकर हम लोग एकदम से ठिठक गए। सामने पुलिस की जीपें खड़ीं थीं और उनमें पुलिसवाले छिपकर बैठे थे। हमें देखते ही उन्होंने अंधाधुंध फायरिंग शुरू कर दी। सरदरजी ने भी दहाड़ते हुए अपनी पिस्तौल निकाली और जवाबी फायरिंग शुरू कर दी। मैंने भी सरदारजी की देखादेखी अपना रिवाल्वर निकला और फायरिंग करना शुरू कर दिया। मेरे कई आदमी बेमौत मारे गए। कुछ देर बाद पुलिस वालों का पलड़ा भारी होता देख सरदारजी भागने लगे। उनके पीछे-पीछे मैं भी भागने लगा। पीछे पुलिस लगी हुई थी। हम जान बचने के लिए भागते-भागते एक छोटे से घर की एक खुली छोटी कोठरी में घुस गए और वहां दुबककर बैठ गए। कुछ देर बाद उस कमरे में रहने वाला आदमी उस कमरे में आया और हमें देखते ही जोर-जोर से हल्ला मचाने लगा। हम फिर वहां से निकलकर भागे और जैसे ही भागकर बाहर निकले तो उस घर के मालिक और मालकिन आ गए और वे लोग भी शोर मचाने लगे और हमारे पीछे फिर से पुलिस लग गई। भागते-भागते मैं और सरदारजी बिछड़ गए और मैं छुपने के लिए सामने नजर आ रही खंडहरनुमा स्कूल की एक ऊंची और बड़ी इमारत में जा घुसा। इमारत के बाहर नीलगिरि की सूखी पत्तियां चलने पर ऐसी आवाज पैदा कर रहीं थीं कि अपनी ही आहट अपने ही दिल में दहशत पैदा करती थी। मेन गेट पर ढेर सारे मकड़ियों के जाले लगे थे और चैनल गेट आधा खुला था। अंदर के सभी कमरों पर धूल खाते ताले जड़े थे और अंदर की दीवारें, गलियारे और दरवाजे धूल से सने पड़े थे। कहीं छुपने की जगह न पाकर मैं जीने की सीढ़ियों से ऊपर चढ़ने लगा। करीब तीन-चार मंजिल ऊपर जाकर देखता हूँ कि ऊपर से बाहर (छत पर जाने) के रास्ते पर एक और चैनल गेट लगा है जिस पर लटका बड़ा सा ताला मुझे मुंह चिढ़ा रहा है। अब मैं इधर का रहा न उधर का। पीछे पुलिस पड़ी थी, आगे जाने का कोई रास्ता भी नहीं था और सरदारजी भी पता नहीं कहाँ गायब हो गए थे। मैं सोच ही रहा था कि क्या करूँ, क्या नहीं, तभी पीछे से अट्टहास की आवाज आती है। मैं पीछे पलट कर देखता हूँ तो सरदार जी खड़े दिखाई देते हैं, जो कह रहे हैं कि देख लिया लालच का नतीजा, तुम कहीं के नहीं रहे। अब कहाँ गई तुम्हारी सच्चाई और ईमानदारी, अब कहाँ गया वो तुम्हारा आत्मबल और आत्मविश्वास?

स्वप्न फल का अनुमान – जैसा कि मैंने पहले के स्वप्न में अनुमान लगाया था, सरदार जी मेरा साहस हैं, जो दुस्साहस में परिणित हो गए हैं और मेरी वर्तमान स्थिति (स्वप्न की) से असंतुष्ट हैं। वे मेरी असंतुष्टि को संसार का प्रलोभन दिखा रहे हैं, मेरे रूखे-सूखे सिद्धांतों पर चलने वाले जीवन को संसार की चमक-दमक का लालच दिखा रहे हैं। मैं संसार की इस चमक दमक को, इन प्रलोभनों को स्वीकार करना नहीं चाहता पर मेरा दुस्साहस बलपूर्वक मुझे सोने की ईंट के रूप में प्रलोभन में फंसा देता है, ऐश्वर्य-विलासिता के जीवन में फंसा देता है। जिससे मेरे भौतिक जीवन का स्तर समाज में बढ़ जाता है परन्तु अपने आध्यात्मिक जीवन में मेरा पतन होने लगता है। साहस जो कि दुस्साहस का रूप ले चुका है, मेरी सकारात्मक शक्तियों को नकारात्मक शक्ति में बदल देता है और मुझे घोर पतन के रास्ते में धकेल देता है। मेरे साथ बाज़ार में चल रहे लोग तमाम बुराइयां (अज्ञान) हैं जो मेरे साथ-साथ बढ़ती जा रहीं हैं। सरदारजी के रूप में मेरा दुस्साहस भी साथ है। पुलिसवाले इन बुराइयों के परिणाम हैं जिनकी मुझसे मुठभेड़ होती है जिसमें मेरी बुराइयां मरती जाती हैं और मेरा दुस्साहस इन्हें छोड़ कर भागने लगता है। जिसमें मेरी बुराइयां और मेरा दुस्साहस मेरी बराबरी से लड़ते हैं और मेरा दुस्साहस इन्हें छोड़ कर भागने लगता है। जब दुस्साहस भी मेरा साथ छोड़ देता है तो मैं भी भागता हूँ और हम भागकर एक छोटी कोठरी में छिप जाते हैं। वह छोटी कोठरी मेरी अभिरुचियाँ हैं। बुराइयों (अज्ञान) के परिणाम से बचने के लिए मैं खुद को अपने साहस के साथ अपनी अभिरुचियों में छिपा लेता हूँ पर इसमें भी कामयाब नहीं हो पाता और जल्दी ही उस आदमी के रूप में मेरी अंतर्चेतना हल्ला मचाने लगती है और हम वहां से निकलकर फिर भागते हैं। उस घर के मकान मालिक और मालकिन मेरी अंतर्दृष्टि हैं जो शोर मचाकर चीख-पुकार करके दोबारा परिणामों को मेरे अज्ञान के पीछे लगा देती है। इन सबसे भागता हुआ मैं छिपने के लिए उस स्कूल के खंडहर में घुस जाता हूँ वह खंडहर मेरा खोखला दम्भ था, झूठा अभिमान था, जिसमें घुसकर मैं आगे निकलने का रास्ता नहीं ढूंढ पाया और मेरे साहस का अट्टहास करना और मेरी सच्चाई और ईमानदारी के लिए मुझे झिंझोड़ना, मुझे अज्ञान से दूर करने के लिए, प्रलोभनों से बचने के लिए  सचेत करना बता रहा है।

परिणाम – इस स्वप्न को मैं प्रॉफेटिक ड्रीम्स (संदेशात्मक स्वप्न) की श्रेणी में रखना चाहूंगा जो मुझे यह संदेश दे रहा है कि एक छोटा सा प्रलोभन ही काफी होता है आध्यात्मिक पतन के लिये। एक प्रलोभन ही काफी होता है इंसान की सारी अच्छाइयों को मटियामेट करने के लिए। एक प्रलोभन ही काफी होता है एक इंसान को साधू से खतरनाक भेड़िया बनाने के लिए, अतः प्रलोभनों से बचना ही मेरे लिए उचित है, श्रेयस्कर है।

-12:10 p.m.

सपने हमारे कमजोर बिंदुओं को उजागर करते हैं।

हमारी अधिकतर समस्याओं की जड़ स्वादेन्द्रिय (जीभ) ही है, जिसके वशीभूत होकर हम आवश्यकता से अधिक स्वादिस्ट और गरिष्ठ चीजें अपने शरीर में डालते जाते हैं, जिन्हें पचाने में हमारे शरीर की अतिरिक्त आंतरिक ऊर्जा व्यय होती है। खान-पान में असंयम (अति) से निम्नलिखित नुकसान भुगतने पड़ते हैं-

  • शरीर की अतिरिक्त आंतरिक ऊर्जा व्यय होती है।
  • पाचन तंत्र तथा शरीर के अन्य हिस्सों को जरूरत से ज्यादा काम करना पड़ता है, जिससे उनमें गड़बड़ी आने की सम्भावना बढ़ जाती है।
  • शरीर के अंदर आतंरिक ऊर्जा में असंतुलन पैदा हो जाता है।
  • ऊर्जा का ये असंतुलन काम-वासना को भड़काता है और काम-वासना के वशीभूत होकर आदमी अपनी आध्यात्मिक शक्तियों का अपव्यय करने लगता है।
  • आध्यात्मिक शक्तियों के पतन से आदमी का आत्मबल गिरता है और आत्मबल के गिरने से इच्छाशक्ति और आत्मविश्वास कमजोर होने लगता है और दूसरी दुर्बलताएँ हावी होने लगती हैं।
  • अधिक खाने से सकारात्मक ऊर्जा में कमी आती है, जिनसे आलस्य और प्रमाद जन्म लेते हैं और आलस्य से हमारी सचेतता में कमी आ जाती है।
  • नित-नए रोगों की उत्पत्ति और भरमार अधिक खाने का ही परिणाम है।

-8:00 a.m.

संसार के सभी प्रलोभनों को एक सुन्दर रत्न-जड़ित पात्र की तरह देखो, जिसमें जहर भरा हुआ है।

-11:00 a.m.

 

 

 

Discovery of the absolute truth … 10

Adventure of the Truth…

Discovery of the absolute truth … 10

December 11, 2003

Truth; even in awakening, truth; even in dream, truth; even in words, truth; even in thoughts, truth; even in the breath, Truth; even in the truth.  I have become completely the truth. Untruth has fled from my life. To reach this stage, I had to struggle very hard, A lot was there, that I had to sacrifice, but that sacrifice was nothing in front of that what I have got. Now my life is completely truth.

-8:13 a.m.

Often the topic of my thinking comes into the articles in the newspaper the next day. This thing strengthens the concept of telepathy.

-9:05 a.m.

Now my perceptions are getting dumb, my experiences are being mute, my expressions are being mute.

Handing ourselves over the hands of weaknesses, (becoming a slave of weaknesses) is not to accept vulnerabilities but to reject our masculinity.

-9:40 a.m.

Children are not to be hatred, children are to be loved. Now my knowledge has reached this level that it has started loving ignorance.

-11:10 a.m.

Why is there so much attraction in ignorance? Why is there so much repulsion on the path of knowledge?

Loneliness on the path of knowledge is the cause of repulsion. The fear of adopting the unknown on the path of knowledge is the cause of repulsion. There is a danger of losing own present existence, on the path of knowledge. On the path of knowledge, there is a continuous burden of struggle and pain of dissatisfaction.

In contrast, there are temptations in the world of ignorance; there is a false glamour of the world, there is a satisfaction of freedom from struggle, there is illusion of false peace and happiness, although this situation of peace never comes and every time the person gets hurt and in daze, picks the path of knowledge and walks on it but the injury is not strong enough and after walking a little distance the pain of that injury gets over and he forgets this injury after walking a little further, he gets entangled with the fear of conflicts and gets entangled in the temptations of the world and comes back to his place.

Those who suffer from severe, very intense pain, they are not afraid of conflicts ahead of this severe pain and do not care about temptations, they only go on the highway of knowledge.

-8:50 p.m.

(अंतर्यात्रा)

परमसत्य की खोज…10

11 दिसम्बर 2003

जाग्रति में भी सत्य, स्वप्न में भी सत्य, शब्द में भी सत्य, विचारों में भी सत्य, श्वासों में भी सत्य, सत्य ही सत्य। मैं समग्र रूप से सत्य हो गया हूँ। असत्य मेरे जीवन से पलायन कर चुका है।

इस अवस्था तक आने के लिए मुझे बहुत कड़ा संघर्ष करना पड़ा, बहुत कुछ त्याग करना पड़ा, लेकिन वह त्याग कुछ भी नहीं इसके आगे, जो मुझे मिला है। अब मेरा जीवन पूर्णतः सत्य है।

-8:13 a.m.

अक्सर मेरे चिंतन के विषय अगले दिन अख़बार में लेखों में ढले हुए आते हैं। ये बात टेलीपथी (मनः संचार) को दृढ़ करती है।

-9:05 a.m.

अब मेरी अनुभूतियों गूंगी हो रही है, मेरे अनुभव निःशब्द हो रहे हैं, मेरी अभिव्यक्ति मौन हो रही है। कमजोरियों के हाथों खुद को सौंपना (कमजोरियों के गुलाम बनना) कमजोरियों को स्वीकार करना नहीं है बल्कि अपने पौरुष को अस्वीकार करना है।

-9:40 a.m.

बच्चों से घृणा नहीं, प्रेम किया जाता है। अब मेरा ज्ञान इस स्तर तक आ पहुंचा है कि अज्ञान से प्रेम करने लगे।

-11:10 a.m.

अज्ञान में इतना आकर्षण क्यों है? ज्ञान के पथ पर इतना विकर्षण क्यों है?

ज्ञान के पथ पर मिलने वाला अकेलापन विकर्षण का कारण होता है। ज्ञान के पथ पर अज्ञात को अपनाने का भय विकर्षण का कारण होता है। अपने वर्तमान अस्तित्व को खो देने का खतरा होता है, ज्ञान के पथ पर। ज्ञान के पथ पर निरंतर असंतोष की वेदना और संघर्ष का बोझ रहता है।

इसके विपरीत अज्ञान के संसार में प्रलोभन होते हैं, संसार की झूठी चमक-दमक होती है, संघर्षों से मुक्ति का संतोष रहता है, झूठी शांति तथा सुकून का भ्रम रहता है, हालाँकि यह शांति और सुकून की स्थिति कभी आ नहीं पाती और आदमी हर बार चोट खाकर तिलमिलाने पर ज्ञान की राह पकड़ता है और चल पड़ता है पर चोट उतनी तगड़ी नहीं होती, थोड़ी दूर चलने के बाद उस चोट की पीड़ा खत्म हो जाती है और वह इस चोट को भूल जाता है और थोड़ी दूर चलकर ही संघर्षों के भय से और संसार के प्रलोभनों में उलझकर फिर वापिस अपनी जगह पर आ जाता है।

जिनकी चोट की पीड़ा बहुत तगड़ी होती है, जिनकी चोट की पीड़ा बहुत तगड़ी होती है, अत्यंत तीव्र होती है, वे इस तीव्र पीड़ा के आगे संघर्षों से नहीं डरते और प्रलोभनों की परवाह नहीं करते, वे ही ज्ञान के राजमार्ग पर आगे बढ़ पाते हैं।

-8:50 p.m.